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एक राष्ट्र निर्माता नायक

  • 08 February,2019
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एक राष्ट्र निर्माता नायक

नई दिल्ली: सरदार पटेल एक सच्चे देशभक्त थे। उनका सपना एक चमकदार और खुशहाल भारत का था, जिसका विश्व में डंका बजे। वर्तमान में अल्पसंख्यकों को लेकर कांग्रेस की सोच विकृत है, जबकि अल्पसंख्यकों को लेकर सरदार पटेल का स्पष्ट मत था-अब देश का विभाजन पूरा हो चुका है और आप कहते हैं कि हमें इसे पुन: लाना चाहिए और दूसरा विभाजन करना चाहिए। यदि वह तरीका जो अपनाया गया और जिसके परिणामस्वरूप देश का विभाजन हुआ, अगर इसे दोहराना है तो मैं कहता हूं कि जो उस तरह की चीजें चाहते हैं उनके लिए पाकिस्तान में जगह है, यहां नहीं। यहां हम एक राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं, हम एक राष्ट्र की नींव रख रहे हैं और जो पुन: विभाजन चुनने वाले हैं तथा बिखराव के बीज बोना चाहते हैं उनके लिए कोई जगह नहीं होगी, न ही कोई कोना है। मैं पूरी तरह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि जब मैं बीते दिन की बात भूल जाने को कहता हूं तो मैं यह बात मन से कहता हूं। आपके प्रति कोई अन्याय नहीं होगा। आपके प्रति उदारता रहेगी, किंतु जवाब में दूसरी ओर से भी ऐसा ही होना चाहिए। इसलिए मैं एक बार फिर बड़ी सादगी और मजबूती से आपसे निवेदन करता हूं कि हम एक राष्ट्र बन जाएं।’ इसके विपरीत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विचार विभाजन करने वाले हैं।

 

वह कहते हैं कि ‘हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों को, सबल बनाने के लिए अभिनव योजनाओं को विकसित करना होगा ताकि विकास का लाभ समान रूप से उनको वितरित हो सके। उनका कहना है कि संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का दावा सबसे पहला होना चाहिए। सरदार पटेल को भारत का बिस्मार्क कहा जाता है, लेकिन उनकी सफलताएं उनसे भी बड़ी हैं, क्योंकि उन्होंने ऐसे माहौल में काम किया जो बहुत कठिन था। उन्होंने छोटी-छोटी रियासतों और जागीरों को, जहां अलग-अलग भाषाएं, परंपराएं और धर्म थे, को एक देश के रूप में एकीकृत किया, जहां आज विश्व की 17.5 प्रतिशत आबादी रहती है। विश्व में सबसे बड़ी जनसंख्या के रूप में भारत का प्रभाव सरदार पटेल के योगदान के कारण है। उन्होंने असंभव दिखने वाले कार्य को उस समय अंजाम दिया जब विंस्टन चर्चिल इस उपमहाद्वीप को हिंदुस्तान, पाकिस्तान और छोटे-छोटे रजवाड़ों के समूह के रूप में बांटना चाहते थे।

 

अगर सरदार पटेल निरंतर प्रयास न करते तो आज भारत की जगह बहुत सारे देश होते, जो एक-दूसरे से लड़ते रहते। जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ ने प्रतिरोध किया, पर पटेल के मजबूत इरादों ने स्पष्ट कर दिया कि भारत एक एकीकृत इकाई बनकर रहेगा। उन्होंने इन राज्यों में अपनी सेना भेजी। नेहरू और माउंटबेटन हिचकिचा रहे थे, उन्हें डर था कि यदि हैदराबाद में जबरदस्ती की गई तो हिंदू- मुस्लिम दंगे न हो जाएं, पर पटेल को लगा कि अगर नरमी से पेश आए तो दिक्कत बढ़ेगी। उन्होंने हैदराबाद के निजाम के खिलाफ अभियान शुरू किया। कश्मीर पर भी पटेल के विचार नेहरू से भिन्न थे। केएम मुंशी लिखते हैं-‘जवाहर लाल नेहरू ने यदि शेख अब्दुल्ला के बहकावे में आते हुए जम्मू-कश्मीर का जिम्मा पटेल से न लिया होता तो समस्या इतनी न होती जितनी आज है।’ सरदार ने भी कई बार कहा कि अगर नेहरू ने उन्हें कश्मीर को संभालने दिया होता तो समस्या इतनी न बढ़ती। उन्होंने शेख अब्दुल्ला द्वारा किए गए वादे पर शंका व्यक्त की थी, जिसे नेहरू ने अनदेखा कर दिया। नेहरू ने इस गलती को बाद में कबूल भी किया, लेकिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान के बाद। पटेल ने तिब्बत मुक्ति आंदोलन का समर्थन किया था।

