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अफीम की खेती कर रहा था बीजेपी नेता, पुलिस के साथ खेत में पहुंच गए पूर्व सीएम भूपेश बघेल

By tvlnews March 7, 2026
अफीम की खेती कर रहा था बीजेपी नेता,  पुलिस के साथ खेत में पहुंच गए पूर्व सीएम भूपेश बघेल

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के समोदा गांव में मक्का की फसल के बीच अवैध अफीम की खेती मिलने के बाद मामला कानून-व्यवस्था से निकलकर बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गया है। पुलिस और प्रशासन ने मौके पर कार्रवाई, NDPS के तहत मामला दर्ज करने और पूछताछ की पुष्टि की है; भाजपा ने विनायक ताम्रकार को निलंबित कर दिया है; जबकि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस मामले को सत्ता-संरक्षण, नशा नेटवर्क और जवाबदेही के सवाल से जोड़ा है. अभी तक सबसे अहम बात यह है कि खेत, रकबे, स्वामित्व, खेती प्रबंधन और राजनीतिक संरक्षण को लेकर कई दावे हैं, लेकिन अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी जांच के बाद ही तय होगी।

अफीम की खेती कर रहा था बीजेपी नेता? दुर्ग के समोदा कांड में पुलिस जांच, राजनीतिक आरोप और असली सवाल

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के समोदा गांव से सामने आया कथित अफीम खेती मामला एक साथ तीन स्तरों पर बड़ा हुआ है—कानूनी, प्रशासनिक और राजनीतिक। पुलिस और प्रशासन का कहना है कि मक्का की फसल के बीच अफीम की अवैध खेती के संकेत मिले, फोरेंसिक जांच कराई गई, NDPS कानून के तहत कार्रवाई शुरू हुई और कई लोगों से पूछताछ की जा रही है। दूसरी तरफ भाजपा ने नाम सामने आने के बाद अपने पदाधिकारी विनायक ताम्रकार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। तीसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल मौके पर पहुंचे और इस प्रकरण को केवल अवैध खेती नहीं, बल्कि कथित राजनीतिक संरक्षण और बड़े नशा नेटवर्क की दिशा में उठते सवालों से जोड़ दिया।

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण सत्यापित हिस्सा यही है कि समोदा क्षेत्र में खेत के भीतर उगाई गई फसल को लेकर पुलिस और प्रशासन ने औपचारिक जांच शुरू की है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, सूचना मिलने पर संयुक्त टीम मौके पर पहुंची। मौके का निरीक्षण, खेत को घेरे में लेना, फोरेंसिक टीम की मौजूदगी और NDPS प्रावधानों के तहत आगे की कानूनी कार्रवाई—ये सब अब सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं। प्रशासनिक अधिकारियों ने यह भी कहा कि प्रारंभिक जांच में खेत में अफीम की खेती किए जाने के संकेत मिले हैं और बारीकी से जांच की जाएगी।

लेकिन यह मामला जितनी तेजी से बढ़ा, उतनी ही तेजी से इसमें आंकड़ों और दावों का टकराव भी सामने आया। कुछ रिपोर्टों में अवैध खेती करीब 2 एकड़ बताई गई, कुछ में 4–5 एकड़, कुछ में 5–6 एकड़, जबकि एक एजेंसी-आधारित रिपोर्ट में कहा गया कि यह खेती सात एकड़ के मक्का खेत के बीच थी। भूपेश बघेल ने सार्वजनिक रूप से करीब 10 एकड़ का आरोप लगाया। यही इस केस का पहला बड़ा पत्रकारिता-संबंधी निष्कर्ष है: अभी रकबे पर एकरूपता नहीं है। इसलिए जिम्मेदार रिपोर्टिंग में “2 एकड़” या “10 एकड़” को अंतिम सच की तरह नहीं, बल्कि अलग-अलग दावों और प्रारंभिक आकलनों के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। उपलब्ध प्रशासनिक स्तर पर सबसे स्पष्ट ऑन-रिकॉर्ड अनुमान 5–6 एकड़ का दिखाई देता है, जबकि राजनीतिक आरोप इससे बड़े हैं।

जमीन के स्वामित्व और खेती संचालन को लेकर भी यही स्थिति है। एक रिपोर्ट में अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि जमीन मधुमति ताम्रकार और प्रीतिबाला ताम्रकार के नाम दर्ज है, जबकि कृषि-कार्य विनायक ताम्रकार संभाल रहे थे। दूसरी ओर, स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगा कि विनायक और बृजेश ताम्रकार इस खेती में शामिल हैं। विनायक ताम्रकार ने आरोपों से इनकार किया और कहा कि उन्हें राजनीतिक रंजिश में फंसाया जा रहा है। कुछ रिपोर्टों में उनके हवाले से यह भी कहा गया कि खेत उनका नहीं है या वहां खेती अन्य लोगों द्वारा की जा रही थी। यही वजह है कि इस मामले में “नाम सामने आना” और “कानूनी जिम्मेदारी तय होना” अभी दो अलग चरण हैं।

