केजरीवाल की नई एफिडेविट से बढ़ा जस्टिस शर्मा विवाद
केजरीवाल की नई एफिडेविट से बढ़ा जस्टिस शर्मा विवाद
दिल्ली हाईकोर्ट में अरविंद केजरीवाल की recusal याचिका अब नए मोड़ पर है। अतिरिक्त हलफनामे और सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर उन्होंने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के बच्चों की केंद्रीय सरकारी पैनल नियुक्तियों, केस आवंटन प्रणाली और सुनवाई की निष्पक्षता को लेकर नए सवाल उठाए हैं, जबकि सीबीआई ने इस पूरी याचिका को निराधार बताया है।
दिल्ली हाईकोर्ट में अरविंद केजरीवाल की recusal याचिका अब केवल अदालत की कार्यवाही तक सीमित कानूनी विवाद नहीं रह गई है, बल्कि न्यायिक निष्पक्षता की “धारणा” बनाम “वास्तविक पक्षपात” की बड़ी बहस में बदलती दिख रही है। केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के समक्ष लंबित अपनी recusal अर्जी में एक अतिरिक्त हलफनामा दायर किया है। यह हलफनामा उस समय आया, जब 13 अप्रैल को अदालत ने recusal आवेदनों पर आदेश सुरक्षित रख लिया था। इस नए हलफनामे में उन्होंने कहा है कि कुछ “बाद में सामने आए” आधिकारिक रिकॉर्ड उनकी आशंका को और गंभीर बनाते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि दिल्ली आबकारी नीति प्रकरण से जुड़ी है, जिसमें निचली अदालत ने 27 फरवरी को केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपियों को डिस्चार्ज किया था। इसके खिलाफ सीबीआई ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। 13 अप्रैल की सुनवाई में केजरीवाल खुद अदालत में पेश हुए और recusal के समर्थन में दस आधार रखे। उन्होंने पहले भी आरोप लगाया था कि कार्यवाही की गति, कुछ अंतरिम टिप्पणियां, पूर्व आदेशों की भाषा और वैचारिक निकटता जैसी परिस्थितियों ने उनके मन में निष्पक्ष सुनवाई को लेकर “grave and reasonable apprehension” पैदा की। अतिरिक्त हलफनामे में उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें rejoinder रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला और सुनवाई सामान्य अदालत समय से आगे बढ़ी।
सबसे अहम नया पहलू जज के परिवार से जुड़े आधिकारिक रिकॉर्ड हैं। विधि कार्य विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध रिकॉर्ड में ईशान शर्मा को सुप्रीम कोर्ट के लिए Group ‘A’ Panel Counsel के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, जिनकी अवधि 1 फरवरी 2027 तक दिखती है। उसी सरकारी रिकॉर्ड और दिल्ली हाईकोर्ट की nominated counsel सूची में शांभवी शर्मा का नाम सुप्रीम कोर्ट के लिए Group ‘C’ Panel Counsel तथा “Government Pleader” श्रेणी में दर्ज दिखता है। केजरीवाल के अतिरिक्त हलफनामे में भी यही कहा गया है कि ये दोनों नियुक्तियां केंद्र सरकार के विधिक ढांचे से जुड़ी सक्रिय पेशेवर संलग्नताएं हैं, कोई मानद या औपचारिक पद नहीं।
यहीं से कथित conflict-of-interest का तर्क उभरता है। 13 सितंबर 2022 के आधिकारिक कार्यालय ज्ञापन और विधि कार्य विभाग की FAQ में दर्ज है कि सुप्रीम कोर्ट में Attorney General अपने मामलों का चयन करते हैं, जबकि बाकी मामलों को Solicitor General, Additional Solicitors General और panel counsel को मार्क करते हैं। केजरीवाल का कहना है कि मौजूदा मामले में वही Solicitor General सीबीआई की ओर से अदालत में उपस्थित हैं और उनकी recusal अर्जी का विरोध कर रहे हैं। इसलिए, उनके मुताबिक, अभियोजन पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाली वही संस्थागत व्यवस्था जज के परिवार के सदस्यों को सरकारी काम आवंटित करने वाली व्यवस्था का भी हिस्सा है।
अतिरिक्त हलफनामे में आरटीआई सामग्री का भी हवाला दिया गया है। उसमें दावा किया गया है कि ईशान शर्मा को 2023 में 2,487, 2024 में 1,784 और 2025 में 1,633 मामले मार्क किए गए। केजरीवाल ने इन आंकड़ों को यह दिखाने के लिए इस्तेमाल किया है कि यह रिश्ता “live, continuing and substantial” है, न कि दूरस्थ या आकस्मिक। हालांकि इन संख्याओं को अदालत ने अभी सत्यापित निष्कर्ष के रूप में स्वीकार नहीं किया है; फिलहाल ये दावे हलफनामे का हिस्सा हैं और न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं।
दूसरी ओर, सीबीआई ने इस recusal याचिका को “frivolous, vexatious and baseless” बताया है। एजेंसी का कहना है कि अंतरिम आदेशों या टिप्पणियों से असहमति recusal का आधार नहीं हो सकती, वरना यह “bench hunting” को बढ़ावा देगा और न्यायिक स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाएगा। यही इस विवाद का केंद्रीय बिंदु भी है: क्या एक पक्षकार की निष्पक्षता को लेकर उचित आशंका पर्याप्त है, या फिर यह तर्क अदालत की संस्थागत स्थिरता के खिलाफ जाता है।
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