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राजभाषा हिन्दी के समक्ष चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ

  • 14 November,2018
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राजभाषा हिन्दी के समक्ष चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ

 

नई दिल्ली:  सात दशक पूर्व 14 सितम्बर, 1949 को हिन्दी को संविधान में अधिकारिक राजभाषा के रूप में स्वीकृत किया गया। हर वर्ष 14 सितम्बर को देश के लोगों को जागरूक करने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित किये जाते है। विशेषकर हिन्दी राज्यों में यह दिवस हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है, जिससे लोगों को, हिन्दी भाषा के बारे में, जानकारी के साथ-साथ भाषा के प्रति लगाव उत्पन्न हो और इसका प्रचार-प्रसार हो सके। इसे मूल रूप से पूरी दुनिया में हिन्दी भाषा की संस्कृति को बढ़ावा मिले और हिन्दी के विस्तार में सहायक हो। हिन्दी भाषा के साथ तो प्रारंभ से ही सौतेला व्यवहार किया जा रहा है, हिन्दी को राजभाषा घोषित करने से पहले ही, बहुत ही विरोध का सामना करना पड़ा। विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों ने हिन्दी भाषा का कड़ा विरोध किया, जो कि शिक्षा नीतियों में भी देखा जा सकता है। इसके अलावा हिन्दी के साथ अंग्रेजी भाषा को 15 साल के लिए राजभाषा के रूप में जगह दी गई|

 

 

जिसका परिणामस्वरूप यह हुआ कि कुछ राज्यों ने अंग्रेजी को ही, आज तक राजभाषा बनाये रखा है। इसके बावजूद भी आज हिन्दी, अंग्रेजी, चीनी, स्पेनिश, अरबी और फ्रेंच भाषाओं के साथ दुनिया में सबसे अधिक बोलचाल में लायी जाने वाली भाषा है। भारत में आज लगभग 650 से अधिक जीवित भाषाएं है परंतु भारत वर्ष में आज संपर्क की भाषा के रूप में हिन्दी, अंग्रेजी, और स्थानीय भाषाओं को ही प्रयोग में ही लाया जाता है। हिन्दी भाषा को भारत में तीन चौथाई लोग बोलते और समझते है। हिन्दी भारत के 12 राज्यों की प्रथम भाषा और 11 राज्यों में द्वितीय भाषा का दर्जा प्राप्त है। इतना सब होने के वावजूद भी, हिन्दी अब तक राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई है क्यो? हिन्दी भाषा की विशालता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि हिन्दी 18 बोलियों का एक समूह है। और इस विशाल समूह वाली भाषा का प्रतिनिधित्व हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री जी ने संयुक्तराष्ट्र संघ के संबोधन में किया। इससे पता चलता है कि हमारी हिन्दी भाषा स्थानीय स्तर से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय वैश्विक स्तर तक स्थान प्राप्त कर रही है।

 

 

 

इस हिन्दी भाषा की अस्मिता ने राष्ट्रीय एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। ये लोगों के कौशल, भाव और ज्ञान को प्रकट करने में बड़ी ही सहायक सिद्ध हुई है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दी ने अपना अमूल्य योगदान दिया है। हिन्दी ने आज़ादी की लड़ाई में, सभी देशवासियों को एकता के सूत्र में बांध के संजोये रखा और जन-जन के संघर्ष को आवाज़ दी। अधिकांश देश भक्ति के नारों का निर्माण हिन्दी भाषा में किया गया। हिन्दी के महत्व को रेखांकित करते हुए किसी ने सच ही कहा है कि-

 

 

 

‘‘राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है,
और हिन्दी ने हमें गुंगेपन से बचाया।‘‘

 

शिक्षाविद की भूमिका न केवल हिन्दी विभाग अपितु सभी संकायों के शिक्षाविद् की भूमिका के मूल्यांकन की जरूरत है। शिक्षाविद, संस्कृतनिष्ट हिन्दी भाषा का प्रयोग करते है; जैसे आम आदमी हिन्दी भाषा से अलग-थलग महसूस करता है। हिन्दी विभाग की भूमिका को अपनी भूमिका का निर्वहन करने की अत्यन्त जरूरत है।

 

 

 

भूमण्डलीकरण ने हिन्दी के बाज़ार को विकसित किया है। हिंग्लिश शब्द हिन्दी और इंग्लिश से उत्पन्न हुआ, जो कि भूमण्डलीकरण और बाज़ारवाद की देन है। आज हिन्दी बाज़ार एवं व्यापार की भाषा बन गयी है। हिन्दी की शक्ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हिन्दी भारतवर्ष में ही नहीं अपितु दुनिया की कई जगहों पर हिन्दी व्यापार की भाषा बन गयी है। हिन्दी की क्रय-विक्रय की शक्ति को अब बाहर के लोग भी, इस भूमण्डलीकरण के दौर में समझने लगे है। हिन्दी का बाज़ार लगभग 33 राष्ट्रों में फैला है। अंग्रेजी में यह ताकत अभी भी नहीं है। हिन्दी फिल्मों का बाज़ार अभी भी विदेशों में दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इससे करोड़ो रूपयों की आमदनी देश को हो रही है।

 

 

 