भाजपा की कार्रवाई ने इस मामले को और बड़ा बनाया। एजेंसी-आधारित और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, छत्तीसगढ़ भाजपा अध्यक्ष किरण सिंह देव ने कहा कि विनायक ताम्रकार का आचरण पार्टी की छवि धूमिल करने वाला और अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है, जिसके बाद उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। यह बिंदु राजनीतिक रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि निलंबन आम तौर पर तब किया जाता है जब संगठन मामले को केवल “विपक्ष का आरोप” मानकर छोड़ना नहीं चाहता। हालांकि निलंबन अपने आप में दोषसिद्धि नहीं है; यह संगठनात्मक कार्रवाई है, आपराधिक निष्कर्ष नहीं।

मामला यहीं नहीं रुका। भूपेश बघेल खेत तक पहुंचे, वहां की तस्वीरें और टिप्पणियां सार्वजनिक हुईं, और उन्होंने सरकार पर सीधा हमला बोला। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने कहा कि यदि सत्ता पक्ष से जुड़ा व्यक्ति इतनी बड़ी कथित अवैध खेती से जुड़ा पाया जा रहा है, तो यह जांच केवल खेत तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; यह भी देखा जाना चाहिए कि किस मंत्री, अधिकारी या नेटवर्क का संरक्षण था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी की पहुंच बड़े अधिकारियों और मंत्रियों तक थी। यह राजनीतिक हमला महज बयानबाजी नहीं था; इसने केस को “स्थानीय पुलिस कार्रवाई” से उठाकर “सरकार की जवाबदेही” वाले फ्रेम में ला खड़ा किया।

यूज़र द्वारा साझा किए गए भूपेश बघेल के पोस्ट में हमला और व्यापक है। उसमें उन्होंने सरकार से कई सवाल पूछे—क्या इस खेती में किसी मंत्री या अधिकारी की भूमिका थी, किस आधार पर कुछ कथित नाम सरकारी सूचियों से बाहर हुए, आरोपी की मुख्यमंत्री निवास तक पहुंच कब-कब रही, और उसके किन राजनीतिक तथा प्रशासनिक संपर्कों की जांच होनी चाहिए। इन सवालों का राजनीतिक असर इसलिए बड़ा है क्योंकि वे केवल “एक खेत” की बात नहीं करते, बल्कि कथित संस्थागत संरक्षण और नशे के व्यापक नेटवर्क की संभावना उठाते हैं। लेकिन यह उतना ही जरूरी है कि इन्हें अभी आरोप और राजनीतिक प्रश्नों के रूप में ही पढ़ा जाए; इनका स्वतंत्र और दस्तावेज़ी सत्यापन जांच एजेंसियों को करना होगा।

दुर्ग केस का कानूनी महत्व समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि भारत में अफीम पोस्ता की खेती पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन यह केवल सख्त सरकारी लाइसेंस व्यवस्था के तहत ही वैध है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, वैध अफीम पोस्ता खेती केवल मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के चयनित, अधिसूचित क्षेत्रों में की जाती है। लाइसेंस केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो जारी करता है, उत्पादन की निगरानी करता है और पूरी उपज सरकार को सौंपनी होती है। इस संरचना का सीधा अर्थ यह है कि छत्तीसगढ़ में समोदा जैसा कोई खेत, यदि बिना लाइसेंस और गैर-अधिसूचित क्षेत्र में अफीम पोस्ता उगाता पाया जाता है, तो वह शुरू से ही गैरकानूनी दायरे में आएगा।

कानून का अगला हिस्सा और भी स्पष्ट है। राजस्व विभाग की आधिकारिक दंड-सूची के अनुसार, बिना लाइसेंस अफीम, गांजा या कोका पौधों की खेती पर कठोर कारावास up to 10 years और जुर्माना up to Rs 1 lakh तक हो सकता है। यानी मामला केवल फसल नष्ट करने या पूछताछ तक सीमित नहीं है; यदि जांच में अवैध खेती सिद्ध होती है, तो आरोपियों के सामने गंभीर आपराधिक मुकदमा खड़ा हो सकता है। यही कारण है कि इस मामले की संवेदनशीलता किसी साधारण कृषि विवाद से कहीं अधिक है।

इस कांड का एक और महत्वपूर्ण पहलू “छिपाने की तकनीक” है। रिपोर्टों के अनुसार, फसल मक्का के बीच इस तरह लगाई गई थी कि बाहर से सामान्य खेत दिखाई दे। स्थानीय प्रशासन ने भी संकेत दिया कि अवैध पौधों को इस तरह मिलाकर उगाया गया था कि पहली नजर में संदेह न हो। यह पैटर्न देश के अन्य राज्यों में पकड़े गए कुछ अवैध पोस्ता मामलों से मेल खाता है, जहां मुख्य फसल की आड़ ली गई। इससे दो बातें निकलती हैं: पहली, यह मामला आकस्मिक प्रयोग जैसा नहीं दिखता; दूसरी, जांच एजेंसियों को यह देखना होगा कि क्या खेती करने वालों के पास पहले से तकनीकी जानकारी, बीज-स्रोत और विपणन-संपर्क मौजूद थे।

