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25 अगस्त 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: हाईकोर्ट ने कहा, कानून-व्यवस्था नहीं संभलती तो अफसर पद छोड़ें

इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: संभल में नमाजियों की संख्या सीमित नहीं कर सकता प्रशासनसंभल की एक मस्जिद में रमजान के दौरान नमाज पढ़ने वालों की संख्या तय करने के प्रशासनिक फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्…

इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: हाईकोर्ट ने कहा, कानून-व्यवस्था नहीं संभलती तो अफसर पद छोड़ें
इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: हाईकोर्ट ने कहा, कानून-व्यवस्था नहीं संभलती तो अफसर पद छोड़ें | फ़ोटो: TVL News

इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: संभल में नमाजियों की संख्या सीमित नहीं कर सकता प्रशासन

संभल की एक मस्जिद में रमजान के दौरान नमाज पढ़ने वालों की संख्या तय करने के प्रशासनिक फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है। अदालत ने साफ कहा कि कानून-व्यवस्था की आशंका के नाम पर मस्जिद के भीतर नमाजियों की संख्या सीमित करना स्वीकार नहीं किया जा सकता। पीठ ने यह भी कहा कि अगर स्थानीय प्रशासन को लगता है कि वह ऐसी स्थिति में कानून लागू नहीं करा सकता, तो संबंधित अधिकारी इस्तीफा दें या तबादला ले लें।

यह मामला संभल के निवासी मुनाजिर खान की याचिका पर सुनवाई के दौरान उठा। याचिकाकर्ता का कहना था कि गाटा संख्या 291 स्थित परिसर, जहाँ उनके अनुसार मस्जिद है, वहाँ रमजान में नमाज पढ़ने से रोका जा रहा है। राज्य की ओर से अदालत को बताया गया कि संभावित law-and-order स्थिति को देखते हुए केवल 20 लोगों को नमाज की अनुमति दी गई थी। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है, धार्मिक अधिकारों पर प्रशासनिक सीमा लगाना उसका विकल्प नहीं हो सकता।

खंडपीठ में जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन शामिल थे। आदेश 27 फरवरी 2026 को पारित हुआ था और बाद में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हुआ। अदालत ने अपने आदेश में यह भी दोहराया कि निजी संपत्ति पर पूजा या प्रार्थना के लिए सामान्यतः राज्य से अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। अदालत के अनुसार, सरकारी अनुमति तभी प्रासंगिक होती है जब धार्मिक आयोजन सार्वजनिक भूमि पर हो या सार्वजनिक संपत्ति तक फैल जाए। यही बिंदु इस फैसले का कानूनी केंद्र है, क्योंकि अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक विवेक के बीच स्पष्ट सीमा रेखा खींची है।

अदालत की सबसे कठोर टिप्पणी स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर रही। पीठ ने कहा कि अगर एसपी और कलेक्टर को लगता है कि नमाजियों की संख्या बढ़ने से स्थिति बिगड़ सकती है और इसी वजह से वे संख्या सीमित करना चाहते हैं, तो यह उनकी प्रशासनिक अक्षमता का संकेत है। ऐसी स्थिति में उन्हें पद छोड़ देना चाहिए या जिला बदल लेने पर विचार करना चाहिए। यह टिप्पणी केवल फटकार नहीं, बल्कि उस संवैधानिक सिद्धांत की पुनर्पुष्टि है कि राज्य का काम अधिकार सीमित करना नहीं, बल्कि अधिकारों की रक्षा करते हुए शांति बनाए रखना है।

हालाँकि, अदालत ने याचिकाकर्ता के दावे को बिना परीक्षण के अंतिम रूप से स्वीकार भी नहीं किया। रिकॉर्ड के अनुसार, राज्य ने संबंधित जमीन के स्वामित्व पर विवाद उठाया और कहा कि राजस्व अभिलेखों में भूमि दूसरे नामों पर दर्ज है। अदालत ने नोट किया कि याचिकाकर्ता ने अभी तक मस्जिद या नमाज की जगह के फोटो रिकॉर्ड पर नहीं रखे हैं। इसलिए मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च के लिए तय की गई, ताकि अतिरिक्त दस्तावेज, तस्वीरें और राजस्व रिकॉर्ड सामने रखे जा सकें। इससे स्पष्ट है कि अदालत ने प्रशासनिक पाबंदी पर आपत्ति तो जताई, लेकिन संपत्ति और स्थल संबंधी विवाद को सुनवाई के लिए खुला रखा है।

इस आदेश का असर संभल से आगे भी जा सकता है। उत्तर प्रदेश में निजी परिसर, धार्मिक स्वतंत्रता, स्थानीय अनुमति और law-and-order के नाम पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों पर यह फैसला आगे की बहस को प्रभावित करेगा। फिलहाल अदालत का संदेश सीधा है: राज्य शांति बनाए, अधिकार न रोके; और यदि अधिकारी ऐसा नहीं कर सकते, तो संवैधानिक जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते।

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यह रिपोर्ट 14 मार्च 2026 को TVL News पर प्रकाशित हुई और 24 अगस्त 2026 को अपडेट की गई। नई जानकारी मिलने पर खबर को अपडेट किया जाता है।

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