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CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने का नोटिस: 193 विपक्षी सांसदों की एकजुटता, पर असली लड़ाई अब शुरू

By tvlnews March 13, 2026
CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने का नोटिस: 193 विपक्षी सांसदों की एकजुटता, पर असली लड़ाई अब शुरू

भारत की संसदीय राजनीति में शुक्रवार को एक असाधारण मोड़ तब आया, जब 193 विपक्षी सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग वाला नोटिस संसद के दोनों सदनों में जमा किया। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक इन हस्ताक्षरों में 130 लोकसभा सांसद और 63 राज्यसभा सांसद शामिल हैं। यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर सीधे सवाल उठाने वाला कदम है। कई रिपोर्टों ने इसे किसी मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ पहली ऐसी कोशिश बताया है।

यह घटनाक्रम इसलिए भी बड़ा है क्योंकि ज्ञानेश कुमार अभी पद पर अपेक्षाकृत नए हैं। चुनाव आयोग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार उन्होंने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला था। यानी जिस पद को संविधान ने असाधारण सुरक्षा दी है, उसी पदधारी के खिलाफ विपक्ष ने अब हटाने की औपचारिक संसदीय राह खोलने की कोशिश की है।

मामले का केंद्र केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता है। संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को संसद, राज्य विधानसभाओं और राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के चुनावों की देखरेख, दिशा और नियंत्रण का दायित्व देता है। यही कारण है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सामान्य सरकारी पदों जैसी नहीं रखी गई; उसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी सुरक्षा दी गई है, ताकि सरकारें या राजनीतिक दल केवल असहमति के आधार पर आयोग को दबाव में न ला सकें।

विपक्ष का आरोप है कि यह सुरक्षा अब जवाबदेही की ढाल नहीं, बल्कि कथित पक्षपात पर पर्दा बनती दिख रही है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार नोटिस में सात तरह के आरोप गिनाए गए हैं, जिनमें “पक्षपाती और भेदभावपूर्ण आचरण”, कथित चुनावी अनियमितताओं की जांच में बाधा, और बड़े पैमाने पर मतदाताओं के अधिकार प्रभावित होने जैसे आरोप शामिल हैं। यह भी कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी SIR, को लेकर उठे विवाद ने इस पूरे अभियान को गति दी।

विपक्षी खेमे में इस कदम की अगुवाई तृणमूल कांग्रेस ने की। बीते कुछ दिनों की रिपोर्टों में यह सामने आया कि पश्चिम बंगाल यात्रा के दौरान चुनाव आयोग और राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के बीच तनाव तेज हुआ। तृणमूल ने आरोप लगाया कि उसके प्रतिनिधिमंडल के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त का व्यवहार अनुचित था; इसके बाद हटाने के प्रस्ताव की चर्चा खुलकर सामने आने लगी। बाद में यही पहल व्यापक विपक्षी समर्थन जुटाकर संसद तक पहुंची।

लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग और स्वयं ज्ञानेश कुमार ने हाल के आधिकारिक बयानों में कहा है कि पश्चिम बंगाल में SIR पूरी पारदर्शिता के साथ हुआ, उसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई पात्र मतदाता छूटे नहीं और कोई अपात्र नाम शामिल न रहे। आयोग ने यह भी कहा कि चुनाव “निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र” तरीके से कराए जाएंगे और हिंसा या मतदाता-धमकी के प्रति “जीरो टॉलरेंस” रहेगा। चुनाव आयोग की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में तो यह दावा भी किया गया कि अधिकांश राजनीतिक दलों ने SIR अभ्यास की सराहना की।

यही विरोधाभास इस पूरे विवाद को और गंभीर बनाता है। एक ओर विपक्ष कह रहा है कि मतदाता सूचियों, जांच और व्यवहार में पक्षपात हुआ; दूसरी ओर आयोग कह रहा है कि प्रक्रिया कानूनसम्मत, पारदर्शी और समावेशी रही। इसलिए यह मामला केवल राजनीतिक नारों से तय नहीं होगा। संसदीय और कानूनी प्रक्रिया में अब असली सवाल यह होगा कि क्या आरोप इतने गंभीर और प्रमाणित स्वरूप के हैं कि उन्हें “proved misbehaviour or incapacity” यानी सिद्ध दुराचार या अक्षमता के दायरे में रखा जा सके।

