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AI समिट विवाद: ‘पेड पोस्ट’ आरोपों से सियासी तूफान: कई इन्फ्लुएंसर्स ने वीडियो हटाए/अकाउंट बंद किए

By tvlnews February 28, 2026
AI समिट विवाद: ‘पेड पोस्ट’ आरोपों से सियासी तूफान: कई इन्फ्लुएंसर्स ने वीडियो हटाए/अकाउंट बंद किए

Content summary:

  • AI इम्पैक्ट समिट के बाद कई इंस्टाग्राम क्रिएटर्स ने दावा किया कि उन्हें समिट के खिलाफ स्क्रिप्टेड कंटेंट पोस्ट करने के लिए रकम ऑफर हुई; बाद में कई वीडियो हटे और कुछ अकाउंट निष्क्रिय हुए।

  • एक फैक्ट-चेक/इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट ने कहा कि जिन क्रिएटर्स ने आरोप लगाए, उनमें कई पहले से कांग्रेस-विरोधी/भाजपा-समर्थक कंटेंट डालते रहे; कुछ के आपसी नेटवर्क/बायो बदलाव भी दिखे।

  • रिपोर्ट में एक क्रिएटर के “पारिवारिक राजनीतिक कनेक्शन” और दो क्रिएटर्स के एक राजनीतिक कंसल्टेंसी-फर्म से जुड़े रोजगार-दावे का उल्लेख है; फर्म ने हिस्सेदारी से इनकार/स्पष्टीकरण दिया।

  • कांग्रेस ने आरोपों को “फर्जी नैरेटिव” बताते हुए खंडन किया और कहा कि कानूनी कार्रवाई की बात आते ही कई लोगों ने वीडियो डिलीट किए।

  • विज्ञापन/पेड-कंटेंट के लिए डिस्क्लोज़र नियम मौजूद हैं; विशेषज्ञों के मुताबिक राजनीतिक/इश्यू-आधारित पेड कंटेंट में पारदर्शिता की कमी भरोसा घटाती है।


AI समिट के बाद ‘पेड पोस्ट’ के आरोप, फिर वीडियो गायब: इन्फ्लुएंसर-इकोसिस्टम और राजनीति की नई लड़ाई

AI इम्पैक्ट समिट के खत्म होते ही सोशल मीडिया पर एक जैसा पैटर्न दिखा: कई इंस्टाग्राम क्रिएटर्स ने दावा किया कि उन्हें समिट के खिलाफ वीडियो बनाने के लिए पैसे ऑफर हुए। फिर, कुछ ही घंटों/दिनों में वही वीडियो हटने लगे—और कुछ अकाउंट तो निष्क्रिय भी हो गए।

मामला अब सिर्फ “किसने किसे पैसे दिए” तक सीमित नहीं है। एक तरफ सत्ता पक्ष इसे विपक्ष की “समन्वित साजिश” बता रहा है, दूसरी तरफ विपक्ष इसे “फर्जी कहानी” और “डिजिटल विच-हंट” कहकर खारिज कर रहा है। बीच में सवाल यह है कि—जो सबूत के तौर पर स्क्रीनशॉट दिखाए गए, उनमें नाम/पहचान क्यों नहीं थी? और वीडियो हटाने की होड़ क्यों मची?


क्या दावा किया गया—और फिर क्या हुआ?

समिट के तुरंत बाद कम से कम 15 क्रिएटर्स ने वीडियो/पोस्ट करके कहा कि उन्हें 10,000 से 40,000 रुपये (कहीं अधिक) तक का ऑफर मिला था ताकि वे “समिट बेकार है” जैसे नैरेटिव को बढ़ाएं। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने स्क्रीनशॉट भी लगाए, लेकिन उनमें कथित संपर्क करने वालों के नाम नहीं दिखे।

इसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदला:

  • कई क्रिएटर्स ने अपने वीडियो डिलीट कर दिए।

  • कुछ ने अकाउंट डिसेबल किए।

  • कुछ ने “और सबूत बताएंगे” जैसी बातें कर आगे की शर्तें रखीं।

यही “डिलीट-ट्रेंड” इस विवाद का सबसे बड़ा ईंधन बन गया—क्योंकि सार्वजनिक आरोप लगाने के बाद सामग्री हटना आम दर्शक के लिए भ्रम पैदा करता है: क्या डर था, क्या दबाव था, या क्या कहानी टिक नहीं रही थी?


