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क्या सरकारी कर्मचारी सेवक नहीं हमारे मालिक है?

  • 08 February,2019
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क्या सरकारी कर्मचारी सेवक नहीं हमारे मालिक है?

नई दिल्ली:

इस देश की है बीमारी, ये भूखे भ्रष्टाचारी.
जिस थाली में खाना खाते, ये छेद उसी में करते है
लात गरीब के पेट पे मार, घर अपना ये भरते है.
इस देश की है बीमारी, ये धनवान भिखारी.

हर देश को चलाने के लिये एक सरकार की जरूरत होती है और उस सरकार को चलाने के लिये सरकारी नौकरों की, जो जनता की सेवा करें । लेकिन हमारे देश में सरकार जिन लोगों को सरकारी कर्मचारी बोलकर भर्ती करती है वो नौकर कम मालिक जैसा व्यवहार ज्यादा करते हैं । नौकर का काम मालिक की सेवा करना होता है और अगर वो ऐसा न करे तो उसे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ता है । लेकिन हमारे लोकतान्त्रिक देश में सरकारी नौकर कहीं से भी नौकर नहीं लगता है । वो काम करे न करे उसे पूरा वेतन चाहिये, क्योंकि ये उसका हक है । सरकारी नौकर एक ऐसा नौकर होता है जिसे एक बार मालिक नौकरी पर रख लें तो मालिक ही उसका नौकर बन जाता है । बात-बात पर यह नौकर हड़ताल की धमकी देता है और धरना-प्रदर्शन करता है । वेतन के अलावा इसे विभिन्न प्रकार की सुविधायें भी चाहिये । उसकी और उसके परिवार की सारी जिम्मेदारी सरकार की होती है । उसके मरने के बाद तक सरकार उसके परिवार का पालन पोषण करती रहती है ।

माता पिता ने पढ़ा लिखाकर , तुमको अफसर बना दिया..

आज देखकर लगता है की , सबसे बड़ा एक गुनाह किया..

रिश्वत लेने से अच्छा था , भिक्षा लेकर जी लेते..

मुह खोलकर मांगे पैसे , बेहतर होंठ तुम सी लेते..!!

लाखों का धन है तो भी , क्यों आज भिखारी बन बैठे..

काले धन की पूजा करके , जाने केसे तन बैठे..

भूल गए , बचपन में तुम भी, खिलौना देख रो देते थे..

आज कैसे , उन नन्हे हाथों से , खेलने का हक़ ले बैठे..!!

एक आदमी पेट काट कर , अपना घर चलाता है..

खून पसीना बहा बहा कर , मेहनत की रोटी खाता है..

खुद भूका सो जाये पर , बच्चो की रोटी लाता है..

तू उनसे छीन निवाला , जाने कैसे जी पता है.. !!

 

कहने को हमारा देश बहुत गरीब देश है, लेकिन हमारे राजनीतिक नौकरो को देखो तो उनकी सात पीढ़ीयों की बात छोड़ो उन्होंने इतना धन इकठ्ठा कर लिया है कि जब तक उसकी संताने इस धरती पर रहेगी उनको ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जीने के लिये हाथ-पैर हिलाने कि जरूरत नहीं होगी । राजनीतिक सेवक ही जनता के असली मालिक है और धर्म और जाति के नाम पर राजनीति करके धन कमाना ही उनका एकमात्र धर्म है । मेरा मानना है कि राजनीतिज्ञों का कोई धर्म नहीं होता और न ही जाति होती है, जिस तरफ उन्हें फायदा दिखता हो वो उसी तरफ चल देते है । हम मूर्ख भारतीय लोग जाति और धर्म के नाम के आधार पर बँटकर उनसे नफरत और प्यार करते हैं, लेकिन उन्हें केवल सत्ता से प्यार होता है, क्योंकि सत्ता से ही शक्ति आती है और शक्ति से ही पैसा आता है । प्रशासनिक नौकर राजनीतिक नौकर के अधीन होते हैं और उसके सारे कर्मों के गवाह होते हैं, इसलिये राजनीतिक नौकर उनको तंग नहीं करते और खुद तो खाते है और उनके खाने का भी इन्तजाम करते हैं । बड़े सरकारी नौकर छोटे सरकारी नौकरो को तंग नहीं करते, क्योंकि छोटे सरकारी नौकर बड़े सरकारी नौकरों की कारगुजारियों के गवाह होते है । राजनीतिक नौकर और सरकारी नौकर एक दूसरे का पूरा ख्याल रखते हैं, क्योंकि इनके हित आपस में जुड़े होते हैं । वास्तव में ये सभी नौकर एक दूसरे की नौकरी कर रहे है और इससे इन्हें फुरसत मिलती है तो थोड़ा बहुत जनता के लिये भी काम कर लेते है, क्योंकि जनता में ये गलतफहमी बनी रहे कि वो उसकी सेवा कर रहे हैं ।

Corruption

यहाँ तहजीब बिकती हैं यहाँ फरमान बिकते है,
जरा तुम दाम तो बोलो यहाँ ईमान बिकते हैं.