यहीं से संवैधानिक प्रक्रिया शुरू होती है, और यहीं अधिकांश सार्वजनिक चर्चा अक्सर भ्रमित हो जाती है। मीडिया और राजनीति में इसे कई बार “महाभियोग” कहा जा रहा है, लेकिन तकनीकी रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 324(5) से आती है। इस प्रावधान में साफ लिखा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रकार और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। यानी यह कोई सामान्य अविश्वास प्रस्ताव नहीं है।

हटाने की औपचारिक शुरुआत के लिए भी एक निश्चित दहलीज है। जजेज़ इन्क्वायरी एक्ट, 1968 के अनुसार यदि ऐसा नोटिस लोकसभा में दिया जाता है तो उस पर कम-से-कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए; राज्यसभा में यह संख्या कम-से-कम 50 है। इस कसौटी पर विपक्ष का दावा अभी मजबूत दिखता है, क्योंकि 130 लोकसभा और 63 राज्यसभा हस्ताक्षरों की संख्या इन दोनों न्यूनतम सीमाओं से ऊपर है। इसका मतलब यह नहीं कि CEC हट गए; इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि प्रारंभिक प्रवेश-द्वार पार करने की कोशिश सफल हुई है।

इसके बाद सबसे अहम भूमिका लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति की होती है। कानून कहता है कि वे नोटिस को स्वीकार भी कर सकते हैं और खारिज भी। अगर नोटिस स्वीकार होता है, तभी आगे जांच की प्रक्रिया शुरू होती है। यदि दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस दिया गया हो और दोनों इसे स्वीकार करें, तो एक संयुक्त तीन-सदस्यीय समिति गठित होती है। इस समिति में एक सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश, एक हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश और एक प्रख्यात विधिवेत्ता शामिल होता है।

यह समिति केवल कागजी औपचारिकता नहीं होती। अधिनियम के अनुसार समिति आरोप तय करती है, संबंधित पदाधिकारी को बचाव का अवसर देती है, दस्तावेज़ मांग सकती है, गवाह बुला सकती है, और सिविल कोर्ट जैसी कुछ शक्तियां भी रखती है। यानी अगर नोटिस प्रवेश स्तर पार कर गया, तो लड़ाई राजनीतिक मंच से कानूनी-संसदीय मंच पर शिफ्ट हो जाएगी, जहां नारे नहीं, आरोपों के प्रमाण मायने रखेंगे।

समिति की रिपोर्ट के बाद भी रास्ता आसान नहीं है। यदि समिति कहती है कि दुराचार या अक्षमता साबित नहीं हुई, तो मामला वहीं खत्म हो जाता है। लेकिन अगर समिति आरोपों को सही मानती है, तब भी CEC तुरंत नहीं हटते। तब दोनों सदनों को उसी सत्र में प्रस्ताव पारित करना पड़ता है, और वह भी साधारण बहुमत से नहीं, बल्कि दोहरी विशेष बहुमत से: सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत, और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों में कम-से-कम दो-तिहाई का समर्थन। इसके बाद ही राष्ट्रपति के समक्ष हटाने का पता भेजा जा सकता है।

यही वह चरण है जहां विपक्ष की राजनीतिक कठिनाई सबसे साफ दिखती है। शुरुआती हस्ताक्षर जुटाना एक बात है; दोनों सदनों में विशेष बहुमत पाना बिल्कुल दूसरी। इसी कारण कई राजनीतिक आकलनों में यह कहा गया कि यह कदम संस्थागत दबाव और राजनीतिक संदेश के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है, जबकि अंतिम परिणाम तक पहुंचना कहीं अधिक कठिन होगा। कुछ रिपोर्टों में विपक्ष के भीतर भी इसे चुनाव-पूर्व “poll optics” या प्रतीकात्मक दबाव की रणनीति के रूप में देखा गया।

