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IVF से पैदा हुए जुड़वां बच्चों का DNA माता-पिता से नहीं हुआ मैच, गुरुग्राम के एक दंपत्ति का दावा

By tvlnews June 15, 2026
IVF से पैदा हुए जुड़वां बच्चों का DNA माता-पिता से नहीं हुआ मैच, गुरुग्राम के एक दंपत्ति का दावा


  • गुरुग्राम के राहुल राठौर और मीनू राठौर ने दावा किया है कि IVF से जन्मीं जुड़वां बच्चियों का DNA उनसे मैच नहीं हुआ।

  • दंपति के अनुसार, IVF प्रक्रिया दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित एक fertility/IVF clinic में हुई थी।

  • रिपोर्ट्स के मुताबिक, 13 फरवरी 2025 को egg retrieval और semen collection, जबकि 14 मई 2025 को embryo transfer हुआ बताया गया है।

  • 5 जनवरी 2026 को मीनू राठौर ने जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया; बाद में शक के आधार पर DNA टेस्ट कराया गया।

  • अदालत के आदेश के बाद FIR दर्ज हुई है, लेकिन आरोप अभी जांच के अधीन हैं और स्वतंत्र रूप से साबित नहीं हुए हैं।

  • मामला IVF प्रक्रिया, मेडिकल रिकॉर्ड, embryo/gamete handling और ART कानून के पालन को लेकर गंभीर सवाल उठाता है।


गुरुग्राम के एक दंपति ने दावा किया है कि IVF प्रक्रिया से जन्मीं उनकी जुड़वां बच्चियों का DNA टेस्ट माता-पिता से मेल नहीं खा रहा है। दंपति का आरोप है कि या तो embryo mix-up हुआ या जन्म के बाद बच्चे की अदला-बदली हुई। अदालत के आदेश के बाद FIR दर्ज कर जांच शुरू की गई है, लेकिन आरोप अभी जांच के अधीन हैं और किसी एजेंसी ने अंतिम निष्कर्ष घोषित नहीं किया है।

क्या है पूरा मामला?

गुरुग्राम निवासी राहुल राठौर और उनकी पत्नी मीनू राठौर ने IVF treatment के बाद जुड़वां बच्चियों के जन्म को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। दंपति का दावा है कि उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए IVF प्रक्रिया अपनाई थी, लेकिन जन्म के बाद बच्चियों की शक्ल-सूरत को देखकर परिवार को संदेह हुआ। इसके बाद DNA test कराया गया।

दंपति के मुताबिक, DNA रिपोर्ट में जैविक संबंध स्थापित नहीं हुआ। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा “दोनों बच्चियों” को लेकर बताया गया है, जबकि कुछ रिपोर्ट्स में “एक बच्ची” के संदर्भ में DNA mismatch का उल्लेख है। इसलिए जांच पूरी होने तक इस पहलू को दंपति का दावा और रिपोर्ट्स के आधार पर सामने आई जानकारी ही माना जाना चाहिए।

दंपति ने यह भी आरोप लगाया है कि उनके egg और sperm से बना embryo पत्नी के गर्भ में प्रत्यारोपित नहीं किया गया, या किसी स्तर पर embryo/baby swap हुआ। यह आरोप बेहद गंभीर है, इसलिए इसकी पुष्टि IVF lab records, consent forms, CCTV footage, DNA reports और police investigation के आधार पर ही हो सकती है।

कब और कहां हुई घटना?

रिपोर्ट्स के अनुसार, दंपति ने IVF treatment के लिए पहले गुरुग्राम/दिल्ली-NCR में डॉक्टरों से संपर्क किया और बाद में दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित fertility/IVF centre में प्रक्रिया आगे बढ़ी। दंपति के बयान के अनुसार, 9 जनवरी 2025 को IVF से जुड़े टेस्ट किए गए।

राहुल राठौर के दावे के मुताबिक, 13 फरवरी 2025 को पत्नी के egg retrieval और उनके semen collection की प्रक्रिया हुई। इसके बाद 14 मई 2025 को embryo transfer किया गया। 5 जनवरी 2026 को मीनू राठौर ने दो बच्चियों को जन्म दिया।

परिवार का कहना है कि जन्म के बाद उन्हें बच्चियों की शारीरिक बनावट को देखकर संदेह हुआ, जिसके बाद DNA जांच कराई गई। दंपति के अनुसार, इसी DNA test ने पूरे मामले को अदालत और पुलिस तक पहुंचा दिया।

किसने क्या कहा?