जांच रिपोर्ट के तीन बड़े संकेत: नेटवर्क, प्रोफाइल और कनेक्शन

एक फैक्ट-चेक/इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट ने आठ इन्फ्लुएंसर्स से संपर्क करने की कोशिश की। रिपोर्ट के मुताबिक केवल एक ने जवाब दिया—लेकिन उसने भी “किसने संपर्क किया” यह बताने से इनकार कर दिया और बाद में वीडियो हटा दिया।

रिपोर्ट ने जिन संकेतों पर जोर दिया, वे तीन हैं:

1) “एक-जैसी दिशा” वाले क्रिएटर्स

रिपोर्ट के अनुसार, जिन क्रिएटर्स ने आरोप लगाए, उनके पुराने पोस्ट स्कैन करने पर कई की प्रोफाइल पहले से कांग्रेस-विरोधी और भाजपा-समर्थक दिखाई देती है। कुछ क्रिएटर्स ने खुद वीडियो में कहा कि उन्हें कांग्रेस कैसे अप्रोच कर सकती है, जबकि वे आमतौर पर भाजपा-समर्थक कंटेंट बनाते हैं।

2) आपसी नेटवर्किंग और बायो में बदलाव

रिपोर्ट में कहा गया कि कई क्रिएटर्स एक-दूसरे को फॉलो करते थे और कुछ के बायो में एक “टीम”/ग्रुप टैग जैसी चीज दिखी, जो बाद में हटाई गई। रिपोर्ट के मुताबिक यह बदलाव तब दिखा जब उनसे सवाल पूछे गए।

3) “फैमिली कनेक्शन” और “एजेंसी/कंसल्टेंसी” एंगल

रिपोर्ट में दावा है कि कम से कम एक क्रिएटर का स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व से पारिवारिक संबंध है (दार्जिलिंग क्षेत्र के एक स्थानीय भाजपा पदाधिकारी की बेटी होने का उल्लेख)।

इसी रिपोर्ट में दो क्रिएटर्स के बारे में कहा गया कि उनके लिंक्डइन प्रोफाइल पर एक राजनीतिक कंसल्टेंसी/डेटा-फर्म का नाम “एम्प्लॉयर” के रूप में दिखा, जिस पर पहले भी राजनीतिक अभियानों में भूमिका को लेकर आरोप/खबरें आ चुकी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक फर्म के एक अधिकारी ने प्रतिक्रिया में कहा कि एक व्यक्ति पहले काम करता था और छोड़ चुका है, जबकि दूसरे के बारे में कहा कि वह कर्मचारी नहीं रहा; फर्म ने विवाद से दूरी बनाई।

ये संकेत “निष्कर्ष” नहीं हैं, लेकिन यह दिखाते हैं कि कहानी केवल “कांग्रेस ने पैसे दिए” या “भाजपा ने प्लांट किया”—जैसी सरल रेखा में नहीं बैठती।


कांग्रेस का स्टैंड: “फर्जी नैरेटिव”, कानूनी कार्रवाई की बात आते ही वीडियो हटे

कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि यह “फर्जी कहानी” है और किसी को भुगतान नहीं किया गया। पार्टी के सोशल मीडिया विभाग की प्रमुख ने कहा कि जैसे ही कानूनी कार्रवाई की बात हुई, कई इन्फ्लुएंसर्स घबरा गए और वीडियो हटाने लगे—और यह भी कहा कि स्क्रीनशॉट में नाम/नंबर जैसी बेसिक जानकारी नहीं थी।

