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नौकरीपेशा महिलाओं का यौन उत्पीडऩ

  • 28 November,2018
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नौकरीपेशा महिलाओं का यौन उत्पीडऩ

 

 

नई दिल्ली: 

यौन उत्पीडऩ का अर्थ केवल यौन संबंध, बलात्कार आदि ही नहीं है बल्कि इसमें वे सभी बातें निहित हैं जो पुरूषों की इन महिलाओं के प्रति यौन उत्कंठाएं दर्शाती हैं। यह उत्पीडऩ शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर हो सकता है।

 

 

कभी-कभी उत्पीडऩ से त्रस्त युवतियां, महिलाएं आत्महत्या तक कर बैठती हैं। बेहद खूबसूरत और स्मार्ट नयना कौल एक एडवरटाइजिंग कंपनी में कार्यरत थी। शुरू में तो उसे कार्यस्थल का वातावरण ठीक ठाक ही लगा लेकिन धीरे-धीरे वहां की असलियत उस पर उजागर होने लगी। पचास साल के मिस्टर तनेजा से लेकर बाईस साल के बख्तियार तक सभी उससे नजदीकियां बढ़ाने की पुरजोर कोशिश में लगे रहते। उसे देखकर उनका द्विअर्थी वाक्यों में बातें करना, उसकी एनॉटोमी डिस्कस करना और उससे बेतुकी बातें करना जो अश्लीलता की हद तक पहुंच जाती।

 

 

उसके सब्र का बांध टूटने लगा पर वो शिकायत करती भी तो किससे। बॉस स्वयं उससे हर समय फ्लर्ट करने की फिराक में रहता। कभी होटल तो कभी पिक्च्र के लिए उसके पीछे पड़ा रहता। घर खर्च उसकी तनख्वाह से चल रहा था। एकदम से नौकरी छोड़ भी नहीं सकती थी। वह हर समय तनावग्रस्त रहने लगी थी। जीवन की खुशियां मानों भरी जवानी में उससे छिन गई थी।

 

 

एयर होस्टेस जूही को विमान कंपनी के रूल्स के मुताबिक गहरा मेकअप कर स्मार्ट दिखते हुए विमान के यात्रियों को मदिरा परोसनी पड़ती थी। ऐसे में कई दिलफेंक मजनूं जान बूझकर गिलास पकड़ते हुए उसका हाथ छूने की कोशिश में रहते। उनकी कामुक दृष्टि जूही को परेशान कर देती। हालांकि उसकी पूरी कोशिश रहती कि वो अपने काम से काम रखे लेकिन उनका बेवजह घंटी बजाकर उससे कभी पानी मांगना, कभी कुछ, कभी कुछ, बस इसी तरह उसके दीदार करते रहना।

 

 

 

उसके पिता की उम्र के पुरूषों का ऐसा व्यवहार जूही को गुस्से और तनाव से भर देता। उसके ऊपर शिकायत करने पर उसे सपाट लहजे में सुनने को मिला और भी लड़कियां हैं। जब उन्हें कोई प्रॉब्लम नहीं तो तुम्हें क्यों? घर से बाहर निकल कर तुम ऐसा ‘टच मी नॉट’ रवैय्या लेकर नहीं चल सकती। ‘सहो या घर बैठो’ उसकी कलीग ने सलाह देते हुए कहा।

 

 

इस तरह की कठिनाइयों, और शोषण का सामना नयना और जूही को ही नहीं करना पड़ा वरन ज्यादातर कामकाजी महिलाओं को ऐसी अनचाही स्थितियों से गुजरना पड़ता है। आज ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है कि स्त्री की कल्पना घर की चारदीवारी तक सीमित कर देखना अजूबा लगने लगा है।

 

 

फिर वक्त का तकाजा, स्टैंडर्ड कायम रखने की चाह, कुछ मजबूरियों के चलते उसे बाहर नौकरी करनी पड़ रही है लेकिन वक्त के साथ पुरूष अपने को कितना बदल पाया है? कुछ कसूर स्त्री का भी जरूर है लेकिन अब पुरूष के मन में उसके लिए आदर नहीं।

