loading...

मकर संक्रांति का इतिहास जानने के लिए अवश्य पढ़ें;

  • 15 January,2019
  • 137 Views
मकर संक्रांति का इतिहास जानने के लिए अवश्य पढ़ें;

नई दिल्ली:

हिंदुओं में मकर संक्रांति का त्योहार बहुत धुमधाम से मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। मकर संक्रांति परंपरागत रूप से 14 जनवरी को मनाई जाती आ रही है लेकिन 2012 से मकर संक्रांति की तिथि को लेकर उलझन की स्थिति बनती चली आ रही है। पिछले कुछ वर्षों में मकर संक्रांति 14 को मनाई जाएगी या 15 जनवरी को इस बात को लेकर सवाल सामने आने लगे हैं।

 

किया जाता है दान
सूर्य का धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश मकर संक्रांति कहलाता है। इसी दिन सूर्य उत्तरायण होते हैं। शास्त्रों में यह समय देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा जाता है। मकर संक्राति सूर्य के उत्तरायण होने से गरम मौसम की शुरुआत होती है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान सौ गुना होकर लौटता है। इसलिए भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के बाद पूजन करके घी, तिल, कंबल और खिचड़ी का दान किया जाता है।

 

मकर संक्रांति का इतिहास
श्रीमद्भागवत एवं देवी पुराण के मुताबिक, शनि महाराज का अपने पिता से वैर भाव था क्योंकि सूर्य देव ने उनकी माता छाया को अपनी दूसरी पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेद-भाव करते देख लिया था, इस बात से नाराज होकर सूर्य देव ने संज्ञा और उनके पुत्र शनि को अपने से अलग कर दिया था। इससे शनि और छाया ने सूर्य देव को कुष्ठ रोग का शाप दे दिया था।

 

यमराज ने की थी तपस्या
पिता सूर्यदेव को कुष्ट रोग से पीड़ित देखकर यमराज काफी दुखी हुए। यमराज ने सूर्यदेव को कुष्ठ रोग से मुक्त करवाने के लिए तपस्या की। लेकिन सूर्य ने क्रोधित होकर शनि महाराज के घर कुंभ जिसे शनि की राशि कहा जाता है उसे जला दिया। इससे शनि और उनकी माता छाया को कष्ठ भोगना पड़ रहा था। यमराज ने अपनी सौतली माता और भाई शनि को कष्ट में देखकर उनके कल्याण के लिए पिता सूर्य को काफी समझाया। तब जाकर सूर्य देव शनि के घर कुंभ में पहुंचे।

 

 

मकर में हुआ सूर्य का प्रवेश
कुंभ राशि में सब कुछ जला हुआ था। उस समय शनि देव के पास तिल के अलावा कुछ नहीं था इसलिए उन्होंने काले तिल से सूर्य देव की पूजा की। शनि की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनि को आशीर्वाद दिया कि शनि का दूसरा घर मकर राशि मेरे आने पर धन धान्य से भर जाएगा। तिल के कारण ही शनि को उनका वैभव फिर से प्राप्त हुआ था इसलिए शनि देव को तिल प्रिय है। इसी समय से मकर संक्राति पर तिल से सूर्य एवं शनि की पूजा का नियम शुरू हुआ।

 

काले तिल से की पूजा
शनि देव की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनि महाराज को आशीर्वाद दिया कि जो भी व्यक्ति मकर संक्राति के दिन काले तिल से सूर्य की पूजा करेगा उसके सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाएंगे। इस दिन तिल से सूर्य पूजा करने पर आरोग्य सुख में वृद्धि होती है। शनि के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं तथा आर्थिक उन्नति होती है। तिल का भोग लगाने के बाद उसे प्रसाद के रूप में भी ग्रहण करना चाहिए।

 

 

भीष्म पितामाह ने चुना था आज का दिन
मान्यता है कि इस अवसर पर दिया गया दान 100 गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कंबल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रांति का ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं।

Author : Ashok Chaudhary
Loading...

Share With

You may like

Leave A Reply

Follow us on

Loading...

आपके लिए

TRENDING