दंपति ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्हें IVF centre की ओर से यह भरोसा दिया गया था कि प्रक्रिया में उनके ही biological samples यानी egg और sperm का इस्तेमाल होगा। उनका आरोप है कि DNA रिपोर्ट आने के बाद उन्होंने clinic और authorities से जवाब मांगा, लेकिन संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई।

राहुल राठौर ने रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया कि उन्होंने अस्पताल से लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय और ART विभाग तक शिकायत की। उनके अनुसार, कई महीनों तक पुलिस में FIR दर्ज नहीं हुई, जिसके बाद उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अदालत के आदेश के बाद FIR दर्ज की गई। हालांकि, अस्पताल/clinic या संबंधित डॉक्टरों की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक सार्वजनिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी भी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराना अभी जल्दबाजी होगी।

जांच, कार्रवाई और मौजूदा स्थिति

मामले में FIR दर्ज होने के बाद पुलिस जांच शुरू होने की बात सामने आई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, जांच में IVF records, consent forms, lab data, embryo transfer records, CCTV footage, chain-of-custody details और DNA reports अहम भूमिका निभा सकते हैं।

दंपति का आरोप है कि जरूरी records समय पर सुरक्षित नहीं किए गए। यह जांच का महत्वपूर्ण बिंदु हो सकता है, क्योंकि IVF जैसे मामलों में दस्तावेज, lab logs और sample-handling records ही यह स्पष्ट कर सकते हैं कि प्रक्रिया में किस sample का उपयोग हुआ और embryo transfer किस तरह किया गया।

भारत में ART यानी Assisted Reproductive Technology clinics के लिए कानूनी नियम मौजूद हैं। ART Rules, 2022 के तहत clinics/banks को case-related records, consent forms, laboratory results, microscopic pictures, sonographic plates/slides और संबंधित letters को ART procedure पूरी होने की तारीख से 10 साल तक सुरक्षित रखना होता है। इसी तरह नियमों में यह भी कहा गया है कि unused gametes/embryos को उसी recipient के लिए सुरक्षित रखा जाए और किसी दूसरे couple/woman के लिए इस्तेमाल न किया जाए।

इस मामले का असर क्यों महत्वपूर्ण है?

यह मामला सिर्फ एक परिवार का निजी विवाद नहीं है। यदि दंपति के आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह IVF process, fertility clinic monitoring, embryo identification, lab protocol और patient consent system पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।

IVF treatment में माता-पिता का भरोसा पूरी प्रक्रिया की बुनियाद होता है। egg retrieval, sperm collection, embryo creation, freezing, transfer और documentation—इन सभी चरणों में chain of identity सबसे महत्वपूर्ण होती है। किसी भी स्तर पर चूक होने का असर केवल medical outcome तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बच्चे की identity, parents के legal rights, inheritance, emotional trauma और medical ethics तक पहुंच जाता है।

इसलिए इस मामले में निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि DNA mismatch claim के पीछे वास्तविक कारण क्या है—embryo mix-up, lab documentation error, baby swap allegation, DNA report interpretation issue या कोई अन्य मेडिकल/कानूनी पहलू।

पृष्ठभूमि

IVF यानी In Vitro Fertilization एक medical procedure है, जिसमें egg और sperm को शरीर के बाहर laboratory में fertilize किया जाता है। इसके बाद embryo को महिला के uterus में transfer किया जाता है। भारत में IVF और अन्य assisted reproductive procedures को Assisted Reproductive Technology (Regulation) Act, 2021 और ART Rules, 2022 के तहत regulate किया जाता है।

National ART & Surrogacy Portal, Department of Health Research, Ministry of Health & Family Welfare के अंतर्गत ART-related registration, rules और official information उपलब्ध कराता है। इसका उद्देश्य ART clinics और banks की accountability, registry और regulatory compliance को मजबूत करना है।

इस case ने इसी regulatory framework को public debate में ला दिया है। लोग जानना चाहते हैं कि IVF labs में sample labeling, embryo tracking, CCTV recording, consent management और complaint redressal system किस तरह लागू होता है।

अब आगे क्या?

अब जांच में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि दंपति की DNA report, IVF records और clinic documents एक-दूसरे से मेल खाते हैं या नहीं। पुलिस को यह भी देखना होगा कि egg retrieval, sperm collection, embryo creation और embryo transfer की chain-of-custody में कोई discrepancy है या नहीं।

आगे की कार्रवाई में court-monitored investigation, clinic records की seizure, expert medical board की राय, DNA re-testing, lab audit और ART authority की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि जांच में medical negligence या criminal wrongdoing के संकेत मिलते हैं, तो संबंधित धाराओं में आगे कार्रवाई हो सकती है।

दूसरी ओर, यदि जांच में documentary evidence से आरोप साबित नहीं होते, तो स्थिति अलग हो सकती है। इसलिए इस stage पर सभी दावों को जांच के अधीन ही माना जाना चाहिए।



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