फर्जी शिक्षा क्रांति: क्या दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले स्कूलों की दशा बदल गई है..?, सामाजिक कार्यकर्ता शबीना खान

  • 31 January,2019
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फर्जी शिक्षा क्रांति: क्या दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले स्कूलों की दशा बदल गई है..?, सामाजिक कार्यकर्ता शबीना खान

नई दिल्ली: दिल्ली और इस जैसे महानगरों व छोटे शहरों के स्कूल-कॉलेजों को देखकर आप भ्रम में मत पड़िए। देश में शिक्षा के विकास का क्या स्तर है..?,  स्कूलों के नाम पर जो भी संस्थान चल रहा है, उसे पहले मान्यता प्राप्त करनी होगी और मान्यता तभी मिलेगी, जब उसके पास फैसिलिटीज होंगी। प्ले स्कूलों के लिए हमने कहा था कि वहां हवा, रोशनी, बिजली, पानी और टायलेट की पर्याप्त व्यवस्था हो। आज भी कई बड़े सरकारी और पब्लिक स्कूलों तक में टायलेट नहीं हैं, अगर हैं, तो वे इस्तेमाल करने लायक नहीं। लड़कियां और महिला टीचर आस पड़ोस में जाती हैं। राजधानी की झुग्गियों और आसपास के गांवों में हजारों प्ले स्कूल चल रहे हैं, जहां बच्चे अंधेरे कमरों में मुर्गियों की तरह भरे होते हैं। इससे उनकी आँखें खराब होती हैं, उनकी सेहत पर असर पड़ता है।

 

यह सब तमाशा है। इससे कुछ नहीं होने वाला। अदालतों को तो इस मामले में पड़ना ही नहीं चाहिए। प्रशासन और सीबीएसई चाहें, तो बहुत कुछ किया जा सकता है। मैं फिर कहूंगा कि मारामारी केवल 200-250 पब्लिक स्कूलों के लिए है। यानी बात हो रही है मिडल इनकम और अमीर वर्ग की। गरीबों के बच्चे कैसे पढ़ रहे हैं, उस बारे में न तो अदालतें सोचती हैं, न मीडिया।

 

सामाजिक कार्यकर्ता शबीना खान 

हम इस सिलसिले में सामाजिक कार्यकर्ता शबीना खान (Social worker Shabina Khan)  से बात की| उन्होने दिल्ली के स्कूलों के बारे में जानकारी दी| सामाजिक कार्यकर्ता शबीना खान ने कहा कि,  दिल्ली सरकार के मुखिया अरविंद केजरीवाल (Arvind kejriwal) और छोटे मुखिया मनीष सिसोदिया (Manish Sisodia) लगातार इस बात का ढ़ोल पीटते रहे हैं,  कि उन्होंने दिल्ली में दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले स्कूलों की दशा बदल दी है।

 

 

शबीना खान ने कहा कि, कई बार सोशल मीडिया पर इस तरह की फोटो आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं एंव समर्थकों द्वारा पोस्ट की जाती रही हैं जिसमें दिल्ली के सरकारी स्कूलों का ढ़ंग ‘लग्ज़री’ स्कूल की तरह दिखाया जाता है। दिल्ली सरकार ने शिक्षा और स्कूलों पर कार्य किया होगा

 

उन्होने कहा कि, इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन सवाल यह है कि वह कार्य कहां और किन क्षेत्रों में किया गया है ? दिल्ली के मुस्लिम बाहुल्य इलाक़े ओखला एंव जामियानगर में तीन स्कूल हैं|

 

शबीना खान ने कहा कि, जिसमें से जसोला स्कूल ज्वलंत उदाहरण है,  जहां पर 2500 छात्र/छात्राओं पर सिर्फ 35 स्थायी अध्यापक हैं, इसी तरह ओखला की सात लाख की आबादी पर सिर्फ एक स्कूल में 120 छात्रों के लिये ही साईंस का कोर्स है, और इस विद्यालय में भी बीते दो साल से साईंस और गणित का अध्यापक ही नही है।

 

 

उन्होने कहा कि,  हद तो यह है कि जसोला स्कूल में चार अध्यापक जो रहते तो राजस्थान में हैं लेकिन वेतन वे दिल्ली सरकार से लेते हैं, इस स्कूल में घंटा तक नही है, लेकिन दिल्ली सरकार शिक्षा क्रान्ति का ढ़ोल पीटने में कोई कमी नहीं छड़ रही है।

 

दिल्ली में छ अल्पसंख्यक विद्यालय बंद कर दिये गए

दिल्ली में छ अल्पसंख्यक विद्यालय बंद कर दिये गए हैं, और दिल्ली सरकार जहां इतनी बड़ी ‘शिक्षा क्रान्ति’ करने का ढ़ोल पीट रही है वहीं मुस्तफाबाद और शीलमपुर जैसे मुस्लिम इलाकों में अभी भी टैंट में स्कूल चल रहे हैं। दिल्ली के कुल तीन हजार सरकारी स्कूलों में डेढ़ लाख से अधिक कमरे पहले से ही मौजूद थे|

 

दिल्ली सरकार ने नए स्कूल बनाने के बजाय तमाम स्थापित मानकों के अनुसार बच्चों के खेल कूद के लिये छोड़ी गई ज़मीन पर नए कमरे बनवाकर बच्चो से खेल कूद की ज़मीन भी छीन ली|

 

 

दिल्ली के कई ग़रीब इलाकों, जैतपुर, मीठापुर, बदरपुर, तुगलकाबाद, संगम विहार के सरकारी स्कूलों की कक्षाओ के एक ही सेक्शन में डेढ़ सौ से भी ज्यादा छात्र/छात्राऐं हैं, केजरीवाल सरकार ने स्कूलों को अपनी फर्जी शिक्षा क्रान्ति के द्वारा राजनीति का अखाड़ा बना दिया है।

 

 

 

 

Author : kapil patel

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