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शारदा घोटाला क्या है, जानिए किस-किस का नाम है इसमेें

  • 05 February,2019
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शारदा घोटाला क्या है, जानिए किस-किस का नाम है इसमेें

नई दिल्ली:

शारदा स्कैम पर कोलकाता से दिल्ली तक कोहराम मचा हुआ है. कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के घर जांच करने पहुंची सीबीआई टीम को ही पुलिस ने अरेस्ट कर लिया. राजीव कुमार पर आरोप है कि उनकी अगुवाई में साल 2013 में हुई एसआईटी जांच में घोटाले से जुड़े सबूतों से छेड़छाड़ की गई. कुछ नामी लोगों को जानबूझकर एसआईटी जांच में क्लीन चिट दी गई. कोलकाता पुलिस कमिश्नर सीबीआई जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं. उनको कई बार समन जारी किया गया. इसके बाद भी वे जांच के लिए सीबीआई के सामने पेश नहीं हुए. अब सुप्रीम कोर्ट ने राजीव कुमार को सीबीआई के सामने पूछताछ के लिए हाजिर होने को कहा है. इन सबसे शारदा चिटफंड घोटाला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है. आखिर क्या है ये घोटाला? आइए जानते हैं. पर इससे पहले चिटफंड को समझना जरूरी ह

क्या है चिटफंड
चिटफंड होता है छोटी-छोटी बचत को इकट्ठा करना. ऐसी स्कीमों के जरिए बचत भी हो जाती है और इनसे उधार भी मिल जाता है. चिटफंड स्कीमों में हर महीने कुछ पैसा डालते रहते हैं. चिटफंड स्कीमें चिटफंड एक्ट 1982 के तहत चलाई जाती हैं. इनको राज्य सरकारें मान्यता देती हैं. इसी की आड़ लेकर लोगों ने बड़े-बड़े घोटाले कर डाले.

क्या है शारदा चिटफंड घोटाला
शारदा चिटफंड स्कैम की शुरुआत साल 2000 के दशक में हुई. बिजनेसमैन सुदीप्तो सेन ने इस ग्रुप की स्थापना की. सुदीप्तो ने इस ग्रुप के तहत 4-5 प्रमुख कंपनियों के अलावा 239 कंपनियां बनाईं. आरोप हैं कि सुदीप्तो ने अपनी प्रमुख कंपनियों शारदा रीयलिटी, शारदा कंस्ट्रक्शन, शारदा टूर एंड ट्रैवेल और शारदा एग्रो की अलग-अलग स्कीमें लोगों के बीच जारी कीं. इन कंपनियों ने 3 तरह की स्कीमें चलाईं. ये तीन स्कीमें थीं- फिक्स्ड डिपॉजिट, रिकरिंग डिपॉजिट और मंथली इनकम डिपॉजिट. इन स्कीमों के जरिए भोले भाले जमाकर्ताओं को बताया गया कि उनको निवेश के बदले 25 गुना ज्यादा रिटर्न मिलेगा. साथ ही, प्रॉपर्टी या फॉरेन ट्रिप भी मिलेगी. इस तरह शारदा ग्रुप ने साल 2008 से 2012 तक चार कंपनियों के जरिए पॉलिसी जारी करके रुपए इकट्ठे किए. ग्रुप की एक स्कीम ऐसी थी, जिसमें कहा गया कि अगर आप कंपनी में 1 लाख रुपए लगाते हैं, तो 25 साल बाद कंपनी की ओर से आपको 34 लाख रुपए वापस मिलेंगे. जगह-जगह एजेंट नियुक्त करके छोटे निवेशकों से उनकी बचत के पैसे इकट्ठे किए गए. बिजनेस टुडे के मुताबिक इन स्कीमों के जरिए करीब 14 लाख छोटे निवेशकों से 12,00 करोड़ रुपए जुटाए गए. कंपनी ने पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, झारखंड और त्रिपुरा जैसे प्रदेशों में करीब 300 ऑफिस खोल रखे थे. ग्रुप के चेयरमैन सुदीप्त सेन का ग्रुप की सभी कंपनियों की सभी जमा रकम पर पूरा कंट्रोल था. अब तक ग्रुप मीडिया आदि क्षेत्रों में भी पैर फैला चुका था. ग्रुप तारा न्यूज और तारा म्यूजिक चैनल चलाने के साथ-साथ कई बांग्ला, इंगलिश और हिंदी न्यूज पेपर चला रहा था.

