राहुल के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने की तैयारी में सरकार: जानें कारण, नियम
नई दिल्ली, 11 फरवरी 2026 — लोकसभा में बजट सत्र के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के भाषण को लेकर सरकार ने उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन (Privilege) नोटिस/प्रस्ताव लाने की तैयारी जताई है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू के मुताबिक, राहुल गांधी ने सदन को “गुमराह” करने वाले और “बेबुनियाद” आरोप लगाए तथा एक कैबिनेट मंत्री पर बिना पूर्व सूचना गंभीर आरोप लगाए। इसी के आधार पर स्पीकर को सूचना देकर विशेषाधिकार की कार्यवाही शुरू करने की बात कही गई। रिपोर्ट के अनुसार राहुल गांधी को इस संबंध में शाम 5 बजे तक जवाब देने को कहा गया है।
मुख्य बातें
सरकार का आरोप: बिना नोटिस गंभीर आरोप, इसलिए विशेषाधिकार हनन।
विवाद की पृष्ठभूमि: राहुल गांधी ने भाषण में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते, डेटा/रणनीतिक हित, अडानी और “एप्स्टीन फाइल्स” का संदर्भ उठाया।
केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी मुलाकातें पेशेवर संदर्भ में थीं।
नियम क्या कहते हैं: लोकसभा में विशेषाधिकार प्रश्न उठाने के लिए स्पीकर की सहमति और लिखित नोटिस जैसी शर्तें हैं।
आगे की राह: मामला स्वीकार हुआ तो विशेषाधिकार समिति जांच कर सकती है और रिपोर्ट/सिफारिशें दे सकती है।
विवाद कैसे शुरू हुआ: भाषण, संदर्भ और आपत्तियाँ
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक राहुल गांधी ने बजट चर्चा के दौरान सरकार पर तीखे राजनीतिक आरोप लगाए। उन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार बातचीत/समझौते के संदर्भ में सरकार पर राष्ट्रीय हितों से समझौता करने का दावा किया और डेटा व रणनीतिक संसाधनों को लेकर भी टिप्पणी की।
इसी भाषण के दौरान उन्होंने “एप्स्टीन फाइल्स” का संदर्भ भी उठाया और अडानी समूह से जुड़ी अमेरिकी कार्रवाइयों/जांच का उल्लेख किया। रिपोर्ट में बताया गया है कि कार्यवाही के दौरान पीठासीन सदस्य ने कुछ संदर्भों पर आपत्ति जताई, जिसके बाद राहुल गांधी ने कहा कि वे “एप्स्टीन का नाम” नहीं लेंगे।
सरकार की आपत्ति का एक प्रमुख बिंदु यह भी रहा कि राहुल गांधी ने केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी को लेकर गंभीर आरोप लगाए, जबकि सरकार का दावा है कि ऐसे आरोप सदन में रखने से पहले नोटिस देना और आधार/प्रमाण प्रस्तुत करना संसदीय परंपरा व नियमों के मुताबिक अपेक्षित है।
हरदीप सिंह पुरी का जवाब: “मुलाकात पेशेवर संदर्भ में थी”
केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने राहुल गांधी की टिप्पणियों को “बेबुनियाद” बताते हुए कहा कि जेफ्री एप्स्टीन से उनकी मुलाकातें इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट (IPI) से जुड़े पेशेवर काम के दौरान, एक डेलिगेशन/मीटिंग के संदर्भ में हुई थीं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके खिलाफ अमेरिकी प्राधिकरणों की ओर से किसी आपराधिक संलिप्तता का आरोप नहीं है, और जिन ईमेल/दस्तावेज़ों का हवाला दिया जा रहा है, वे उनके मुताबिक पेशेवर संवाद तक सीमित थे।
“विशेषाधिकार हनन” क्या होता है?
