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यहां चिकन खिलाकर दूल्हा पसंद करती है लड़की... अगर ना है तो वसूलती है कीमत” — रिवाज़ या मिथक?

By tvlnews January 22, 2026
यहां चिकन खिलाकर दूल्हा पसंद करती है लड़की... अगर ना है तो वसूलती है कीमत” — रिवाज़ या मिथक?

शादी-संस्कारों में भोजन और पशु(जैसे चिकन) का प्रतीकात्मक या व्यवहारिक स्थान बहुत पुराना है — कुछ समुदायों में चिकन से जुड़ी रीत-रिवाज विवाह-परीक्षण, वर-मूल्य निर्धारण (bride-price) या शुभ-लक्ष्य के रूप में देखे जाते हैं। पर किसी भी खबर-झलक या वायरल वीडियो को देखकर सीधे “लड़की चिकन खिलाकर दूल्हा चुनती है और न देने पर रकम वसूलती है” कहना ठीक नहीं होगा। नीचे हमने उपलब्ध शोध-स्रोत, क्षेत्रीय रिपोर्टें और कानूनी/नैतिक व्याख्या के साथ इस विषय का विवेचन किया है।


“चिकन” — रिवाज़ों में क्यों आता है?

चिकन और अन्य घरेलू पशु कई समाजों में**

  • धार्मिक-उपचार/आशिर्वाद के प्रतीक होते हैं (कभी बलिदान, कभी समृद्धि का संकेत),

  • विवाहिक अनुष्ठानों में भाग होते हैं (खाना बाँटना, दायरे बनाना), और

  • लाभ/साक्ष्य-वस्तु के तौर पर वर/कुलदेवता की परीक्षा में आते हैं।

उदाहरण के तौर पर चीन के दक्षिण-पश्चिमी मियाओ समुदाय में चिकन-आधारित रीति-रिवाज विवाह से जुड़ी धार्मिक और वैवाहिक भविष्यसूचक प्रथाओं का उल्लेख मिलता है — जहाँ चिकन-कहानी, हड्डियों की परिकल्पना या भोजन देवताओं को समर्पित किया जाता है। इस तरह के रीति-रिवाज स्थानीय अर्थ-व्यवस्था, प्रतीकात्मकता और सामाजिक मान्यताओं से जुड़े होते हैं।


क्या “चिकन खिलाकर वर चुनना” एक स्थापित प्रथा है?

कई बार लोक-कथाएँ, क्षेत्रीय रीति-रिवाज या पर्यटन-सौंदर्यीकरण इस तरह की कहानियों को जन्म देते हैं — पर वैज्ञानिक/एथ्नोग्राफिक अध्ययन और ऐतिहासिक अभिलेखों में स्पष्ट-साफ़ उदाहरण ढूँढना ज़रूरी है। जहाँ-जहाँ “वर-मूल्य (bride-price)” या “देसी/स्थानीय प्रमाण” का चलन है, वहाँ अनाज, पशु या अन्य वस्तुओं का सापेक्ष महत्व होता है — पर यह सार्वभौमिक रूप से चिकन-खिला कर “वर का चयन” जैसा स्वरूप नहीं लेता। उदाहरण: कई आदिवासी/ग्रामीण समुदायों में दहेज/वर-मूल्य के तौर पर अन्न, कपड़ा, पशु आदि मांगे जाते हैं; इनका “परीक्षण” सामाजिक प्रतिष्ठा व आर्थिक स्थिति के आकलन के रूप में होता है।


वायरल कहानियाँ और वास्तविकता — सावधानी क्यों ज़रूरी है

सोशल-मीडिया पर कई वीडियो, क्लिप और स्थानीय समाचार चलते हैं जिनमें “किसी गाँव/कस्बे में लड़की ने चिकन खिलाकर दूल्हा चुना” जैसे दावे होते हैं। पर पत्रकारिता के मानकों के अनुसार:

  • स्थानीय संदर्भ की जाँच (कौन-सा समुदाय, क्या अनुष्ठान-वर्णन, कौन कर रहा है) अनिवार्य है;

  • श्रोताओं के अनुभव और ऐतिहासिक संदर्भ को अलग करना चाहिए; तथा

  • कानूनी और नैतिक आयाम (क्या यह व्यवस्था नाबालिगों/विवशता से जुड़ी है?) पर सवाल उठना चाहिए।

कई बार भोजन-लौह-विवाद (उदाहरण: शादी में चिकन पर झगड़ा) देशज स्थानीय विवादों के हल्के-फुल्के रूप से वायरल होते हैं—पर इसका अर्थ यह नहीं कि पूरे क्षेत्र में “चिकन-खिला कर वर-चयन” प्रथा चलती है। (वैयक्तिक-घटनाओं के वायरल होना और सांस्कृतिक-रूढ़ियों का होना अलग बातें हैं)।


सामाजिक और लैंगिक असर — जब “खरीदीबी की तरह” बात हो जाए

जब विवाह-सम्बन्धी प्रथाएँ आर्थिक लेन-देन या वस्तु-आधारित परीक्षण का रूप लेती हैं, तो इससे लैंगिक असमानता, महिलाओं की एजेंसी पर प्रश्न और सामाजिक दबाव उत्पन्न हो सकता है। विश्वबैंक व सामाजिक अध्ययन बताते हैं कि जहां धन-केंद्रित विवाह प्रथाएँ मजबूत हैं, वहां निर्णय-स्वतंत्रता कम, और आर्थिक दबाव अधिक दिखता है — परिणामस्वरूप किशोर-शादी, दहेजी दबाव, और घरेलू हिंसा जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ सकती हैं। इसलिए “जो कुछ रोचक-वायरल दिखता है” उसे सांस्कृतिक समझ के साथ परखना ज़रूरी है।


कानूनी परिप्रेक्ष्य — क्या ये प्रथाएँ वैध हैं?

भारत में बलपूर्वक विवाह, नाबालिग विवाह, मानहानि, दहेज-मांग/दहेज-दबाव जैसे मामलों पर सख्त कानून हैं। यदि किसी समुदाय की रस्म-रिवाज़ नाबालिगों/ज़बरदस्ती/विनिमय के आधार पर हैं तो वे कानूनी कार्रवाई के दायरे में आ सकती हैं। इसलिए पत्रकार और नागरिकों को चाहिए कि वे ऐसी खबरों में स्थानीय प्रशासन/पुलिस/महिला आयोग की आधिकारिक प्रतिक्रिया भी माँगें और प्रकाशन में शामिल करें।


  1. सांस्कृतिक विविधता के कारण भोजन-आधारित या पशु-आधारित अनुष्ठान कई समाजों में मौजूद हैं — इनमें चिकन-आधारित रीति-रिवाज भी मिल सकते हैं; पर उनका स्वरूप स्थानीय अर्थों से जुड़ा होता है, न कि सरल-सी ‘चिकन-खिला कर वर चुना’ वाली सार्वभौमिक कहानी।

  2. वायरल वीडियो/क्लिप के आधार पर जन-न्यायिक नतीजे पर पहुँचना जोखिमभरा है — स्रोत-सत्यापन, स्थानीय इंटरव्यू और ऐतिहासिक संदर्भ जरूरी हैं।

  3. यदि कोई रिवाज दहेज/ब्राइड-प्राइस या नाबालिगों-पर दबाव बनाता है, तो वह सामाजिक नुक़सान पहुंचा सकता है और कानूनी कार्रवाई के योग्य हो सकता है।

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