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Ram Mandir Shila Claim: दान विवाद के बीच 1250 बहुमूल्य श्रीराम शिलाओं के गायब होने का दावा, SIT जांच के बीच नया सवाल

By tvlnews June 16, 2026
Ram Mandir Shila Claim: दान विवाद के बीच 1250 बहुमूल्य श्रीराम शिलाओं के गायब होने का दावा, SIT जांच के बीच नया सवाल

अयोध्या राम मंदिर के दान और चढ़ावे से जुड़े विवाद के बीच अब 1250 बहुमूल्य श्रीराम शिलाओं के गायब होने का दावा सामने आया है। धर्मसेना के संस्थापक संतोष दुबे के हवाले से कहा गया है कि 1989 में देश-विदेश से पूजित होकर आईं सोने-चांदी, अष्टधातु और रत्नजड़ित शिलाओं का अब स्पष्ट सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं दिख रहा। हालांकि, इस दावे की अब तक किसी आधिकारिक जांच एजेंसी या श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने पुष्टि नहीं की है।

1250 श्रीराम शिलाओं वाला नया दावा क्या है?

राम मंदिर दान विवाद के बीच सामने आए इस नए दावे में कहा गया है कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान देश-विदेश से श्रद्धालुओं ने पूजित श्रीराम शिलाएं अयोध्या भेजी थीं। दावा है कि इनमें मिट्टी/ईंट की शिलाओं के अलावा धातु, सोना, चांदी, अष्टधातु और रत्नों से जुड़ी बहुमूल्य शिलाएं भी शामिल थीं।

धर्मसेना के संस्थापक संतोष दुबे के हवाले से आरोप लगाया गया है कि ऐसी करीब 1250 बहुमूल्य शिलाएं अब दिखाई नहीं देतीं। उन्होंने दावा किया कि 2002 तक ये शिलाएं कारसेवकपुरम में रखी गई थीं। उनके अनुसार, मिट्टी की पूजित शिलाएं आज भी कारसेवकपुरम में मौजूद बताई जाती हैं, लेकिन बहुमूल्य धातु वाली शिलाओं को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं है।

यह पूरा दावा अभी आरोप के स्तर पर है। TVL News स्वतंत्र रूप से इन शिलाओं की संख्या, धातु, कीमत, दानकर्ताओं या वर्तमान स्थिति की पुष्टि नहीं कर सका है।

मॉरीशस और मुंबई से आई शिलाओं का दावा क्यों चर्चा में है?

दावे में कहा गया है कि इन शिलाओं में एक अत्यंत मूल्यवान शिला मॉरीशस से आई थी, जबकि मुंबई के एक व्यापारी ने हीरे जड़ी शिला दान की थी। इन दावों के कारण मामला केवल मंदिर दान या नकद चढ़ावे तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी ऐतिहासिक और भावनात्मक धरोहरों की सुरक्षा पर भी सवाल उठने लगे हैं।

यदि ऐसी शिलाएं वास्तव में दान में प्राप्त हुई थीं, तो सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि उनका आधिकारिक inventory record, receipt, storage register, handover document और custody chain कहां दर्ज है। किसी भी धार्मिक ट्रस्ट या सार्वजनिक आस्था से जुड़े संस्थान में बहुमूल्य दान सामग्री का लेखा-जोखा पारदर्शिता के लिहाज से बेहद जरूरी माना जाता है।

कारसेवकपुरम से जुड़ा संदर्भ और 1989 की पृष्ठभूमि

राम मंदिर आंदोलन के दौरान 1989 में शिला पूजन अभियान बड़े पैमाने पर चलाया गया था। देश के अलग-अलग राज्यों और विदेशों से भी श्रद्धालुओं द्वारा पूजित शिलाएं अयोध्या भेजे जाने की बात लंबे समय से सार्वजनिक स्मृति और आंदोलन के इतिहास का हिस्सा रही है।

कारसेवकपुरम को राम मंदिर आंदोलन और मंदिर निर्माण से जुड़ी कई गतिविधियों का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। इसी संदर्भ में अब यह दावा उठाया गया है कि 1989 में आईं कुछ विशेष बहुमूल्य शिलाएं 2002 तक वहां मौजूद थीं, लेकिन बाद में उनका सार्वजनिक रिकॉर्ड या दृश्य उपस्थिति स्पष्ट नहीं है।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि ऐतिहासिक धार्मिक दावों और मौजूदा criminal/financial जांच के बीच फर्क रखना जरूरी है। जब तक कोई official inventory, SIT finding या court record सामने नहीं आता, तब तक “गायब शिलाएं” वाला दावा जांच योग्य allegation ही माना जाएगा।

SIT जांच अभी किस मामले में चल रही है?