स्थानीय प्रशासनिक सूत्रों और रिपोर्टों में यह भी आया कि गांव के सरपंच तक को फोटो देखकर संदेह हुआ और उसी से सूचना आगे बढ़ी। यदि यह क्रम जांच में पुष्ट होता है, तो इससे एक गंभीर प्रशासनिक प्रश्न उठेगा: इतनी बड़ी कथित खेती पहले क्यों नहीं पकड़ी गई? खेत में कौन आता-जाता था? क्या राजस्व, पंचायत, स्थानीय पुलिस या किसी अन्य स्थानीय तंत्र को पहले कोई जानकारी थी? यह मामला राजनीतिक इसलिए भी बना, क्योंकि विपक्ष ठीक इसी बिंदु को पकड़कर कह रहा है कि अगर खेत, लोग और नेटवर्क स्थानीय स्तर पर परिचित थे, तो फिर कार्रवाई इतनी देर से क्यों हुई।

हालांकि अभी तक उपलब्ध आधिकारिक बयानों में सबसे सावधान भाषा यही रही है कि जांच जारी है, कई लोगों को पूछताछ के लिए रोका गया है, और अभी अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया। एक एजेंसी-आधारित रिपोर्ट में साफ कहा गया कि कई संदिग्धों, जिनमें विनायक ताम्रकार भी शामिल हैं, को पूछताछ के लिए रोका गया, लेकिन उस समय तक किसी गिरफ्तारी की औपचारिक पुष्टि नहीं हुई थी। यही बिंदु इस पूरे प्रकरण को समझने में केंद्रीय है: सार्वजनिक और राजनीतिक स्तर पर दोष तय कर दिया गया है, लेकिन कानूनी स्तर पर अभी जांच प्रारंभिक अवस्था में है।

इस कांड ने भाजपा और कांग्रेस, दोनों के लिए अलग-अलग तरह का दबाव बनाया है। भाजपा पर दबाव है कि वह यह साबित करे कि उसने नाम सामने आते ही कार्रवाई की, इसलिए वह संरक्षण नहीं दे रही। कांग्रेस पर दबाव है कि वह आरोपों को तथ्य और दस्तावेजों के साथ आगे बढ़ाए, नहीं तो मामला केवल राजनीतिक शोर बनकर रह जाएगा। लेकिन जनता की नजर से देखें तो मूल सवाल पार्टी-प्रतिस्पर्धा से बड़ा है: क्या छत्तीसगढ़ के भीतर नशीली फसल का कोई नया स्थानीय उत्पादन नेटवर्क उभर रहा है? अगर हां, तो क्या यह isolated case है या supply chain का हिस्सा? अभी किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी, पर यही जांच का असली केंद्र होना चाहिए।

यह भी ध्यान देने की बात है कि भारत में अफीम पोस्ता का वैध ढांचा बेहद कड़ा और दस्तावेज़-आधारित है। लाइसेंस, माप, उत्पादन, तौल, सरकारी खरीद और नियंत्रण—सब कुछ निर्धारित प्रक्रिया से चलता है। ऐसे में अगर समोदा में कथित तौर पर मक्का के बीच छिपाकर पौधे उगाए गए, तो यह सिर्फ अवैध खेती नहीं बल्कि नियामक ढांचे को चकमा देने की कोशिश भी मानी जाएगी। यही कारण है कि ऐसे मामलों में सिर्फ स्थानीय पुलिस नहीं, बल्कि व्यापक नारकोटिक्स और राजस्व जांच भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

दुर्ग केस को लेकर एक पत्रकारिता-सम्मत निष्कर्ष फिलहाल यही बनता है। पहला, समोदा में अवैध अफीम खेती के गंभीर संकेतों पर पुलिस-प्रशासन ने कार्रवाई की है। दूसरा, विनायक ताम्रकार का नाम सामने आने के बाद भाजपा ने उन्हें निलंबित किया है। तीसरा, भूपेश बघेल ने इसे सत्ता-संरक्षण और नशा-नेटवर्क के बड़े सवाल से जोड़ा है। चौथा, खेत के वास्तविक स्वामित्व, खेती संचालन, रकबे, नेटवर्क, बीज-स्रोत, संभावित खरीदार और राजनीतिक संरक्षण के दावे अभी जांच के विषय हैं। इसलिए अभी सबसे जिम्मेदार वाक्य यही है: मामला बेहद गंभीर है, लेकिन अंतिम सच्चाई अभी जांच फाइलों में बन रही है, टीवी हेडलाइन में नहीं।



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