भाग्य के भरोसे रहना एक भ्रम है, भाग्य के सहारे जीवन में सफलता नही मिलती है….

  • Line : kapil patel
  • 15 October,2018
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भाग्य के भरोसे रहना एक भ्रम है, भाग्य के सहारे जीवन में सफलता नही मिलती है….

New Delhi:  इंसानी दिमाग में सवाल घूमता रहता है कि जीवन में जो घटित होता है वह हमारे कर्मों का नतीजा है या फिर भाग्य की देन। सभी अपनी-अपनी समझ के अनुसार इसका उत्तर भी ढूंढते रहते हैं। कुछ मानते हैं कि जीवन में सब कुछ कर्म की बदौलत घटित होता है, उनकी सोच गीता के बहु-प्रचलित संदेश ‘जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान’ पर आधारित है। दूसरी ओर, भाग्यवादी लोगों की खेप कहती है कि ‘होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।’

 

 

 

इनका मानना है कि जीवन में सब कुछ पूर्वनिर्धारित है और इंसान के हाथ में वाकई कुछ नहीं है। ये कर्म करने की बजाय हाथ पर हाथ रखकर भाग्य के भरोसे जीने की बात ज्यादा करते हैं। तीसरी श्रेणी मध्यमार्गियों की है, जो कहते हैं कि जीवन में कर्म और भाग्य साथ-साथ चलते हैं और अकेले कर्म से भी काम नहीं चलता है और भाग्य भी अकेले कुछ नहीं कर सकता। बड़ी तादाद इसी मार्ग के पथिकों की है।सामान्यत: उम्र के शुरुआती दौर में लोग कर्म की प्रधानता को महत्व देते हैं और जैसे-जैसे उम्र ढलने लगती है भाग्य की शरण में जाने लगते हैं। यानी युवावस्था में कर्म, वृद्धावस्था में भाग्य या समस्या और इन दोनों अवस्थाओं के बीच के दौर में इंसान कभी कर्म तो कभी भाग्य की ओर पेंडुलम की तरह इधर-उधर होता रहता है। ये स्थितियां व्यावहारिकता के लिहाज से भी ठीक हैं।

 

 

युवावस्था में ध्यान होना ही कर्म की ओर चाहिए, जबकि वृद्धावस्था में अब तक जीवन में जो कुछ हो पाया, उसे तात्कालिक परिस्थितियों के हिसाब से उचित मानने से मनोबल भी ऊंचा रहता है और कोई गलतियां हुई हों तो उन्हें लेकर कोई ग्लानि भी नहीं होती। युवावस्था और वृद्धावस्था के बीच इंसान दोनों ओर देखता रहता है और समय, स्थान और परिस्थितियों के हिसाब से कभी कर्म को तो कभी भाग्य को तवज्जो देता रहता है। इंसान के भाग्य को जानने और बताने के लिए ज्योतिषियों, हस्तरेखा विशेषज्ञों, न्यूमरोलॉजिस्ट, टैरो कार्ड पढ़नेवालों की पूरी जमात है, लेकिन इस अकादमिक उपाय के अलावा भाग्य को जानने का एक और तरीका है जो व्यावहारिक भी है और आसान भी। इसे सुझाने वालों का तो यहां तक कहना है कि इंसान के भाग्य में लिखे को जानना केवल और केवल इंसान के हाथ में है और वह संभव है केवल और केवल कर्म करने से। इसके लिए ये गीता के कर्मयोग के सिद्धांत का भाग्य के सिद्धांत से समन्वय कराने की बात कहते हैं।

 

 

 

इनका कहना है कि इंसान को अपना भाग्य जानने के लिए इच्छित दिशा में पूरी ईमानदारी और परिश्रम से प्रयास करना चाहिए और यदि सफलता मिल जाती है तो समझ लेना चाहिए कि ऐसा उसके भाग्य में लिखा था जिसे उसने सच्ची श्रद्धा और मेहनत से जाना और पाया, न कि किसी भविष्यवेत्ता की सहायता से। अर्थात भाग्य में लिखे को जानने के लिए भी कर्म करना आवश्यक है। लेकिन फिर भी कुछ लोग हैं जो मानते हैं कि यदि भाग्य में लिखा होगा तो उसे देने के लिए कर्म भी ईश्वर ही करवा लेंगे। ऐसे महानुभाव खुद कोई जिम्मेदारी न लेकर सब कुछ ईश्वर पर छोड़े रखना चाहते हैं। जहां तक संभव हो इस रास्ते पर चलने से बचना चाहिए।

 

 

 

 

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