कैसे हुआ खुलासा ?
साल 2009 तक शारदा का नाम पश्चिम बंगाल में पूरी तरह चर्चा में आ चुका है. नेता से लेकर फिल्मी दुनिया तक के कई लोग इस ग्रुप से किसी न किसी रूप से जुड़ते जा रहे थे. शारदा ग्रुप ने जनता के बीच अपनी छवि बनाने के लिए कोलकाता के प्रसिद्ध मोहन बागान और ईस्ट बंगाल फुटबाल क्लब में निवेश कर रखा था. ग्रुप प्रसिद्ध दुर्गा पूजा को भी स्पांसर करता था. सेबी भी इस ग्रुप पर नजर बनाए हुए थी. सेबी ने ग्रुप से साल 2012 में कहा कि इस तरह की जमा स्कीमों को फौरन बंद किया जाए.7 दिसंबर, 2012 को भारतीय रिज़र्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर डी सुब्बाराव ने इस तरह की स्कीमों पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार से कहा. मगर ग्रुप ने जमा स्वीकार करना बंद नहीं किया. जनवरी, 2013 में अचानक से ग्रुप के निवेशकों को पैसा वापस मिलना बंद हो गया. इस पर 6 अप्रैल, 2013 को उसने सीबीआई को एक चिट्ठी लिखी. इस चिट्ठी में उसने कहा कि उसने जो पैसा लोगों से इकट्ठा किया है, उसका बड़ा हिस्सा कई नेताओं की जेब में गया है. इसी चिट्ठी में उसने आरोप लगाया कि टीएमसी सांसद कुणाल घोष उस पर शारदा ग्रुप का मीडिया ग्रुप बेचने का दबाव डाल रहे हैं. ये चिट्ठी लिखने के बाद ही सुदीप्त सेन 10 अप्रैल, 2013 को कोलकाता से भाग निकला. इसके बाद ये आग पूरे बंगाल में फैल गई.

 

लाखों निवेशक एक साथ सड़क पर आ गए. अप्रैल, 2013 के अंत तक ग्रुप पूरे देश में चर्चा में आ गया. सुदीप्तो सेन और शारदा ग्रुप के खिलाफ पश्चिम बंगाल के बिधाननगर थाने में हजारों एफआईआर दर्ज की गईं. सुदीप्त के भागते ही 17 अप्रैल, 2013 को करीब 600 कलेक्शन एजेंट शारदा ग्रुप के हेड ऑफिस के बाहर इकट्ठे हुए. इन लोगों ने राज्य की ममता बनर्जी सरकार से मामले में दखल देने की गुजारिश की. देखते-देखते ये घोटाला पूरे राज्य में फैल गया. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक राज्य सरकार के लाखों घरों में इस घोटाले का असर देखने को मिला. 18 अप्रैल, 2013 को सुदीप्तो सेन के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो गया. 23 अप्रैल, 2013 को कश्मीर के सोनमर्ग से सुदीप्तो को गिरफ्तार कर लिया गया.

ममता ने क्या कदम उठाए?
सुदीप्तो की चिट्ठी में तृणमूल सांसद कुणाल घोष और कुछ दूसरे नेताओं का नाम आने के बाद ये घोटाला राजनीतिक रूप से भी चर्चा में आ गया. इस पर राज्य की ममता बनर्जी सरकार ने आनन-फानन में इस पर कार्रवाई की. ममता ने 22 अप्रैल, 2013 को इलाहाबाद हाईकोर्जट के रिटायर्ड जज श्यामल कुमार सेन की अध्यक्षता में एक जांच समिति बनाने का ऐलान किया. कहा की ये कमेटी पूरे मामले की तहकीकात करेगी. इसके अगले ही दिन ममता बनर्जी ने छोटे निवेशकों की रकम लौटाने के लिए 500 करोड़ रुपए का रिलीफ फंड बनाने का ऐलान किया. ममता बनर्जी ने कहा कि इस फंड के जरिए छोटे निवेशकों का पैसा लौटाया जाएगा. इसके लिए पैसा जुटाने के लिए राज्य सरकार ने तंबाकू प्रोडक्ट्स पर 10 फीसदी का अतिरिक्त टैक्स लगा दिया. राज्य सरकार ने एक स्पेशल इनवेस्टीगेशन टीम के गठन का भी ऐलान किया. इसी एसआईटी का चीफ राजीव कुमार को बनाया गया. ममता सरकार किसी भी सीबीआई या ईडी की जांच के खिलाफ थी.

