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नवनिर्वाचित सरकार के विरुद्ध रविदासिया कौम का पहला सबसे बड़ा आंदोलन ”विद्रोह के स्वर हो चले हैं अनमने..

  • by: news desk
  • 15 September, 2019
नवनिर्वाचित सरकार के विरुद्ध रविदासिया कौम का पहला सबसे बड़ा आंदोलन ”विद्रोह के स्वर हो चले हैं अनमने..

” विद्रोह के स्वर हो चले हैं अनमने.. भारत की नवनिर्वाचित भारी बहुमत वाली सरकार जो की पूरी तरह बहुसंख्यक आबादी का भावनात्मक दोहन कर 300 से अधिक सांसदों के साथ सत्ता में दोबारा आए अभी साल भर भी नहीं बीते की विद्रोह के स्वर अनमने होने लगेl वैसे तो कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ रेप पीड़िता मामले को लेकर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी एवं विभिन्न संगठनों ने देशभर में छोटे बड़े आंदोलन जरूर किए|



लेकिन इस बीच सबसे बड़ा या इस नवनिर्वाचित सरकार के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा उलगुलान रविदासिया समाज में 21 तारीख को किया| वह भी उस दौर में जब सभी राजनीतिक पार्टियां सन्नाटे में हैं, विरोध के स्वर संसद में सुनाई नहीं दे रहे हैं, हर विधेयक के पेश होते समय यह डर बना रहता है कि पता नहीं कौन सी विपक्षी पार्टी कब घुटने टेक दे, बुद्धिजीवी पाला बदलने की जुगत भिड़ा रहे हैं, तब रविदासिया कौम ने नए शासन में पहली बार विपक्ष की भूमिका निभाई है और सरकार की आंख में आंख डालकर कहा है कि, तुम बेईमान हो, तुम जुल्मी हो, तुम जातिवादी हो, संभल जाओ!



‘कीमत तो चुकानी ही पड़ती है, लेकिन कायरों का फिर कहा इतिहास होता है..?



बता दें कि कि सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद डीडीए ने 10 अगस्त 2019 को दिल्ली तुग़लकाबाद इलाके में स्थित रविदास मंदिर को गिरा दिया था, जिसके बाद उनके अनुयायियों समेत देशभर के दलित समुदायों में काफी रोष था तथा इसके विरोध में देशभर में छोटे-बड़े प्रतीकात्मक विद्रोही देखे गए लेकिन यह रोष संयुक्त रूप से 21अगस्त को रामलीला मैदान में देखने को मिला, जिसमें लाखों की संख्या में उनके अनुयाई एवं देश भर के तमाम दलित संगठनों के नेता एवं कार्यकर्ता ने पूरा रामलीला मैदान भर दिया, पूरे दिल्ली भर में जगह-जगह सड़के जाम देखने को मिली, इसके अतिरिक्त कई अन्य राज्य में भी प्रतीकात्मक विरोध करते हुए लोग दिखाई दिए, दिनभर आंदोलन शांत रहा परंतु शाम को कुछ अशांति देखने को मिली जिसको प्रशासन ने अपने तरीके से निपटाl





 



 



इतने बड़े आंदोलन के बाद भी सरकार की ओर से आश्वासन देने की बात तो दूर ऊपर से प्रशासन द्वारा इससे निपटने के लिए भी पूरी छूट दी गई जिससे उनके काफी अनुयाई चोटिल भी हुई, कुछ को तो अशांति फैलाने के आरोप में जेल भी भेज दिया गया, जिसमें भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर का नाम प्रमुख है, पूरा दिन यह घटना चला लेकिन किसी मीडिया चैनल ने इसे निष्पक्षता से कवरेज नहीं किया, मीडिया कांग्रेस नेता पी चिदंबरम को दिन भर ढूंढती रहीl



 



इस घटना मीडिया की भी निष्पक्षता एवं विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है| हालांकि कुछ भी हो विद्रोह काफी लोकतांत्रिक था, लोकतंत्र में ऐसे विद्रोह को नकारा नहीं जा सकता, ऐसे विद्रोह का सम्मान किया जाना चाहिए, परिणाम क्या होता है यह देखना शेष है, लेकिन यह जरूर है कि नवनिर्वाचित सरकार के खिलाफ यह पहला संगठित विद्रोह जरूर हैl



(अमित कुमार मंडल, लेखक- लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग का छात्र)


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