भारत के संविधान में संसद को कुछ विशेषाधिकार (Privileges) दिए गए हैं ताकि वह बिना बाधा अपने कार्य कर सके। अनुच्छेद 105 संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सदन/समिति में कही बातों पर अदालत में कार्यवाही से संरक्षण जैसी व्यवस्थाएँ बताता है।
लेकिन विशेषाधिकार का मतलब यह नहीं कि सदन के भीतर कही गई हर बात पर कोई जवाबदेही नहीं होगी। संसद अपने अधिकार और गरिमा की रक्षा के लिए विशेषाधिकार हनन या सदन की अवमानना (Contempt) की कार्यवाही कर सकती है—खासकर तब, जब किसी कथन/कृत्य से सदन के कामकाज में बाधा, सदन/सदस्यों की प्रतिष्ठा पर आक्षेप, या नियमों की अवहेलना का प्रश्न उठे। राज्यसभा सचिवालय की पुस्तिका में भी अवमानना को ऐसे कार्य/चूक के रूप में समझाया गया है जो सदन के कार्य में बाधा डाले या उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाए।
PRS (PRS Legislative Research) के अनुसार, विशेषाधिकार हनन में सांसदों/सदन के विशेषाधिकारों का उल्लंघन या सांसदों/सदन पर “आक्षेप” (casting reflections) जैसी बातें भी शामिल हो सकती हैं; साथ ही अलग-अलग मामलों में सदन चेतावनी से लेकर कठोर कदम तक उठा सकता है।
लोकसभा में विशेषाधिकार प्रश्न उठाने की प्रक्रिया (नियमों के अनुसार)
लोकसभा के नियम (Rules of Procedure and Conduct of Business) इस प्रक्रिया के चरण स्पष्ट करते हैं:
स्पीकर की सहमति जरूरी — कोई सदस्य स्पीकर की सहमति से विशेषाधिकार का प्रश्न उठा सकता है।
लिखित नोटिस — सदस्य को सचिव-जनरल को लिखित नोटिस देना होता है (नियमों में समय-सीमा का भी उल्लेख है)।
स्वीकार्यता की शर्तें — आम तौर पर विषय “हाल का”, “विशिष्ट” और ऐसा होना चाहिए जिसमें सदन का हस्तक्षेप जरूरी हो।
सदन की अनुमति (Leave) — यदि आपत्ति हो, तो कम-से-कम 25 सदस्यों के खड़े होने पर leave मिल सकती है।
सदन निर्णय या समिति को संदर्भ — leave मिलने के बाद सदन स्वयं निर्णय ले सकता है या मामले को विशेषाधिकार समिति को भेज सकता है।
स्पीकर का विशेष अधिकार — स्पीकर किसी भी विशेषाधिकार प्रश्न को समिति को जांच/रिपोर्ट के लिए संदर्भित कर सकते हैं।
विशेषाधिकार समिति क्या करती है?
लोकसभा की Committee of Privileges (विशेषाधिकार समिति) के बारे में लोकसभा दस्तावेज़ बताता है कि यह समिति 15 सदस्यों की होती है, जिन्हें स्पीकर नामित करते हैं। इसका काम यह देखना है कि तथ्य/परिस्थितियों के आधार पर विशेषाधिकार हनन बनता है या नहीं, और फिर उपयुक्त सिफारिशें देना है। रिपोर्ट सदन में रखी जा सकती है या स्पीकर को दी जा सकती है (मामले के संदर्भ पर निर्भर)।
राहुल गांधी के लिए “कितनी बड़ी मुश्किल” — क्या-क्या संभव है?
यह समझना जरूरी है कि विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही मूलतः संसदीय प्रक्रिया है। इसका नतीजा हर मामले में अलग हो सकता है—कभी टिप्पणी रिकॉर्ड से हटाई जा सकती है, कभी सदस्य से स्पष्टीकरण/माफ़ी मांगी जा सकती है, या फिर समिति जांच के बाद सदन को कदम सुझा सकती है। PRS के मुताबिक, सदन के पास चेतावनी से लेकर कठोर कदम तक विकल्प हो सकते हैं (मामले की प्रकृति पर निर्भर)।
इस मामले में सरकार का जोर इस बिंदु पर दिख रहा है कि आरोप बिना नोटिस/आधार लगाए गए और इसलिए उन्हें नियमों के दायरे में लाया जाना चाहिए।
वहीं, मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने आरोपों को सार्वजनिक रूप से खारिज किया है।
आगे क्या देखना चाहिए
क्या लोकसभा अध्यक्ष/स्पीकर नोटिस को स्वीकार करते हैं या प्रथम दृष्टया खारिज?
क्या मामला विशेषाधिकार समिति को जाता है?
राहुल गांधी अपने बयान के समर्थन में क्या स्पष्टीकरण/दस्तावेज़ी आधार रखते हैं? (सरकार यही मांग कर रही है)।
सदन की कार्यवाही में क्या विवादित हिस्से रिकॉर्ड से हटाए जाते हैं या नहीं? (यह स्पीकर/पीठ का अधिकार क्षेत्र होता है)।
लोकसभा में राहुल गांधी के बजट भाषण के बाद सरकार ने उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन नोटिस/प्रस्ताव लाने की तैयारी जताई है और 5 बजे तक जवाब मांगा गया है। विवाद का केंद्र सरकार के अनुसार बिना नोटिस गंभीर आरोप हैं, जिनमें मंत्री हरदीप सिंह पुरी को लेकर टिप्पणियाँ भी शामिल बताई गईं। पुरी ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि एप्स्टीन से मुलाकातें पेशेवर संदर्भ में थीं। नियमों के मुताबिक विशेषाधिकार प्रश्न उठाने के लिए स्पीकर की सहमति, लिखित नोटिस और सदन/समिति की प्रक्रिया तय है; स्पीकर चाहें तो मामला विशेषाधिकार समिति को जांच के लिए भेज सकते हैं।
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