फिर क्या हुआ?
ये सब चल ही रहा था तभी आरटीआई एक्टिविस्ट अखिल गोगोई ने 22 अप्रैल, 2013 को गुवाहाटी हाईकोर्ट में और एडवोकेट बासबी राय चौधरी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में इस मामले में जनहित याचिका दाखिल कर दी. दोनों में शारदा ग्रुप की सीबीआई जांच की मांग की गई. कलकत्ता हाईकोर्ट में राज्य सरकार ने बताया कि मामले की एसआईटी जांच चल रही है. इस पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से एसआईटी जांच जारी रखने को कहा. और कहा कि इसकी रिपोर्ट हाईकोर्ट में समय-समय पर दाखिल की जाए. हाईकोर्ट के इस आदेश को जुलाई, 2013 में याचियों ने सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया. पर सुप्रीम ने शारदा ग्रुप समेत ओडिशा, झारखंड और त्रिपुरा में चल रही सभी लोक लुभावन स्कीमों की सीबीआई जांच के आदेश दिए. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय एजेंसियों को राज्य की जांच एजेंसी के साथ मिलकर काम करने को कहा गया. सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की एसआईटी को सारे दस्तावेज सीबीआई को सौंपने को कहा.

 

टीएमसी के नेता कैसे जुड़े थे इससे?
इस केस को जैसे ही सीबीआई को हैंडओवर किया गया तृणमूल कांग्रेस के कई नेता सवालों के घेरे में आ गए. सुदीप्तो सेन ने शारदा ग्रुप को ब्रैंड बनाने के लिए बंगाली फिल्म इंडस्ट्री में बड़ा निवेश कर रखा था. बंगाली फिल्म इंडस्ट्री की एक्टर और टीएमसी सांसद शताब्दी राय और बॉलीवुड एक्टर और टीएमसी सांसद मिथुन चक्रवर्ती ग्रुप के ब्रैंड अंबेस्डर थे. तृणमूल कांग्रेस के एक दूसरे राज्यसभा सांसद कुणाल घोष शारदा ग्रुप की मीडिया कंपनी के सीईओ थे. इस ग्रुप में करीब 1500 कर्मचारी काम करते थे. और ग्रुप साल 2013 में अलग-अलग भाषाओं में 8 न्यूजपेपर चला रहा था. शारदा ग्रुप के सेवेन सिस्टर्स पोस्ट और बंगाल पोस्ट इंगलिश में. शकलबेला और कलोम बंगाली में, प्रभात वार्ता जैसे अखबार हिंदी में छपते थे. ग्रुप तारा न्यूज चैनल भी चलाता था. कुणाल घोष शारदा ग्रुप के चैनल से महीने की 16 लाख रुपए सेलरी उठाते थे. टीएमसी के दूसरे सांसद श्रंजय बोष भी शारदा ग्रुप की मीडिया कंपनी से जुड़े थे. जांच शुरू करने के कुछ ही दिनों के भीतर सीबीआई ने तृणमूल कांग्रेस के दो राज्यसभा सदस्यों कुणाल घोष और श्रंजय बोस को गिरफ्तार कर लिया.

सीबीआई ने टीएमसी के उपाध्पक्ष और पश्चिम बंगाल के पूर्व डीजीपी रजत माजूमदार और एक फुटबाल क्लब से जुड़े देबब्रत सरकार को गिरफ्तार कर लिया गया. फिर 12 दिसंबर, 2014 को राज्य के खेल और परिवहन मंत्री मदन मित्रा को भी गिरफ्तार कर लिया. मदन मित्रा पर शारदा ग्रुप की कंपनियों की कर्मचारी यूनियन के नेता थे. आरोप है कि वे लोगों से खुलेआम कहते थे कि शारदा ग्रुप की कंपनियों में निवेश करो. वे जिन गाड़ियों पर चलते थे, उनको शारदा ग्रुप ने स्पांसर किया था. शारदा ग्रुप ऑटोमोबाइल कंपनी और सीमेंट कंपनी भी चलाता था. शारदा ग्रुप की सीमेंट कंपनी से सूबे के कपड़ा मंत्री श्यामपदा मुखर्जी के जुड़े होने के आरोप लगे. असम सरकार के मंत्री हेमंत बिश्वशर्मा पर भी इस ग्रुप से लाभ लेने के आरोप लगे. शर्मा पहले कांग्रेस में थे. ईडी ने उनकी पत्नी रिंकी से फरवरी, 2015 में पूछताछ की थी. उन पर आरोप था कि उन्होंने अपने चैनल पर शारदा ग्रुप के विज्ञापन चलाने के लिए रुपए लिए. इसी तरह के आरोप कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मतंग सिंह पर भी लगे. ईडी ने टीएमसी सांसद अर्पिता घोष से भी पूछताछ की. सीबीआई ने तृणमूल कांग्रेस के नेता और ममता बनर्जी के करीबी मुकुल राय से भी पूछताछ की. बाद में मुकुल राय भाजपा में शामिल हो गए.

