GSI द्वारा तैयार की जा रही है नई तकनीक पहले से जान सकेंगे भूसंखलन का ख़तरा

  • Line : Ankit Gupta
  • 19 November,2018
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GSI द्वारा तैयार की जा रही है नई तकनीक पहले से जान सकेंगे भूसंखलन का ख़तरा

लखनऊ: GSI की एक नई तकनीक के चलते अब पहले ही भूस्खलन के खतरे का अंदाजा लगाया जा सकेगा। दरअसल भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की ओर से डिफेंस टेरेंट लेबोरेट्री रिसर्च की मदद से एक तकनीक तैयार की जा रही है जिससे आने वाले भूस्खलन के खतरे का अंदाजा कुछ देर पहले ही लग जाएगा। हम आपको बता दे की उत्तराखंड में इसके पायलट प्रोेजेक्ट पर काम चल रहा है। इसकी जानकारी सोमवार यानी 19 नवंबर 2018 को जीएसआई के अपर महानिदेशक सोमनाथ चंदेल ने हमे दी। सोमनाथ चंदेल ने बताया कि जीएसआई भूकंप से जुडा पूर्वानुमान व आंकड़ों पर काम कर रहा है। उन्होंने जीएसआई से जुड़े तमाम प्रोजेक्ट्स के बारे में सोमवार को मीडिया को इसकी जानकारी दी| जीएसआई भूवैज्ञानिकों ने बताया कि खनिज के मामले मे यूपी दूसरे प्रदेशों के कम नहीं है।

 

 

 

 

उन्होने कहा कि सोनभद्र के आस-पास इसको लेकर काफी खोज चल रही है। बताया जा रहा है कि जीएसआई 20 मीटर नीचे तक ड्रिलिंग कर रहा है। यूपी ब्ल्कि नेपाल के आस-पास के क्षेत्रों से लेकर जम्मू-कश्मीर तक खोज करता है। पानी में फ्लोराइड व आर्सेनिक के तत्वों पर भी खोज चल रही है। महानिदेशक सोमनाथ चंदेल ने कहा कि जीएसआई की ओर से भूकम्पीय सर्वेक्षण शहरी आबादी के लिए योजना बनाने व जन-धन की रक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देंगे। जीएसआई ने दिल्ली, देहरादून, जम्मू, श्रीनगर, चंडीगढ़, पंचकूला, जालंधर, अमृतसर, मेरठ और गोरखपुर शहरों का भूकम्पीय माइक्रोजोनेशन अध्ययन पूरा कर लिया है। उन्होने कहा इससे संबंधित रिपोर्ट अधिकारियों को सौंप दी गई है। जीएसआई के अपर महानिदेशक व विभागाध्यक्ष सोमनाथ चांदेल ने बताया कि जीएसआई 167 वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित एक प्रतिष्ठित संस्थान है। प्राकृतिक संसाधनों की खोज में संस्थान के भूवैज्ञानिक जुटे हुए हैं, इसके अलावा जीएसआई दुर्लभ मृदा तत्व, प्लेटिनम समेत अन्य खनिजों की खोज के कार्यो मे लगा हुआ है। इन खोजों से भारत की सामरिक तैयारियों के विकास और आयात बिलों में कमी आएगी। भूजल में फ्लोराइड पाए जाने के भूगर्भीय कारणों की खोज के लिए सोनभद्र, कानपुर, उन्नाव, आगरा, मथुरा व प्रतापगढ़ आदि जिलों में विस्तृत शोध कार्य किया गया हैं|

 

 

 

 

सोमनाथ चांदेल ने बताया कि हरियाणा सरकार ने विलुप्त हो गई सरस्वती नदी के बहाव का पता लगाने का जिम्मा लखनऊ स्थित भारतीय भूवैज्ञान‍िक सर्वेक्षण को सौंपा है। जीएसआई के भूवैज्ञानिक उपग्रह चित्रों से नदियों की जलधाराओं के पुराने निशान खोजने का प्रयास करेंगे। सोमनाथ चांदेल ने कहा की नदी से गुजरने वाले रास्तों मे पड़ने वाले कुंओं तथा अन्य उपकरणों की मदद से नदी को खोजा जाएगा। पहले से नदी को खोजने के लिए गठित बद्री हेरिटेज बोर्ड की टीम भी इसमे उनकी मदद करेगी। गौरतलब है कि विलुप्त हुई सरस्वती नदी को जीवित करने के लिए हरियाणा और राजस्थान की सरकारें काफी समय से काम कर रही हैं, लेकिन कुछ कठिनाइयां आने के चलते भूवैज्ञानिकों की मदद ली जाएगी। संस्थान के वैज्ञानिक छह महीने के भीतर हरियाणा सरकार को अपनी कार्य की रिपोर्ट देंगे। इसके बाद ही सरस्वती नदी को दोबारा से अस्तिव में लाने के लिए काम शुरू किया जाएगा|

 

 

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