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अविमुक्तेश्वरानंद विवाद के बीच 19 साल बाद एक मंच पर आएंगे चारों शंकराचार्य? दिल्ली में होगा बड़ा आंदोलन

By tvlnews January 22, 2026
अविमुक्तेश्वरानंद विवाद के बीच 19 साल बाद एक मंच पर आएंगे चारों शंकराचार्य? दिल्ली में होगा बड़ा आंदोलन

हिंदू धार्मिक परंपरा और सामाजिक गतिशीलता के महत्वपूर्ण मोड़ पर 2026 के वसंत में एक ऐसा आयोजन तैयार हो रहा है जो पिछले करीब दो दशकों में धार्मिक नेतृत्व के सबसे बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रमों में से एक माना जा रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती विवाद के बीच 10 मार्च 2026 को दिल्ली में ‘गो रक्षा’ आंदोलन में चारों पीठों के शंकराचार्य एक मंच पर आ सकते हैं। यह घटना उस धार्मिक और सामाजिक तनाव के बीच संभावित ऐतिहासिक क्षण के रूप में उभर रही है जो वर्तमान समय में सनातन परंपरा, प्रशासन एवं समुदाय के बीच चल रहा है।


अविमुक्तेश्वरानंद विवाद: वर्तमान परिदृश्य

प्रयागराज माघ मेला 2026 के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद तथा प्रशासन के बीच विवाद तब गरमा गया जब उन्हें मौनी अमावस्या के स्नान के अवसर पर पुलिस ने उनके स्वामी-पालकी जुलूस के साथ गीतांजलि संगम के पास आगे जाने से रोका। विरोध के बाद उन्होंने अपने शिविर के बाहर धरना और अनशन शुरू कर दिया, यह कहते हुए कि उन्हें धार्मिक मर्यादा का अपमान किया गया है और अधिकारों का हनन हुआ है।

इसके बाद मेला प्रशासन ने उन्हें ‘शंकराचार्य’ की उपाधि का उपयोग करने के लिए नोटिस जारी किया, यह तर्क देते हुए कि सर्वोच्च न्यायालय में लंबित अपील के कारण अभी तक ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य का अधिकारिक रूप से निर्णय नहीं हुआ है। इस कदम से विवाद और अधिक उभर गया है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन की इस कार्रवाई को चुनौती दी है और कहा कि किसी प्रशासनिक निकाय के पास यह अधिकार नहीं है कि वे यह तय करें कि कौन शंकराचार्य है — यह निर्णय स्वयं धर्म, पीठों और परंपरा के भीतर ही होना चाहिए।


चारों शंकराचार्य कौन हैं?

परंपरा अनुसार भारत में चार प्रमुख शंकराचार्य पीठ हैं जो 8वीं शताब्दी के महान गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित किए गए थे। ये चार पीठ हैं:

  1. ज्योतिर्मठ (उत्तराखंड)

  2. शारदा पीठ (द्वारका, गुजरात)

  3. गोवर्धन पीठ (पुरी, ओडिशा)

  4. श्रृंगेरी पीठ (कर्नाटक)

इन चारों पीठों के शंकराचार्य हिन्दू धर्म के सबसे प्रतिष्ठित आध्यात्मिक नेतृत्व में गिने जाते हैं। इतिहास में इन सभी के एक ही मंच पर आना अपेक्षाकृत दुर्लभ घटनाक्रम रहा है — यह तीसरी बार हो सकता है जब वे सभी मिलकर किसी बड़े सामाजिक-धार्मिक मुद्दे पर एक साथ दिखाई दें।


गो रक्षा आंदोलन: ऐतिहासिक संदर्भ और 10 मार्च की तैयारी

दिल्ली में 10 मार्च 2026 को आयोजित ‘गो रक्षा’ कार्यक्रम में चारों शंकराचार्यों के एक मंच पर आने का मुख्य उद्घोष ‘गो माता, राष्ट्र माता’ अभियान है। यह आयोजन धार्मिक समुदायों के भीतर गोरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय सामाजिक सद्भाव को लेकर एक बड़े स्तर का संकल्प माना जा रहा है।

ऐतिहासिक रूप से गाय और उसके संरक्षण को लेकर हिंदू समुदायों में आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है। उदाहरण के लिए, 1966 के प्रोटेस्ट मूवमेंट में धार्मिक नेताओं और साधुओं ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर आंदोलन किया था, जिसमें प्रमुख शंकराचार्य और धार्मिक संगठनों सहित हजारों लोग शामिल थे, जिसने राष्ट्रीय राजनीति पर भी गहरा प्रभाव डाला था।

ताज़ा आंदोलन का स्वरूप पहले की अपेक्षा अधिक संगठित और पॉलिसी-ड्रिवन प्रतीत होता है। चारों पीठों का समर्थन प्राप्त होने पर यह न केवल एक धार्मिक मिलन की कहानी होगी बल्कि हिंदू परंपरा और सामाजिक एकता का एक बड़ा संदेश भी देगा।


विवाद के राजनीतिक व सामाजिक आयाम

अविमुक्तेश्वरानंद का विवाद केवल धार्मिक रस्मों तक सीमित नहीं रहा है। उन्होंने राष्ट्रीय मुद्दों पर भी बयान दिए हैं, जैसे राष्ट्रीय सार्वजनिक नीतियों और राजनीतिक नेतृत्व पर दृष्टिकोण उल्लेखनीय रहा है। उदाहरण के लिए उन्होंने राम मंदिर के आधिकारिक उद्घाटन में शामिल नहीं होने तथा सरकारों पर विभिन्न आरोप लगाए हैं, जो सामाजिक-राजनीतिक चर्चाओं में भी जगह बना रहे हैं।

यूपी मुख्यमंत्री एवं अन्य राजनीतिक नेताओं द्वारा उनके बयानों पर प्रतिक्रिया और कटु टिप्पणियों ने विवाद को और गहनता दी है।


धार्मिक शोधकर्ताओं के अनुसार, यदि चारों शंकराचार्य 10 मार्च को सफलतापूर्वक एक मंच पर आते हैं, तो यह न केवल धार्मिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम होगा, बल्कि यह सम्प्रदायों के बीच संवाद एवं सामाजिक एकता के लिए एक सकारात्मक संकेत भी बन सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि शांतिपूर्ण और आदर्श कार्यक्रम धार्मिक नेतृत्व की प्रतिष्ठा को मजबूत करेगा और विवाद के समाधान के नए मार्ग खोल सकता है।



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