देवरिया:अंग्रेजों से खूब लड़ा था पैना गांव, 391 ने दी थी प्राणों की आहूति

  • Line : Ashok Chaudhary
  • 31 July,2019
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देवरिया:अंग्रेजों से खूब लड़ा था पैना गांव, 391 ने दी थी प्राणों की आहूति

देवरिया: 31 जुलाई 1857 की अल सुबह ही अंग्रेजी सेना ने पानी की जहाजों पर तोप लगाकर पूरे पैना गांव को घेर लिया। जब लोग समर्पण नही किए तो अंग्रेजों व ग्रामीणों के बीच युद्ध शुरू हो गया। उनसे लड़ते हुए 391 वीर-वीरांगनाओं ने प्राणों की आहुति दे डाली, लेकिन अंग्रेजी सेना से हार नहीं मानी। गांव के सतीहड़ा घाट पर शहीदों की याद में स्थापित शहीद स्मारक आज भी रणबांकुरों के बलिदान को बयां कर रहा है।

 

 

अवध के नवाब बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में 31 मई 1857 को गांव के वीरों ने अपने को स्वतंत्र घोषित किया। उसी दिन ब्रिटीश के सरकारी मिशनरियों को मजबूरन बरहज से कब्जा हटाना पड़ा। दो जून 1857 को नरहरपुर के राजा हरी सिंह पैना के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्रमुख ठाकुर सिंह से मुलाकात की। उनका प्रस्ताव था कि यदि पैना गांव की सेना हमारी सेना से मिल जाए तो, अंग्रेजों को गोरखपुर जिले से भागना पड़ जाएगा। इस बात को ठाकुर सिंह ने मंजूर कर लिया। छह जून को ठाकुर सिंह, पलटन सिंह व राजा हरी सिंह ने बड़हलगंज पर धावा बोल थाना को कब्जे में लिया। घाघरा नदी पर अंग्रेजों के आवागमन को बंद करते हुए उनकी जहाजों के आवागमन पर रोक लगा दिया गया। इसके बाद इन लोगों ने मेजर होम (सिंगौली कम्पनी प्रमुख) को सलेमपुर भागाते हुए अफीम कोठी पर कब्जा जमा लिया। 15 जुलाई को पैना के रण बांकुरों ने अंग्रेजों की रशद व गोला बारूद से ड्टारी दो पानी की जहाजों को सतीघड़ा घाट के सामने लूट लिया। इससे खार खाई व घबराई अंग्रेजी सेना ने पैना गांव को भारत के नक्शें से मिटाने का मन बना लिया। इसकी जिम्मेदारी कर्नल रो क्राप्ट को मिली तो, उसने जल व थल मार्ग से पूरे गांव का निरीक्षण कर कब्जा करने की रणनीति बनाई।

 

 

अस्मिता बचाने को नदी में कूद पड़ी 87 महिलाएं

युद्ध के एक दिन पूर्व 30 जुलाई को ब्रिटीश सेना ने पैना के लोगों को आत्म समर्पण करने की चेतावनी दी। लेकिन गांव के वीर-वीरांगनाओं ने अपना निर्णय नहीं बदला। 31 जुलाई 1857 की अल सुबह अंग्रेजी सेना ने पानी की जहाजों पर तोप लगाकर पूरे गांव को घेर लिया। जब लोग समर्पण नही किए तो युद्ध शुरू हो गया। हजारों की संख्या में वीर-वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी। बहुतेरे अबोध बालक मौत की गहरी नींद सो गए। 87 माताओं व बहनों ने अपनी अस्मिता को बचाने के लिए सतीघड़ा घाट से उफनाती नदी में छलांग लगा दी। वहीं, चार महिलाओं ने अपने शरीर को आग के हवाले कर दिया। घटना में कुल 391 लोग शहीद हुए। बाद में शहीदों के सम्मान में ‘सतीघड़ा घाट को ‘सतीहड़ा के नाम से घोषित किया गया। आज भी कोई शुभ कार्य करने से पूर्व ग्रामीण सतीहड़ा घाट पहुंच सती माता के मंदिरों में विधिवत पूजन कर आशीर्वाद लेते हुए कार्य प्रारंभ करते हैं।

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