 

 

यह बात कहीं पर भी कार्यालय में उन लोगों की गप्पबाजी को सुनकर जानी जा सकती है। स्त्रियों के वाइटल स्टेटिस्टिक्स डिस्कस करते वे जिस जीवंतता का परिचय देते हैं, कितनी बारीकियां बेबाकियों से वर्णित होती हैं, हैरान कर देने वाली होती हैं। उनका मुखौटा बस उतरने की देर है। पब्लिक में महिला सहकर्मियों के प्रति जिस शालीनता से वे पेश आते हैं, कोई उनकी मानसिकता का आसानी से अंदाज नहीं लगा सकता।

 

 

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार प्रगतिशील तथा एडवांस्ड देशों में कार्य करने वाली सभी स्त्रियों को कभी न कभी यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है। अगर पुरूष उच्च पदस्थ कर्मचारी है, राजनीति से संबद्ध है या उसके पास पैसों की पावर है, ऐसे में उसके लिये औरतों की इज्जत से खेलना और भी आसान हो जाता है।

 

 

ऐसा नहीं है कि घरों में होम मेकर स्त्रियां पूर्णत: सुरक्षित हैं। सुरक्षित तो वे भी नहीं लेकिन फिर भी कामकाजी स्त्रियों की तरह ऑफिस में हर पल वे असुरक्षा के भय में नहीं जीती। बाहर बस, टे्रन, पैदल स्कूटर पर उसे छेडऩे वालों की कमी नहीं। कभी उन्हें किसी पीछा करने वाले जनूनी से वास्ता पड़ता है, कभी उनके ब्लैंक कॉल्स, कभी फोन पर अश्लील बातें सुननी पड़ती हैं।

 

 

कार्यालयों में देखें तो अस्पताल स्कूल कॉलेज, अखबार के दफ्तर, कोर्ट कचहरी, रेडियो दूरदर्शन, यहां तक कि पुलिस स्टेशनों आदि भी वे शोषित होती हैं। बमुश्किल कुछ ही घटनाएं प्रकाश में आती हैं वर्ना कई बार मजबूरी में वे सहन करती रहती हैं।

 

 

पुरूषों को तो उनके प्रति नजरिया बदलना ही होगा लेकिन महिलाओं को भी अपनी मर्यादा का खयाल रखना होगा। केवल जवान और सुन्दर होने से ही वे प्रमोशन के सपने नहीं देख सकती। उसके लिए उसमें काबिलियत भी होनी चाहिए।

 

 

कई बार अपने उत्पीडऩ के लिये वे स्वयं भी जिम्मेदार होती हैं। पहले अपना काम निकालने के लिए वे स्वयं पुरूष सहकर्मियों को लिफ्ट देती हैं, उनके साथ फ्लर्ट करती हैं। जब पुरूष ग्रीन सिग्नल मिलने पर आगे बढ़ता है

तो वे उत्पीडऩ का शोर मचाती हैं।

 

 

कई बार सहानुभूति की चाह लिये वे अपने घर की परेशानियां पुरूष सहकर्मियों को बताकर गलती कर बैठती हैं। यह चरित्र की कमजोरी है जिस पर उन्हें स्वयं ही विजय प्राप्त करनी चाहिए। यह सोचने की बात है कि बिना किसी स्वार्थ के कोई पुरूष क्यों उनकी मदद करता रहेगा।

 

 

महिलाओं को ईश्वर ने छठी इंद्रिय यूॅंही नहीं प्रदान की है। उसे पुरूषों को लेकर सतर्कता से इसका इस्तेमाल करना चाहिए। कौन पुरूष कैसा है, उन्हें एकदम पता चल जाता है लेकिन अक्सर निहित स्वार्थों के चलते वे उसे अनदेखा करती हैं। फिर परिणाम भुगतने के लिए उन्हें तैय्यार रहना चाहिए।,

 

 

पुरूष की प्रकृति बदल पाना न संभव है, न नेचर के हक में, इसलिए स्त्री को स्वयं जागृत होकर रहना तथा समझदारी से चलना होगा।

Author : Ashok Chaudhary
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