loading...

धरती पर सभी जीवों का अधिकार है ना कि केवल इंसानों का….

  • 17 December,2018
  • 237 Views
धरती पर सभी जीवों का अधिकार है ना कि केवल इंसानों का….

नई दिल्ली: जानवरों को लेकर उत्तराखंड हाईकोर्ट (Uttarakhand High Court)के फैसले को एक बड़ी पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने उनके संरक्षण को ध्यान में रखते हुए उनको विधिक व्यक्ति का दर्जा दिया और मनुष्य को उनका अभिभावक घोषित किया है। अदालत का आशय यह है कि स्वार्थ के लिए पशुओं के साथ ज्यादती न की जाए । यह बात हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। गौतम बुद्ध, महावीर से लेकर गांधीजी तक का संदेश प्राणिजगत के प्रति स्नेह और करुणा बनाए रखने का ही रहा है।
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हाल ही में अपने एक फैसले में राज्य के दायरे में हवा, पानी और पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों को विधिक व्यक्ति का दर्जा दिया है। विधिक व्यक्ति का दर्जा देने का मतलब यह है कि उन्हें मनुष्य जितने ही अधिकार, कर्तव्य और जिम्मेदारियों से नवाजना। अदालत का कहना था कि जानवरों की भी एक अलग शख्सियत होती है। जिंदा इंसानों की तर्ज पर उनके पास भी अधिकार, कर्तव्य और उत्तरदायित्व होते हैं। इसके साथ ही अदालत ने राज्य के लोगों को इन तमाम जीवों का संरक्षक यानी पालनहार घोषित किया है। उत्तराखंड हाईकोर्ट के सीनियर जज राजीव शर्मा और जज लोकपाल सिंह की पीठ ने यह फैसला बनबासा चंपावत निवासी नारायण दत्त भट्ट की जीव क्रूरता पर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद दिया। अदालत के इस फैसले के बाद अब राज्य में जीव-जंतुओं को संवैधानिक व्यक्ति का दर्जा हासिल हो गया है।
इस फैसले के बाद राज्य के नागरिकों की तरह उन्हें भी संवैधानिक अधिकार हासिल हो सकेंगे। उनके ऊपर किसी तरह का जुल्म ढाना या उन्हें किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाना, जीवित इंसानों को नुकसान पहुंचाने जैसा अपराध होगा। जानवरों की हिफाजत और उन्हें इंसान की ज्यादती से बचाने के लिए ऐसे ही किसी फैसले की दरकार भी थी। अदालत के फैसले से जहां इंसान जानवरों के प्रति संवेदनशील होंगे, वहीं जानवरों को किसी भी तरह के अत्याचारों या क्रूरता से बचाने की जिम्मेदारी भी इंसानों की ही होगी। उत्तराखंड हाईकोर्ट में साल 2014 में दायर इस याचिका में याचिकाकर्ता ने अदालत से भारत के बनबासा से नेपाल के महेंद्र के बीच 14 किमी की दूरी में चलने वाले घोड़ा, बग्गी, तांगा, भैंसा गाड़ियों में जुते जीवों का जिक्र करते हुए उनकी सेहत, समय पर जांच, टीकाकरण आदि की सुविधा मुहैया कराने की अपील की थी।
बहरहाल अदालत में जब सुनवाई शुरू हुई तो उसने जानवरों के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए जीवों पर बरती जाने वाली क्रूरता को गलत माना और मनुष्य से अलग जीव प्रजाति के संरक्षण के लिए उन्हें विधिक व्यक्मि का दर्जा देने का फैसला किया और उनके खिलाफ क्रूरता रोकने के लिए भी कई निर्देश जारी किए। यह आदेश पक्षियों और जलीय जीवों के लिए भी अमल में आएगा। अदालत ने निर्देशों में जानवरों की सुरक्षा के लिए जानवरों और बग्गियों पर फ्लोरोसेंट रिफ्लेक्टर्स लगाने, जानवरों द्वारा खींची जाने वाली खाली गाड़ियों के वजन का सर्टिफिकेट लेने, घोड़ों, बैलों व लावारिस जानवरों के लिए उपयुक्त आकार का शेड अनिवार्य तौर पर बनाने के भी निर्देश दिए हैं। पीठ ने अपने फैसले में अलग-अलग गाड़ियों में माल ढुलाई के लिए लगाए गए जीवों के लिए दूरी और फेरों के हिसाब से भार ढोने की सीमा भी तय की है।

 

 