राम मंदिर दान विवाद को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन सदस्यीय Special Investigation Team यानी SIT गठित की है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, SIT अयोध्या पहुंचकर मंदिर परिसर, दस्तावेजों और संबंधित अधिकारियों/कर्मचारियों से जुड़ी जानकारी की जांच कर रही है। PTI/द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, टीम मंदिर परिसर में पहुंची और कथित donation fund misappropriation से जुड़े पहलुओं की पड़ताल शुरू की।

रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया है कि SIT ने दस्तावेजों की छानबीन की और कई लोगों से पूछताछ की। फिलहाल सार्वजनिक रिपोर्ट्स में SIT का मुख्य फोकस राम मंदिर में चढ़ावे/दान की कथित अनियमितताओं पर बताया गया है। 1250 श्रीराम शिलाओं वाला बिंदु आधिकारिक रूप से SIT के दायरे में शामिल है या नहीं, इसकी पुष्टि अभी नहीं हुई है।

ट्रस्ट और निर्माण समिति की प्रतिक्रिया क्या रही?

राम मंदिर दान विवाद पर ट्रस्ट से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारियों की ओर से जांच का स्वागत करने और सत्य सामने आने की बात कही गई है। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने कहा कि SIT जांच से सच सामने आएगा और भक्तों का विश्वास मजबूत होगा।

दूसरी ओर, कुछ रिपोर्ट्स में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय की ओर से आरोपों को निराधार बताने और audit process जारी होने की बात सामने आई है। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया कि चंपत राय ने वीडियो क्लिप के जरिए कहा था कि ऐसा कोई तथ्य अभी सामने नहीं आया है, क्योंकि मंदिर funds का audit जारी है।

1250 शिलाओं के दावे में चंपत राय का नाम जिम्मेदारी के संदर्भ में लिया गया है, लेकिन इस विशेष दावे पर उनका कोई verified public statement उपलब्ध नहीं मिला। इसलिए इस हिस्से को भी आरोप/दावे के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

दान, धरोहर और रिकॉर्ड-कीपिंग पर क्यों उठ रहे सवाल?

मंदिरों में नकद दान, आभूषण, धातु, रत्न, मूर्तियां या अन्य बहुमूल्य सामग्री दान के रूप में आती रही है। ऐसे दान का व्यवस्थित record, valuation, audit और security protocol आस्था के साथ-साथ legal accountability के लिए भी जरूरी होता है।

अगर 1989 से जुड़े बहुमूल्य श्रीराम शिलाओं का दावा आगे जांच के दायरे में आता है, तो जांच एजेंसियों को कम से कम पांच स्तरों पर तथ्य देखने पड़ सकते हैं: शिलाओं की मूल सूची, दानकर्ताओं के रिकॉर्ड, custody transfer documents, storage location, और वर्तमान physical verification।

ऐसे मामलों में केवल मौखिक दावा पर्याप्त नहीं माना जाता। official register, receipt book, पुरानी photos/videos, trust/committee minutes, police/security records और witnesses के बयान मिलकर ही विश्वसनीय तस्वीर बना सकते हैं।

राजनीतिक और सामाजिक असर

राम मंदिर देश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा विषय है। इसलिए दान या शिला जैसी वस्तुओं को लेकर उठे सवाल तुरंत राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव सहित विपक्षी नेताओं ने donation row को लेकर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार ने SIT गठित कर जांच की प्रक्रिया शुरू की है।

इस विवाद का असर केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है। यह धार्मिक संस्थानों में दान प्रबंधन, पारदर्शिता, CCTV निगरानी, audit और public disclosure जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श में ला रहा है।

जांच में आगे क्या देखा जा सकता है?

यदि SIT या कोई अन्य competent authority 1250 शिलाओं वाले दावे को जांच के दायरे में लेती है, तो सबसे पहले official inventory और custody records की मांग हो सकती है। इसके बाद कारसेवकपुरम, ट्रस्ट कार्यालय, पुराने राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े संगठनों और संबंधित व्यक्तियों से रिकॉर्ड जुटाए जा सकते हैं।

मामले में दावे का समय-फ्रेम भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 1989 से 2002 और फिर वर्तमान तक की custody chain लंबी है। इसलिए जांच में पुराने दस्तावेजों, storage व्यवस्था और संबंधित समितियों की भूमिका को अलग-अलग तरीके से देखना होगा।




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