COP33 की मेजबानी से भारत पीछे क्यों हटा? 2028 जलवायु शिखर सम्मेलन पर बड़ा कूटनीतिक संकेत
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भारत ने 2028 में होने वाले COP33 की मेजबानी का प्रस्ताव वापस ले लिया है, और यह निर्णय 2 अप्रैल को एशिया-प्रशांत समूह को सूचित किया गया।
यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि 1 दिसंबर 2023 को दुबई में COP28 के दौरान प्रधानमंत्री ने खुद भारत की दावेदारी पेश की थी।
जुलाई 2025 में पर्यावरण मंत्रालय ने COP-33 सेल भी बनाई थी, जिससे साफ था कि तैयारियां संस्थागत स्तर पर शुरू हो चुकी थीं।
अब तक सरकार ने विस्तृत सार्वजनिक कारण नहीं बताया है; उपलब्ध रिपोर्टों में 2028 की प्रतिबद्धताओं की समीक्षा को प्रमुख वजह बताया गया है।
साथ ही, मार्च 2026 में भारत ने 2031-35 के लिए अपने जलवायु लक्ष्य और मजबूत किए, इसलिए यह कदम जलवायु एजेंडा से पीछे हटना नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं के पुनर्संतुलन की तरह दिखता है।
नई दिल्ली — भारत ने 2028 में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन COP33 की मेजबानी का प्रस्ताव वापस ले लिया है। आधिकारिक प्रसारण मंच पर प्रकाशित जानकारी के अनुसार यह फैसला 2 अप्रैल को एशिया-प्रशांत समूह को बता दिया गया। इससे वैश्विक जलवायु कूटनीति में भारत की भूमिका को लेकर नई बहस शुरू हो गई है, क्योंकि COP जैसे सम्मेलन केवल प्रतीकात्मक आयोजन नहीं होते, बल्कि वे देशों की कूटनीतिक प्राथमिकताओं और जलवायु नेतृत्व का भी संकेत देते हैं।
यह फैसला इसलिए और बड़ा माना जा रहा है क्योंकि 1 दिसंबर 2023 को दुबई में COP28 के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद 2028 में COP33 की मेजबानी का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद सरकार ने तैयारियों की दिशा में संस्थागत कदम भी उठाए। 15 जुलाई 2025 के पर्यावरण मंत्रालय के एक कार्यालय आदेश में COP-33 सेल गठित की गई थी, जिसका उद्देश्य इस आयोजन से जुड़ी पेशेवर और लॉजिस्टिक जरूरतों को संभालना था। यानी दावेदारी केवल राजनीतिक घोषणा नहीं थी; प्रशासनिक तैयारी भी शुरू हो चुकी थी।
सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि भारत पीछे क्यों हटा। अब तक सरकार की ओर से इसका विस्तृत सार्वजनिक कारण सामने नहीं आया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, भारत ने 2028 के लिए अपनी प्रतिबद्धताओं की समीक्षा के बाद मेजबानी से हटने का फैसला किया। इसका सीधा अर्थ यह हो सकता है कि सरकार ने उस साल की घरेलू, वित्तीय, कूटनीतिक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं का नए सिरे से आकलन किया है। हालांकि, आधिकारिक स्पष्टीकरण के बिना इससे आगे का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
फिर भी इस फैसले को जलवायु एजेंडा से पीछे हटना कहना फिलहाल सही नहीं होगा। 25 मार्च 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2031-35 अवधि के लिए भारत की नई राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) मंजूर की। इनमें 2005 के स्तर की तुलना में 2035 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता 47 प्रतिशत घटाने, 2035 तक 60 प्रतिशत संचयी स्थापित बिजली क्षमता गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करने और 3.5 से 4.0 अरब टन CO₂ समतुल्य का कार्बन सिंक बनाने का लक्ष्य शामिल है। ये लक्ष्य 2070 नेट-जीरो लक्ष्य के साथ जोड़े गए हैं।
यही वजह है कि COP33 मेजबानी से हटने का संकेत दो परतों में पढ़ा जाना चाहिए। पहली, भारत वैश्विक जलवायु वार्ता से बाहर नहीं जा रहा। दूसरी, वह मेजबानी जैसे बड़े मंच की बजाय अपने राष्ट्रीय हित, विकास जरूरतों और संसाधन-संतुलन को प्राथमिकता दे रहा है। अभी की स्थिति में सबसे सटीक निष्कर्ष यही है कि यह जलवायु नीति से पलटना नहीं, बल्कि 2028 के लिए कूटनीतिक पुनर्संतुलन है।
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