इससे पहले उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ही अपने एक दीगर फैसले में ग्लेशियरों, हिमालय और गंगा नदी के जीवों को ‘लिविंग एन्टिटी’ यानी जिंदा इकाई माना था। अदालत ने गंगा और यमुना नदी को जीवित व्यक्ति की तरह मानते हुए इनको साफ -सुथरा बनाए जाने के साथ ही संरक्षण पर जोर दिया था। गंगा और यमुना दोनों नदियों को कानूनी अधिकार दिए थे। यह अलग है कि आगे चलकर शीर्ष अदालत ने यह आदेश निरस्त कर दिया। जानवरों के हक में आया हालिया आदेश कितने दिन तक कायम रहेगा यह आने वाला वक्त बताएगा। जानवरों की छोड़ें, हमारे यहां तो इंसान ही इंसानों के प्रति संवेदनशील नहीं है। समाज में एक इंसान, दूसरे इंसान के साथ भेदभाव या अत्याचार करता है। तमाम कानूनी प्रावधान होने के बाद भी कमजोरों का उत्पीड़न और शोषण होता रहता है। बंधुआ मजदूरी गैर कानूनी है, लेकिन देश के कई हिस्सों में आज भी जारी है। ऐसे हालात में जानवरों के प्रति लोग संवेदनशील होंगे और उन पर अत्याचार नहीं करेंगे, यह दूर की बात है।
संविधान के अनुच्छेद 51 (1) के मुताबिक हर जीवित प्राणी के प्रति सहानुभूति रखना देश के हर नागरिक का मूल कर्तव्य है। पशुओं पर क्रूरता रोकने के लिए ‘पशु क्रूरता निवारण कानून 1960’ ( Animal Cruelty Prevention Act 1960 ) भी है। जिसके अंतर्गत पशुओं पर हो रहे अत्याचारों, क्रूरता, बर्बरता, निर्दयता करने वालों पर सजा का प्रावधान है। कानून के तहत पशुओं पर अधिक बोझ लादना, ट्रकों में ठूंस-ठूंसकर भरना, एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते समय उनको कष्ट पहुंचाना कानूनी अपराध है। ‘प्रिवेंशन ऑफ क्रूएलिटी ऑन एनिमल्स एक्ट (पीसीए), 1960’ के मुताबिक किसी पशु को आवारा छोड़ने पर तीन महीने की सजा हो सकती है। जानवर को पर्याप्त भोजन, पानी, शरण देने से इंकार करना और लंबे समय तक बांधे रखना भी दंडनीय अपराध है। इसके लिए जुर्माना या तीन महीने की सजा या फिर दोनों हो सकते हैं। इसके अलावा पशुओं के कल्याण के लिए पशु कल्याण बोर्ड का भी गठन हुआ। बावजूद इसके इन मूक, बेबस व बेसहारा प्राणियों को इन कानूनों का कोई फायदा नहीं मिलता। हर राज्य में पशु कल्याण बोर्ड हैं जरूर, पर ये पशुओं के कल्याण पर कोई ज्यादा ध्यान नहीं देते। इन्हें जरूरी नहीं लगता कि वे इंसानों के अत्याचारों से जानवरों को बचाएं।

 

कुछ स्वयंसेवी संगठनों को यदि छोड़ दें, तो जानवरों के अधिकारों की आवाज कोई नहीं उठाता चाहता। जिसकी वजह से मूक, बेबस, बेसहारा प्राणियों पर क्रूरता और अत्याचार होते रहते हैं। यही वजह है कि उत्तराखंड हाई कोर्ट ने पशुओं के खिलाफ क्रूरता रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए और इंसानी समाज को संरक्षक यानी पालनहार घोषित किया। अब यह इंसानी समाज की जिम्मेदारी है कि वह जहां भी पशुओं पर क्रूरता और अत्याचार देखें, उसके बचाव के लिए सामने आएं। जानवरों का बचाव करें, लेकिन इस बात का जरूर ख्याल करें कि कानून अपने हाथ में न लें। कुछ अरसे से पर्यावरणविद् भी कह रहे हैं कि जैव विविधता के बिना मानव जीवन की निरंतरता भी सुनिश्चित नहीं की जा सकेगी। अफसोस कि यह बात अब कोर्ट को कहनी पड़ रही है, जबकि इसे हमारे सामाजिक जीवन से निकल कर आना चाहिए था।
अक्सर देखा जाता है कि लोग बोझा ढोने के लिए या दूध के लिए जानवर पालते हैं, लेकिन ज्यों ही वे बीमार या अनुपयोगी हो जाते हैं, उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। यह तो सरासर अमानवीयता है। उम्मीद करें कि राज्य सरकार कोर्ट के निर्देशों को गंभीरता से लेगी और इनकी रोशनी में पशुओं के कल्याण संबंधी कुछ ऐसे नियम बनाएगी जो पूरे देश के लिए मिसाल बनेंगे। लेकिन इससे भी जरूरी यह है कि समाज सभी जानवरों के प्रति संवेदनशील बने। उत्तराखंड के लोगों ने चिपको आंदोलन के जरिए देश में पहली बार पर्यावरण चेतना को आकार दिया था। उम्मीद है कि पशुओं के प्रति संवेदनशीलता को लेकर भी वे जरूर कुछ नया करेंगे। यह सुखद है कि उत्तराखंड में आज भी अपने परिवेश को लेकर जागरूक लोगों की कमी नहीं है। इसी तरह की पहल पूरे देश को करनी होगी ताकि पशु सुरक्षित रह सकें।

Author : Ashok Chaudhary
Loading...

Share With

Tag With

You may like

Leave A Reply

Follow us on

Loading...

आपके लिए

TRENDING