 

रेल विभाग में सबसे ज्यादा सरकारी नौकर है, जो रेलों पर अपना पहला अधिकार समझते है । ये नौकर और इनका परिवार सारी जिन्दगी रेलों में मुफ्त सफर का आनन्द लेने को अपना अधिकार मानता है । ऐसे ही सभी विभागो के कर्मचारी अपने विभागों द्वारा जनता को दी जाने वाली सुविधाओं पर जनता से पहले अपना अधिकार मानते हैं । अगर सर्वेक्षण किया जाये तो पता लगेगा कि सरकारी विभागो ने जनता की सेवा कम अपने कर्मचारियों की सेवा ज्यादा की होगी । सरकारी कर्मचारी काम नहीं करते ऐसा सरकार भी मानती है, तभी वो धीरे-धीरे नियमित पदों को समाप्त करके अस्थायी कर्मचारियो से काम चला रही है, विशेषतौर पर छोटे-छोटे पदों को खत्म कर दिया गया है और वो काम ठेके पर रखे कर्मचारियों से करवायें जा रहे हैं । वास्तव में अधिकारियों ने पहले छोटे कर्मचारियों से काम न लेकर उन्हें निकम्मा साबित कर दिया । छोटे कर्मचारियों को निकम्मा साबित करके उन्होंने उनके पदों को समाप्त करके अस्थायी कर्मचारी रख लिये जिनका इस्तेमाल वो अपनी मनमर्जी से करते हैं। छोटे पदों को समाप्त करके अधिकारी वर्ग ने अपने पदों को बढ़ा लिया है । बड़े अचरज की बात है कि जो अधिकारी कर्मचारियों से काम नहीं ले पाये वही उनके पद समाप्त करके अपने पद बढ़ा रहे हैं, जबकि छोटे कर्मचारियों का काम न करना अधिकारियों की ही नाकामी है । इन कारणों से गरीब और मध्मय वर्ग के लोगों के लिये सरकारी नौकरियों की बेहद कमी हो गई है ।

जंगल जंगल ढूंढ रही है मृग अपनी कस्तूरी को,
कितना मुश्किल है तय करना ख़ुद से ख़ुद की दूरी को.

 

जनता को अपने अधिकारों के लिये जागरूक होने की जरूरत है, क्योंकि जनता ही असली मालिक है, लेकिन उसे पता ही नहीं है कि नौकरों से काम कैसे लिया जाता है । जो नौकर काम न करे उसे नौकरी पर रहने का अधिकार कैसे हो सकता है और बिना काम के उसे वेतन किस बात का दिया जा रहा है । अगर हम किसी को किसी काम के लिये रखते है और वो काम नहीं होता है तो क्या उसको हम उसके पैसे देते है, लेकिन हमारे देश में ऐसा ही होता है । सरकारें अपना काम नहीं कर पा रही है और सरकारी कर्मचारी भी अपना काम नहीं कर रहे हैं, लेकिन कोई भी किसी जिम्मेदारी को स्वीकार करके अपना गुनाह कबूल नहीं करता है । अब वो वक्त आ चुका है जब हमें सरकारी नेताओं,अफसरों और कर्मचारियों को दिये जाने वाले वेतन और भत्तों के एवज में पूरा काम करने की बाध्यता पैदा करनी होगी । अगर कोई नेता अपना काम नहीं करता तो उसे वापिस बुलाने का अधिकार जनता के पास होना चाहिये । इस बात का कोई तुक नहीं है कि अगर जनता से झूठे वादे करके कोई नेता चुन लिया जाता है तो जनता नेता के झाँसे में आकर की गई गलती के लिये पूरे पाँच साल तक सजा भुगते, जबकि वो उन पाँच सालों में ही दशकों की कमायी कर जाता है । ऐसे ही अगर कोई भष्ट्र और कामचोर व्यक्ति सरकार में अफसर या कर्मचारी नियुक्त हो जाता है तो सारी उम्र उसे झेला जाये, किसी भी वक्त ऐसा लगता है कि ये व्यक्ति सरकारी नौकरी के योग्य नहीं है या वो काम नहीं करना चाहता या वो भष्ट्र है तो उसे तुरन्त नौकरी से निकाल देना चाहिये । कुछ लोगों का कहना है कि ऐसा करना से उसका परिवार मुश्किल में आ जाता है, लेकिन ये सोचना हमारा काम नहीं है ये सोचने का काम उस व्यक्ति का है जो ऐसा करता है । जब उसे अपने परिवार की चिन्ता नहीं तो हम उसके परिवार की चिन्ता क्यों करें । अब ये जरूरी हो गया है कि सरकारी सेवाओं के नियमों में बदलाव किया जाये, ताकि जो सही काम न करे उसे बाहर का रास्ता दिखाया जा सके ।

 

 

 

Author : Ashok Chaudhary
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