 

उन्होंने नेहरू को लिखा-हमें अपनी स्थिति सिक्किम के साथ ही तिब्बत में भी मजबूत करनी है। मुडो आशा है कि जैसे साम्यवादियों ने चीन के बाकी हिस्सों में खुद को स्थापित किया है, वैसे ही वे इसके स्वायत्त अस्तित्व को नष्ट करने की कोशिश करेंगे। पटेल की राष्ट्रीयता की भावना के बारे में उनके निजी सचिव वी. शंकर बताते हैं कि सरदार देश के व्यापक हित में न केवल झुक जाते थे, बल्कि राष्ट्रीय जीवन से जुड़े अन्य लोगों का सहयोग भी प्राप्त कर लेते थे। इसका एक शानदार उदाहरण यह था कि किस तरीके से उन्होंने स्वतंत्रता के बाद पंडित नेहरू को अपनी सरकार बनाने की सलाह दी थी। इसके लिए अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे लोगों की सेवाओं को प्राप्त करने में भी उन्हें डिाझक नहीं थी। उन्हीं के मार्गदर्शन में दुग्ध क्त्रांति की शुरुआत हुई। सोमनाथ मंदिर को बचाने के पीछे भी वही थे।

 

भारत की राजधानी में उनके लिए कोई भी स्मारक नहीं है, जबकि यहां कितने ही बाग और स्मारक पटेल से कम प्रतिभावान लोगों को समर्पित किए गए हैं। इस कार्य को इसी उद्देश्य से नियोजित किया गया है ताकि भारत में एकता की लहर आ सके। युवा पीढ़ी के जोश और उत्साह से और लाखों किसानों के लौह दान से यह साबित भी हो रहा है। पटेल किसी एक समुदाय या राजनीतिक पार्टी की संपत्ति नहीं हैं। ऐसा करना देश के लिए उनके संपूर्ण योगदान को खारिज करने जैसा होगा।

 

स्वच्छ भारत सुंदर भारत का सपना:-

राष्ट्रीय एकता के सूत्रधार सरदार वल्लभभाई पटेल स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री थे जिन्हें आज हम सब लौह पुरुष के रूप में जानते हैं। अंग्रेजों की दासता से मुक्त भारत के इतिहास में जहां महात्मा गांधी को राष्ट्र निर्माता और जवाहर लाल नेहरू को लोकतंत्र के नव निर्माण का प्रणेता माना जाता है वहां वल्लभभाई पटेल को राष्ट्रीय एकता का मंत्रदाता कहा जाता है। गांधी, नेहरू और पटेल की त्रिमूर्ति का समझे बिना नई पीढ़ी-भारत की खोज का कोई सपना नहीं जान सकती। हम नहीं जानते कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता किसने बनाया, नेहरू को चाचा नेहरू किसने कहा और पटेल को लौह पुरुष का प्रतीक क्यों पढ़ाया गया। बहरहाल वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के करमसद गांव में और देहान्त 15 दिसंबर 1950 को मुंबई में हुआ था। आप सोचे कि जिस तरह स्वामी रामकृष्ण के लिए विवेकानंद थे उसी तरह महात्मा गांधी के लिए वल्लभभाई पटेल क्यों थे? राष्ट्रीय एकता की कहानी को पढ़कर ही हम यह कह सकते हैं कि तब सात सौ से अधिक देश रियासतों को पटेल ने शाम, दाम, दण्ड और भेद से किस तरह भारत देश की एकता के सूत्र में पिरोया था और महान भारत का इतिहास-भूगोल जोड़ा था। नया भारत अब हमें ऐसा दूसरा कोई सरदार पटेल शायद ही दे सके। आजादी के 70 साल बाद जो लोग अब भारत के इतिहास को बदलने का पुर्न लेखन कर रहे हैं उन्हें इस तथ्य और सत्य को स्वीकारना होगा कि भारत में लोकतंत्र और संविधान का शासन जिस दूरगामी सोच का परिणाम है उसकी आधारशिला का निर्माण कोई 200 साल के स्वतंत्रता संग्र्राम से और भारत की विविधता में एकता की अवधारणा से हुआ है। यही कारण है कि भारत का इतिहास आज भी सहिष्णुता और अहिंसा का संगम है।

 

 

