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भारत रत्न नानाजी ने गोरखपुर में शुरू किया था देश का पहला शिशु मंदिर

  • 26 January,2019
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भारत रत्न नानाजी ने गोरखपुर में शुरू किया था देश का पहला शिशु मंदिर

नई दिल्ली: भारत रत्न नाना जी देशमुख का गोरखपुर से गहरा नाता है। देश का पहला सरस्वती शिशु मंदिर उन्होंने 1952 में यहीं पक्कीबाग में स्थापित किया था। आज देश भर में 28 हजार शिशु मंदिरों में 35 से 40 लाख विद्यार्थी, इंटरमीडिएट तक, भारतीयता से ओतप्रोत स्तरीय शिक्षा पा रहे हैं।

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के विद्या भारती द्वारा संचालित इन विद्यालयों के छात्र तकनीकी, चिकित्सा, प्रबंधन, प्रशासन सहित विभिन्न क्षेत्रों में अपने उल्लेखनीय प्रदर्शन के लिए जाने जाते हैं। सरस्वती शिशु मंदिर सुभाषनगर के प्रधानाचार्य रासबिहारी बताते हैं,‘उन दिनों नानाजी गोरखपुर में प्रचारक थे और भाऊराव देवरस प्रांत प्रचारक। एक अन्य प्रचारक थे श्रीकृष्ण चंद्र गांधी। सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना के पीछे प्रेरणा भाऊराव देवरस की थी तो उसे मूर्त रूप में साकार नानाजी देशमुख ने श्रीकृष्ण चंद्र गांधी को साथ लेकर बड़े परिश्रम से किया था।’

 

प्रचारक के रूप में काम करते हुए भारतीयता से ओतप्रोत शिक्षा व्यवस्था की डाली थी नींव

आज देश भर में संचालित होते हैं 28 हजार सरस्वती शिशु मंदिर

 

दीनदयाल उपाध्याय ने बनाया शिशु मंदिर संबिधान

वो देश की आजादी के तुरंत बाद का दौर था। अंग्रेज जा चुके थे लेकिन देश की नई पीढ़ी के पठन-पाठन के लिए मौजूद ज्यादातर विद्यालय लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति के तहत अंग्रेजी और पाश्चात्य प्रभाव में संचालित हो रहे थे। ऐसे में नई पीढ़ी को स्वतंत्र विचार और मातृभूमि के प्रति प्रेम पैदा करने वाली भारतीयता से ओतप्रोत शिक्षा पद्धति उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरस्वती शिशु मंदिर का विचार आया। बताते हैं कि नानाजी के आग्रह पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने सरस्वती शिशु मंदिर का संविधान तैयार किया।

 

 

 

पांच रुपए मासिक किराए के भवन में हुई थी शुरुआत
पहले विद्यालय की आधारशिला, पक्कीबाग में पांच रुपए मासिक किराए के भवन में रखी गई। यह नानाजी की मेहनत और लगन ही थी कि जल्द ही स्थान-स्थान पर सरस्वती शिशु मंदिर स्थापित होने लगे। इनकी संख्या तेजी से बढ़ने लगी। आरएसएस के प्रांत प्रचार प्रमुख उपेन्द्र द्विवेदी ने बताया कि 1958 में ‘शिशु शिक्षा प्रबंध समिति’ नाम से उत्तर प्रदेश समिति का गठन किया गया। विद्यालयों की संख्या अन्य प्रदेशों में भी बढ़ने लगी तो उन प्रदेशों में भी प्रदेश समितियों का गठन हुआ। पंजाब और चंडीगढ़ में सर्वहितकारी शिक्षा समिति, हरियाणा में हिन्दू शिक्षा समिति बनी। 1977 में इन समितियों का अखिल भारतीय स्वरूप सामने आया। विद्या भारतीय संस्था की स्थापना की गई। सभी प्रदेश समितियां विद्या भारती से सम्बद्ध हो गईं।

 

 

 

 

मुक्तिपथ की आधारशिला भी रखी थी नानाजी ने
मानव सेवा के प्रति पूरी तरह समर्पित नानाजी सामाजिक कार्यों में भागीदारी के लिए हमेशा तैयार रहते थे। यही वजह थी कि जब गोरखपुर के बड़हलगंज में सरयू नदी के किनारे श्मशान घाट को बुनियादी सुविधाओं से युक्त करके मुक्तिपथ धाम के रूप में बदलने का विचार उनके सामने रखा गया तो विपरीत परिस्थितियों में भी वह यहां आने को तैयार हो गए। मुक्तिपथ धाम के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पूर्व मंत्री राजेश त्रिपाठी बताते हैं,‘हम लोग उन्हें आमंत्रित करने चित्रकूट गए थे। पता चला कि संसद की सीढ़ियों से फिसल जाने के चलते उनके पैर में फैक्चर है। उनकी उम्र 86 वर्ष थी। शारीरिक रूप से वह आने की स्थिति में नहीं थे लेकिन मुक्तिपथ धाम के विचार से इतने प्रभावित हुए कि सहर्ष यहां आने को तैयार हो गए। तीन सितम्बर 2001 को शिलान्यास के दिन गोरखपुर में भारी बारिश हो रही थी। उसी बारिश में वह आए। यहां उनके सम्बोधन के दौरान आंधी आ गई लेकिन उस अफरातफरी में भी नानाजी बिल्कुल दृढ़ और अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित भाव से हमारा हौसला बढ़ाते रहे।’

 

 

Author : Ashok Chaudhary
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