कुछ रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि कांग्रेस की ओर से कानूनी नोटिस/चेतावनी का जिक्र होने के बाद वीडियो टेक-डाउन तेज हुए, जबकि भाजपा अपने आरोपों पर कायम रही।


भाजपा का स्टैंड: “समन्वित अभियान” का आरोप

भाजपा नेताओं ने इसे विपक्ष की “साजिश” और देश की छवि खराब करने की कोशिश बताया। रिपोर्टों के मुताबिक पार्टी ने इसे प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठाया और आरोपों को विश्वसनीय बताया।


इस विवाद से बड़ा सवाल: पेड कंटेंट की पारदर्शिता कहाँ है?

भारत में डिजिटल/इन्फ्लुएंसर विज्ञापनों के लिए डिस्क्लोज़र नियम मौजूद हैं—जिनमें “Ad/Sponsored/Paid Partnership” जैसे लेबल को स्पष्ट और आसानी से दिखने योग्य तरीके से लगाने की बात कही गई है।

हालांकि यह विवाद “राजनीतिक/इश्यू-आधारित” कंटेंट से जुड़ा है, लेकिन मूल समस्या वही है: अगर कोई सामग्री पैसे/एजेंसी/पॉलिटिकल कंसल्टेंसी के जरिए प्रमोट हो रही है, तो दर्शक को कैसे पता चलेगा?

इसी संदर्भ में मीडिया-हैंडल्स पर पेड-कंटेंट को लेबल करने जैसे नियमों को लेकर भी हाल के वर्षों में सख्ती बढ़ने की रिपोर्टें आई हैं—क्योंकि बिना लेबल प्रमोशन अक्सर “समाचार” जैसा दिखने लगता है।


क्या “बड़ा खुलासा” वाला वायरल दावा पूरी तरह सही है?

सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट्स में इसे “कांग्रेस को बदनाम करने के लिए पैसे लेकर” जैसी भाषा में फ्रेम किया गया। लेकिन उपलब्ध रिपोर्टिंग के मुताबिक सार्वजनिक तौर पर सामने आया मूल घटनाक्रम उलटा है: कुछ इन्फ्लुएंसर्स ने दावा किया कि उन्हें समिट को बदनाम करने के लिए कांग्रेस/मध्यस्थों ने पैसे ऑफर किए, जबकि कांग्रेस ने इसे झूठा कहा और इसे भाजपा-समर्थक इकोसिस्टम का नैरेटिव बताया।

और अहम बात: रिपोर्ट में खुद कहा गया कि इन्फ्लुएंसर्स ने जिन लोगों के नाम बताए, वे स्पष्ट नहीं हुए—इसलिए “कौन पीछे था” पर निर्णायक निष्कर्ष निकालना कठिन है।


आगे क्या देखना चाहिए 

  1. कानूनी कार्रवाई/कोर्ट मूव: क्या नोटिस/मानहानि/आईटी एक्ट या अन्य प्रावधानों में औपचारिक केस बढ़ेगा?

  2. प्लैटफॉर्म-लेवल पारदर्शिता: क्या इंस्टाग्राम/मेटा ऐसे मामलों में “ऑर्गेनिक बनाम पेड” नैरेटिव को ट्रैक करने में मदद करेगा? (इस पर अभी सार्वजनिक विवरण सीमित हैं।)

  3. एजेंसी-इकोसिस्टम की भूमिका: राजनीतिक कंसल्टेंसी/PR एजेंसियों की भूमिका पर बहस तेज हो सकती है—खासकर जब प्रोफाइल/टैग/टीम-नेटवर्क जैसे संकेत सामने आए हों।

  4. डिस्क्लोज़र एन्फोर्समेंट: “स्पॉन्सर्ड/एड” लेबलिंग के नियम ब्रांड-कंटेंट में हैं; राजनीतिक/इश्यू-कंटेंट में पारदर्शिता कैसे तय होगी—यह नीति-बहस का अगला मोर्चा बन सकता है।




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