वल्लभभाई पटेल को उनके जाने के अब 67 साल बाद याद करने की प्रासंगिकता पर जब हम आज की ऐतिहासिक भ्रांतियों को लेकर विचार करते हैं तो हमें लगता है कि हम 2017 में 1947 से अधिक विभाजित हैं, असहिष्णु हैं तथा अलोकतंत्रवादी हैं। यदि आज सरदार पटेल जीवित होते तो उन्हें ये देखकर पीड़ा होती कि भारत की आत्मा अंग्र्रेजों की गुलामी से मुक्त होकर भी आज धर्म, जाति क्षेत्रीयता और भाषा की संकीर्णताओं तथा पाखण्ड से कितना कष्ट में है? पटेल को राष्ट्रीय एकता की सरकारी दौड़ का हिस्सा बनाकर हम युवा पीढ़ी को ये तक नहीं बता पा रहे हैं कि एकता की आवश्यकता अनेकता के संघर्ष में ही क्यों याद आती है और दो विश्व युद्ध की विभिषिका भोगकर ही कोई महान लेखक टाल्सटाय फिर युद्ध और शांति जैसा उपन्यास कैसे लिखता है? हमारी एकता तो अपने स्वतंत्रता संग्र्राम को भूलकर इतनी दयनीय हो गई है कि नया भारत बनाने के लिए और राष्ट्रवाद लाने के लिए तथा सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट में जन हित याचिका डालनी पड़ रही है। वल्लभभाई पटेल, महात्मा गांधी और अम्बेडकर इसीलिए अचानक आज सबसे अधिक सरकारी स्तर पर गाए- बजाए जा रहे हैं कि सवा सौ करोड़ देशवासियों के सपनों में दलित आदिवासियों का निरंतर उत्पीड़न और अल्पसंख्यकों का विकास की मुख्यधारा से निष्कासन तथा महिलाओं- बच्चों का लगातार शोषण हो रहा है। आज के दिन आधुनिक भारत को नया भारत बनाने की जो मुहिम चल रही है उसी का ये परिणाम है कि सत्य और अहिंसा के अन्वेषक महात्मा गांधी को स्वच्छता मिशन का कार्यभार दे दिया गया है तो विवेकानंद को सनातन सहिष्णु मानवता से हटाकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का युवा उद्घोषक बना दिया गया है तो अम्बेडकर को हिन्दुत्व की छतरी में खड़ा कर दिया गया है तो नेहरू के भारत निर्माण की अमरगाथा से बाहर निकालकर पटेल को सरदार सरोवर में एकता का सर्वोच्च शिखर बनाकर नर्मदा की गोद में बैठा दिया गया है। सरदार वल्लभभाई पटेल के सपनों का नया भारत अब कुछ इस तरह बनाया जा रहा है कि पिछड़ी जातियों के सभी पटेल आरक्षण मांग रहे हैं, सभी किसान कर्ज माफी और आत्महत्या की दौड़ में जुट गए हैं तथा भारत की नौकरशाही पारदर्शिता, संवेदनशीलता और जवाबदेही से मुक्त होना चाहती है।

 

मुझे याद है कि सरदार पटेल देश के पहले गृह मंत्री और सूचना प्रसारण मंत्री थे लेकिन अब आप इन दो मंत्रालयों को ही देख लें तो पता चलेगा कि सरदार पटेल को वहां कोई नहीं जानता। दरअसल युग बदल गया है और सरदार पटेल जैसे सभी महापुरुष अब नए भारत के पाठ्यक्रम से निकाल दिए गए हैं और प्रेरणाओं के मंदिरों में भूखा-नंगा और कुपोषित लोकतंत्र अच्छे दिनों के लिए घंटी-घड़ियाल बजा रहा है। राम के दरबार में रहीम की कोई सुन ही नहीं रहा है।

 

वल्लभभाई पटेल के बहाने कुछ बातें आपको फिर याद दिलाना चाहता हूं कि हमारे राजस्थान राज्य की स्थापना 30 मार्च, 1949 को पटेल के कर कमलों से हुई थी। कृपया हमें बताएं कि नए राजस्थान में सरदार पटेल की कौनसी आवाजें आज सुनाई पड़ रही है। राजस्थान में सरदार पटेल की कोई एकता यात्रा कहीं होती है क्या? हम आजकल पटेल की याद नेहरू को छोटा साबित करने में लगे हुए हैं जो कि इतिहास के साथ अन्याय है। हम एक बार फिर से अपने लौह पुरुष और राष्ट्रीय एकता के निर्माता की जीवन गाथा को पढ़ें तो सही और जानने का प्रयत्न तो करें कि सरदार पटेल बनने के लिए जीवन दर्शन नई पीढ़ी को दें ताकि भारत के लोकतंत्र में फिर किसी एकता, समता और सहज सहिष्णुता का संचार हो सके। सरदार पटेल एक किसान के बेटे थे और आज का दुख ही ये है कि किसान की कोई सुनता ही नहीं है? अत: वल्लभभाई पटेल को याद करने की कोई ईमानदारी का जुनून तो इस नए युवा भारत में पैदा करिए।

Author : Ashok Chaudhary
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