कांग्रेस ने घेरना शुरू किया था ममता बनर्जी को
मार्च, 2013 में केंद्रीय कंपनी मामलों के राज्यमंत्री सचिन पायलट ने लोकसभा में बताया कि शारदा ग्रुप के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी गई है. 25 अप्रैल, 2013 को इनकम टैक्स विभाग ने जांच शुरू की. फिर प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया. 7 मई 2013 को मनमोहन सरकार ने एक अंतर मंत्रालयी मंत्री समूह का गठन किया. इसमें कंपनी मामलों के अधिकारी, सेबी, आरबीआई के अधिकारी भी शामिल किए गए. इनको पोंजी स्कीम की जांच सौंपी गई. कहा जाता है कि इस कार्रवाई के बाद ही ममता बनर्जी ने यूपीए-2 सरकार से दूरी बनानी शुरू कर दी थी.

 

मोदी ने चुनाव में ममता को घेरा
सुदीप्त सेन की चिट्ठी के बाद सीपीएम ने टीएमसी पर घोटालेबाजों से जुड़े होने का आरोप लगाया. टीएमसी ने तब के केंद्रीय वित्तमंत्री पी चिदंबरम की पत्नी नलिनी चिदंबरम पर आरोप लगाया. आरोप लगा कि नलिनी चिदंबरम ने शारदा ग्रुप से एक वकील के तौर पर फीस वसूल की. टीएमसी ने सीपीएम पर आरोप लगाया कि इस तरह की पोंजी स्कीमें चलाने वाली कंपनियां सीपीएम के दौर में फली-फूलीं. ये कंपनियां सीपीएम के दौर में रजिस्टर्ड हुईं. साल 2014 के लोकसभा के चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने इस घोटाले को लेकर ममता बनर्जी पर आरोप लगाए. मोदी ने आरोप लगाया कि शारदा ग्रुप ने ममता बनर्जी की बनाई एक पेंटिंग 1 करोड़ 80 लाख रुपए में खरीदी. इस तरह इस घोटाले से ममता बनर्जी को सीधे लाभ पहुंचा है. इसके जवाब में ममता बनर्जी ने मोदी को गुजरात दंगों पर घेरा. टीएमसी ने सीबीआई पर एकतरफा जांच का आरोप लगाया.

 

कितनों के घर उजड़ गए?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस घोटाले से लाखों लोगों के जीवन भर की बचत लुट गई. अब तक करीब 210 एजेंट और निवेशक अपनी जान दे चुके हैं. सितंबर, 2014 में आनंद बाजार पत्रिका ने एक रिपोर्ट ने कहा कि टीएमसी सांसद अहमद हसन इमरान का बांग्लादेश के संगठन जमात-ए-इस्लामी से संबंध है. इमरान सिमी का पूर्व कार्यकर्ता है. आरोप लगे कि इनके जरिए ये फंड आतंकी संगठन को गया है. इसकी भी जांच चल रही है.

पुलिस का क्या जुड़ाव है इस केस से?
ममता बनर्जी ने इस केस की जांच स्पेशल इनवेस्टीगेशन टीम से कराई थी. इस एसआईटी के हेड राजीव कुमार थे. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि राज्य सरकार की एजेंसियां जांच में सीबीआई को सहयोग करें. अब सीबीआई उस एसआईटी से शारदा जांच से जुड़े दस्तावेज कलेक्ट करना चाहती है. आरोप हैं कि इसके लिए सीबीआई ने अक्टूबर, 2017 से अब तक 5 बार समन जारी किए. मगर कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार जांच प्रक्रिया में शामिल नहीं हुए. वो हर बार कोई न कोई बहाना बना देते हैं. राजीव कुमार की एसआईटी के पास सुदीप्तो सेन की एक डायरी है. इसमें उन लोगों के नाम लिखे हैं, जिनको उसने पैसा दिया है. सीबीआई इसी डायरी को हासिल करने का प्रयास कर रही है. एसआईटी के पास कुछ कॉल डिटेल और बैंक डिटेल्स भी हैं.

Author : Ashok Chaudhary
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