फिर भी इस कदम को केवल प्रतीकात्मक कहकर खारिज करना जल्दबाज़ी होगी। भारत में चुनाव आयोग की निष्पक्षता लोकतांत्रिक व्यवस्था की केन्द्रीय शर्त है। अगर विपक्ष यह संदेश देना चाहता है कि मतदाता सूची, चुनाव-पूर्व प्रशासनिक हस्तक्षेप, या आयोग के व्यवहार को लेकर उसकी चिंताएं अब संसद के रिकॉर्ड का हिस्सा बनेंगी, तो यह स्वयं में बड़ी राजनीतिक घटना है। दूसरी तरफ, यदि आयोग आधिकारिक रूप से यह दोहराता है कि वह कानून के दायरे में और पूरी पारदर्शिता से काम कर रहा है, तो यह लड़ाई संस्थागत भरोसे की भी बन जाती है।

इस पूरे विवाद में पश्चिम बंगाल का संदर्भ निर्णायक है। आधिकारिक समीक्षा बैठक के बाद चुनाव आयोग ने कहा कि उसने राज्य में चुनाव-तैयारी, कानून-व्यवस्था, प्रवर्तन, EVM प्रबंधन और मतदाता सुविधा जैसे मुद्दों पर व्यापक समीक्षा की। साथ ही आयोग ने यह भरोसा भी दिया कि हिंसा और मतदाता-धमकी पर सख्ती होगी। पर दूसरी ओर, राजनीतिक दलों के बीच खासकर SIR को लेकर अविश्वास बना रहा। यही अविश्वास अब संवैधानिक विवाद में बदल चुका है।

मामले का एक संस्थागत आयाम भी है, जिसे अक्सर रोज़मर्रा की राजनीतिक बहस ढक देती है। अनुच्छेद 324(5) का दूसरा हिस्सा बताता है कि अन्य चुनाव आयुक्तों या क्षेत्रीय आयुक्तों को हटाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश चाहिए। इससे स्पष्ट है कि संविधान ने CEC को आयोग के भीतर भी एक संरक्षित धुरी की तरह रखा है। इसीलिए CEC के खिलाफ हटाने का नोटिस महज व्यक्ति-विरोध नहीं, बल्कि चुनावी प्रशासन की शीर्ष संवैधानिक संरचना को चुनौती देने जैसा है।

यह भी याद रखना होगा कि चुनाव आयोग पर सवाल उठना नया नहीं, लेकिन हटाने की संसदीय प्रक्रिया शुरू करना बहुत बड़ा कदम है। कई रिपोर्टों में इसे पहली ऐसी कोशिश बताया गया है। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो आने वाले दिनों में स्पीकर और सभापति का रुख, समिति गठन पर फैसला, और फिर आरोपों की जांच—ये सभी चरण राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहेंगे। अगर नोटिस शुरुआती स्तर पर ही खारिज हो गया, तब भी विपक्ष चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर एक बड़ा सार्वजनिक अभियोग दर्ज करा चुका होगा।

अंततः यह मामला तीन स्तरों पर पढ़ा जाना चाहिए। पहला, यह तत्काल राजनीतिक संघर्ष है, जिसमें विपक्ष चुनावी निष्पक्षता का सवाल उठा रहा है। दूसरा, यह संवैधानिक परीक्षण है, क्योंकि हटाने की प्रक्रिया बेहद कठिन रखी गई है। तीसरा, यह लोकतांत्रिक भरोसे की लड़ाई है: क्या जनता आयोग को निष्पक्ष मानती है, और क्या राजनीतिक दल आयोग के साथ न्यूनतम विश्वास-संबंध बनाए रख पा रहे हैं। 193 सांसदों के नोटिस ने यह बहस संसद के भीतर पहुंचा दी है; अब तय प्रक्रिया बताएगी कि यह विवाद राजनीतिक शोर साबित होगा या संवैधानिक संकट का गंभीर अध्याय



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