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अमर बरगद! 500 साल से सांस ले रहा ‘कल्पवृक्ष’, यूपी के इस गांव में छिपा है प्रकृति का चमत्कार

By tvlnews January 21, 2026
अमर बरगद! 500 साल से सांस ले रहा ‘कल्पवृक्ष’, यूपी के इस गांव में छिपा है प्रकृति का चमत्कार

उत्तर प्रदेश की धरती पर एक ऐसा प्राकृतिक चमत्कार मौजूद है, जिसे देखकर समय भी ठहर-सा जाता है। सदियों से खड़ा, पीढ़ियों को छांव देता और आज भी सांस लेता एक अमर बरगद—जिसकी उम्र करीब 500 साल आंकी जा रही है। यह विशाल बरगद इटावा में स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया पार्क में खड़ा है और स्थानीय लोग इसे श्रद्धा, आस्था और पर्यावरणीय विरासत—तीनों का प्रतीक मानते हैं।


500 साल पुराना ‘कल्पवृक्ष’—आकार देख उड़ जाएंगे होश

स्थानीय उद्यान विभाग और पार्क प्रशासन के मुताबिक, यह बरगद लगभग 100 फीट से अधिक के दायरे में फैला हुआ है। इसकी हवाई जड़ें (एरियल रूट्स) ज़मीन में उतरकर नई शाखाओं का सहारा बन चुकी हैं और करीब 100 मीटर तक फैली जड़ें इसके असाधारण विस्तार को दर्शाती हैं।
 सुबह-शाम पार्क में टहलने आने वाले हज़ारों लोगों के लिए यह पेड़ शुद्ध हवा का सबसे बड़ा स्रोत है। आमावस्या जैसे धार्मिक अवसरों पर यहां पूजा-अर्चना के लिए सैकड़ों महिलाएं और परिवार जुटते हैं—यानी यह बरगद प्रकृति के साथ-साथ लोकजीवन का भी अभिन्न हिस्सा है।


कंपनी बाग से डॉ. राम मनोहर लोहिया पार्क तक

स्थानीय लोग आज भी इस पार्क को “कंपनी बाग” के नाम से जानते हैं। हालांकि, 2012 में इसका आधिकारिक नाम समाजवादी विचारक डॉ. राम मनोहर लोहिया के नाम पर रखा गया। पार्क प्रशासन के अनुसार, यहां प्रतिदिन लगभग 5,000 लोग भ्रमण के लिए आते हैं।
 इटावा-मैनपुरी मार्ग से गुजरने वाले सैकड़ों यात्री भी इस बरगद की छांव में कुछ पल ठहरकर ठंडक और सुकून पाते हैं—यही वजह है कि इसे इटावा का सबसे पुराना और विशाल पेड़ माना जाता है।


बुलंदशहर का ऐतिहासिक बरगद—दुनिया के विशाल बरगदों में शामिल

यूपी में ही एक और ऐतिहासिक बरगद चर्चा में है—जो बुलंदशहर जिले के नरौरा क्षेत्र में स्थित बताया जाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, यह बरगद 450–500 साल पुराना हो सकता है और रेडियोकार्बन डेटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों से इसकी आयु का अनुमान लगाया गया है।
 रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बरगद का ऊपरी घेरा लगभग 4,069 वर्ग मीटर में फैला हुआ है और अपने आकार के कारण यह दुनिया के विशाल बरगदों में शीर्ष-10 में स्थान रखता है। यह पेड़ नरौरा पावर प्लांट से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित है।


वैज्ञानिक शोध और अंतरराष्ट्रीय रुचि

इस ऐतिहासिक बरगद पर भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (प्रयागराज केंद्र) सहित अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया है।
 शोध में Babeș-Bolyai University (रोमानिया) और University of Johannesburg से जुड़ी प्रयोगशालाओं की टीमों का भी सहयोग बताया गया है। यह अध्ययन गंगा रामसर क्षेत्र में किए गए एक फ्लोरिस्टिक सर्वे के दौरान सामने आया, जिसने इस बरगद को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।


‘कल्पवृक्ष’ का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व

भारत में बरगद को ‘कल्पवृक्ष’ कहा जाता है—अर्थात इच्छा-पूर्ति का प्रतीक। पौराणिक मान्यताओं में इसे दीर्घायु, स्थिरता और समृद्धि का द्योतक माना गया है। यही वजह है कि गांव-कस्बों में आज भी बरगद के नीचे पंचायतें, मेल-मिलाप और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं।
 पर्यावरणविदों के अनुसार, बरगद जैसे वृक्ष कार्बन अवशोषणजैव विविधता संरक्षण और स्थानीय माइक्रो-क्लाइमेट को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


पर्यावरण के लिए क्यों अहम हैं ऐसे प्राचीन वृक्ष?

  • ऑक्सीजन का विशाल स्रोत: सदियों पुराना बरगद लाखों लोगों को शुद्ध हवा देता है।

  • जैव विविधता का घर: पक्षी, कीट, छोटे जीव—सब इसके इकोसिस्टम का हिस्सा हैं।

  • जलवायु संतुलन: बड़े पेड़ तापमान को नियंत्रित करते हैं और शहरी गर्मी (Urban Heat) घटाते हैं।

  • सांस्कृतिक विरासत: ऐसे वृक्ष स्थानीय इतिहास और पहचान को जीवित रखते हैं।


संरक्षण की जरूरत—आज नहीं तो कब?

विशेषज्ञों का मानना है कि 500 साल पुराने ऐसे वृक्षों का संरक्षण राष्ट्रीय विरासत की तरह किया जाना चाहिए। नियमित देखभाल, वैज्ञानिक मॉनिटरिंग और आसपास के अतिक्रमण से सुरक्षा—ये सभी कदम जरूरी हैं।
 इटावा और बुलंदशहर के ये बरगद न सिर्फ यूपी, बल्कि पूरे देश की प्राकृतिक धरोहर हैं।


उत्तर प्रदेश के इटावा और बुलंदशहर में मौजूद ये अमर बरगद समय की कसौटी पर खरे उतरते हुए आज भी जीवन दे रहे हैं। 500 साल से सांस लेता यह ‘कल्पवृक्ष’ हमें याद दिलाता है कि विकास के साथ-साथ प्रकृति का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है। अगर इन्हें सहेजा गया, तो आने वाली पीढ़ियां भी इनकी छांव और विरासत का अनुभव कर सकेंगी।



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