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26 अगस्त 2026

जादूगोड़ा यूरेनियम खान: विकास की कीमत या मानव त्रासदी?

रेडियोएक्टिव कचरे की छाया में दम तोड़ती ज़िंदगियाँजादूगोड़ा (पूर्वी सिंहभूम), झारखंड। झारखंड के जादूगोड़ा क्षेत्र में स्थित भारत की सबसे पुरानी यूरेनियम खदान के आसपास बसे गांवों की ज़िंदगी एक अदृश्य…

जादूगोड़ा यूरेनियम खान: विकास की कीमत या मानव त्रासदी?
जादूगोड़ा यूरेनियम खान: विकास की कीमत या मानव त्रासदी? | फ़ोटो: TVL News

रेडियोएक्टिव कचरे की छाया में दम तोड़ती ज़िंदगियाँ

जादूगोड़ा (पूर्वी सिंहभूम), झारखंड।
 झारखंड के जादूगोड़ा क्षेत्र में स्थित भारत की सबसे पुरानी यूरेनियम खदान के आसपास बसे गांवों की ज़िंदगी एक अदृश्य ज़हर से जूझ रही है। यहां रहने वाले सैकड़ों परिवार गंभीर बीमारियों, विकलांगता और सामाजिक-आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यूरेनियम खनन से निकलने वाले रेडियोएक्टिव कचरे ने उनकी ज़मीन, पानी और शरीर—तीनों को प्रभावित किया है।

डूंगरीडीह गांव की 16 वर्षीय अनामिका ओराम का सपना भी बाकी बच्चों की तरह पढ़-लिखकर आगे बढ़ने का है, लेकिन चेहरे पर मौजूद ट्यूमर और लगातार होने वाला तेज़ सिरदर्द उसकी राह में सबसे बड़ी बाधा है। अनामिका का घर नरवापहाड़ यूरेनियम खान से महज़ एक किलोमीटर की दूरी पर है। उसकी मां नागी ओराम भी गंभीर बीमारियों से जूझ रही हैं।

“यह रेडियोएक्टिव कचरा हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी बन चुका है”

डूंगरीडीह गांव की रहने वाली नमिता सोरेन कहती हैं,
 “यहां बच्चे विकलांग पैदा हो रहे हैं, लोग कैंसर जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं। मेरा खुद का तीन बार गर्भपात हुआ और जो बच्चा हुआ, वह भी विकलांग है।”

अंधविश्वास से हकीकत तक

झारखंडी ऑर्गेनाइज़ेशन अगेंस्ट रेडिएशन (JOAR) के सह-संस्थापक घनश्याम बिरुली बताते हैं कि पहले लोग मानते थे कि कुछ जंगलों और पहाड़ियों पर बुरी आत्माओं का साया है। बाद में समझ आया कि ये वही इलाके हैं, जहां यूरेनियम खदानों के टेलिंग पॉण्ड (रेडियोएक्टिव कचरे के तालाब) बनाए गए हैं।

“समय के साथ लोगों को एहसास हुआ कि उनकी पीड़ा किसी आत्मा की नहीं, बल्कि यूरेनियम खनन की देन है,” बिरुली कहते हैं।

अध्ययन भी करते हैं भयावह खुलासे

टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस द्वारा 2003 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार,

  • 1998 से 2003 के बीच लगभग 18% महिलाओं को गर्भपात या मृत शिशु का सामना करना पड़ा

  • करीब 30% महिलाओं ने गर्भधारण में कठिनाइयों की बात कही

  • अधिकांश महिलाएं लगातार थकान और कमजोरी से पीड़ित पाई गईं

यूरेनियम खनन और सरकारी रुख

भारत में यूरेनियम खनन की ज़िम्मेदारी Uranium Corporation of India Limited (UCIL) के पास है। जादूगोड़ा में खनन की शुरुआत 1967 में हुई थी। कंपनी का दावा है कि खनन से आसपास के गांवों में होने वाली बीमारियों का रेडिएशन से कोई संबंध नहीं है और इसकी मुख्य वजह कुपोषण, मलेरिया और गंदगी है।

हालांकि, स्थानीय लोग और सामाजिक कार्यकर्ता इस दावे को सिरे से खारिज करते हैं।

संसद में उठा मुद्दा, लेकिन समाधान नहीं

मार्च 2020 में भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी ने लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल पूछा था कि क्या रेडियोएक्टिव स्लरी के खुले भंडारण से लोगों के स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है।

इस पर केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि व्यवस्था पूरी तरह सुरक्षित है और परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड नियमित निरीक्षण करता है।

टेलिंग पॉण्ड: सबसे बड़ा खतरा

यूरेनियम खनन के दौरान 1 किलोग्राम यूरेनियम निकालने पर लगभग 1750 किलोग्राम रेडियोएक्टिव कचरा निकलता है। यह कचरा टेलिंग पॉण्ड में जमा किया जाता है। जादूगोड़ा और तुरामडीह में ऐसे कई तालाब हैं, जिनसे महज़ 100–200 मीटर की दूरी पर लोग रहते हैं।

चाटीकोच्चा टोले के रत्न मांझी बताते हैं कि बरसात में टेलिंग पॉण्ड का पानी उनके घरों में घुस जाता है और खेती पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है।

विकास बनाम जीवन

भारत 2030 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को 40,000 मेगावाट तक बढ़ाना चाहता है। हाल ही में जादूगोड़ा के उत्तर-पश्चिम बंगलासाई-मेचुआ क्षेत्र में 15,598 टन नए यूरेनियम भंडार मिलने की पुष्टि भी हुई है। लेकिन स्थानीय लोगों का सवाल है—क्या यह विकास उनकी ज़िंदगी की कीमत पर होगा?



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यह रिपोर्ट 19 जनवरी 2026 को TVL News पर प्रकाशित हुई और 22 अगस्त 2026 को अपडेट की गई। नई जानकारी मिलने पर खबर को अपडेट किया जाता है।

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