हिन्दी भाषा की चुनौतियाँ- हिन्दी भाषा को अन्य भाषाओं से चुनौतियाँ- प्रान्तीय अंग्रेजी और उर्दू भाषा से हिन्दी को कड़ी चुनौतियाँ मिल रही है। आज इन भाषाओं में प्रतिस्पर्धा का महौल है, जिसके कारण वे एक-दूसरे को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से नुकसान पहुँचा रही है। हिन्दी भाषा को दूसरी बड़ी चुनौती मीडिया से उत्पन्न-हिंग्लिश भाषा से मिल रही है। मीडिया आज अपने फायदे के लिए हिंग्लिश का प्रचार-प्रसार अधिक कर रहा है। हिंग्लिश ने हिन्दी के समक्ष अपनी शुद्धता को बनाये रखने की समस्या उत्पन्न कर दी है।

 

 

 

वैश्विकरण के दौर में अंग्रेजी भाषा को अधिक बल मिल रहा है। इसी के साथ ही सिनेमा ने हिन्दी के समक्ष समस्याएँ उत्पन्न की है। सिनेमा में हिन्दी के साथ अंग्रेजी का प्रयोग के कारण भाषा में अशुद्धता आयी। कुछ विषयों की पुस्तकों का हिन्दी में उपलब्ध न होना। मशीनी अनुवाद इतना पर्याप्त नहीं कि पाठकों की माँग को पूरा कर सके। एक महत्वपूर्ण समस्या यह भी है कि शोध और अनुसंधान के लिए हिन्दी में शोध अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं। जिसके कारण शोधार्थी अंग्रेजी में शोधकार्य करना पसंद करते है। विज्ञापन बाज़ार ने हिन्दी के लिए दिन-प्रतिदिन चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहा है। जिसके तहत् एक वर्ग विशेष को लुभाने के लिए अंग्रेजी में विज्ञापन, उत्पाद का नाम अंग्रेजी में प्रचारित किया जा रहा है।

 

 

 

आज इस हिन्दी दिवस/पखवाड़ा के अवसर पर हमें हिन्दी के सबल और कमजोर पक्षों की समीक्षा करना है और कैसे हम सब हिन्दी के विकास में अपना योगदान दे सकते हैं।

 

हिन्दी भाषा की चुनौतियों से निपटने का उपाय- इसे व्यवहार और बोलचाल की भाषा बनाया जाये, अभिव्यक्ति का माध्यम सुदृढ़ किया जाये। हिन्दी भाषा को रोजगार की भाषा बनाया जाये। हिन्दी के माध्यम से युवकों को कौशल प्रशिक्षण दिया जाये। इसे विज्ञान की भी भाषा बनाया जाये।

 

 

 

हिन्दी विश्वविद्यालयों की स्थापना- हिन्दी भाषा को बढ़ावा देने के लिए अटल विहारी बाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, भोपाल एवं अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा को स्थापित किया गया है। इस तरह के राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय सभी राज्यों में प्रारंभ किये जाये। इसके अलावा सरकार को विभिन्न राष्ट्रों के विश्वविद्यालय के साथ अनुबंध किया जाय, जिससे विदेशी विश्वविद्यालय/महाविद्यालय/विद्यालय में हिन्दी विभाग की स्थापना हो सके।

 

 

 

 

अंग्रेजी भाषा पर निर्भरता कम करके भी हिन्दी का विकास किया जा सकता है। आज जापान, चीन इत्यादि राष्ट्र अंग्रेजी ज्ञान के बिना आत्मनिर्भर बन गये। यद्यपि हिन्दी के प्रति लोगों के संकीर्ण और संकुचित नज़ारिये को बदलने की जरूरत है। हिन्दी का प्रचार-प्रसार प्रांतीय राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जैसे सोशल-मीडिया, प्रिंट-मीडिया, टी.वी.-सिनेमा, हिन्दी में शासकीय और गैर शासकीय कार्यों का संपादन का अनिवार्य रूप से किया जाये। हिन्दी भाषा को और अधिक समृद्ध बनाया जाये। अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण करके, हिन्दी में अनुवाद को बढ़ावा मिले, क्षेत्रीय भाषाओं की रचनाओं का हिन्दी में अनुवाद किया जाये, साथ ही विदेशी भाषाओं की रचनाओं का हिन्दी में अनुवाद को प्राथमिकता दी जाये।

 

 

 

हिन्दी को राजभाषा घोषित हुए 69 वर्ष हो गये, आज हिन्दी भाषा जनसंपर्क की भाषा बन चुकी है। परंतु रजनैतिक कारणों से आज भी हिन्दी भाषा राष्ट्र भाषा नहीं बन पायी है। यदि भारत वर्ष को एक विकसित अर्थव्यवस्था बनाना है तो, उसे हिन्दी को कार्य पद्धति, शिक्षा, ज्ञान, कौशल, व्यापार, मीडिया, बाज़ार की भाषा बनाना ही होगा। ऐसा किये बिना यह देश न तो संपन्न बन सकता है और न समता मूलक, न महाशक्ति और न ही विकसित अर्थव्यवस्था, हिन्दी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाने से पहले उसे जन भाषा बनाना होगा।

 

 

 

Author : Ashok Chaudhary
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