सूरत में बिना दूध के 1400 किलो पनीर पकड़ा गया: दूध नहीं, पाम ऑयल और एसिड के इस्तेमाल का आरोप
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सूरत के पांडेसरा इलाके में मार्च 2026 की छापेमारी में 1,401 किलो पनीर जैसी सामग्री, रसायन और मशीनरी जब्त की गई; बाद की लैब जांच में नमूना “sub-standard” पाया गया।
अधिकारियों के अनुसार जब्त सामग्री में पाम ऑयल और एसिड मिला, जबकि मामला कथित तौर पर “एनालॉग पनीर” को असली पनीर की तरह बेचने से जुड़ा है।
गुजरात में इसके बाद रेस्तरां और खाद्य कारोबारियों को यह स्पष्ट बताने पर जोर बढ़ा है कि वे दूध वाला पनीर परोस रहे हैं या “analogue” विकल्प।
नियामकीय स्तर पर “analogue paneer” खुद बैन नहीं है, लेकिन उसे सही लेबलिंग के बिना बेचना या मिलावटी/घटिया उत्पाद को असली पनीर बताना भ्रामक और दंडनीय हो सकता है।
सूरत के पांडेसरा इलाके में पकड़े गए कथित नकली पनीर मामले ने गुजरात में खाद्य सुरक्षा पर नई चिंता खड़ी कर दी है। मार्च 2026 की शुरुआत में की गई छापेमारी में 1,401 किलो पनीर जैसी सामग्री, पैकेजिंग सामान, पाम ऑयल के टिन, एसिड और मशीनरी बरामद की गई थी। अब लैब रिपोर्ट आने के बाद यह सामग्री “sub-standard” पाई गई है, जिसके बाद पुलिस ने आपराधिक मामला दर्ज किया है।
अधिकारियों के मुताबिक, यह कार्रवाई 3 मार्च को सूरत नगर निकाय के फूड सेफ्टी विभाग और विशेष अभियान दल की संयुक्त जांच के दौरान हुई। जब्त ढीले पनीर का मूल्य करीब 3.08 लाख रुपये बताया गया, जबकि मशीनरी और अन्य सामान मिलाकर कुल जब्ती लगभग 28 लाख रुपये के आसपास पहुंची। जांच में पाम ऑयल और एसिड जैसे पदार्थ मिलने की बात सामने आई है।
मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि यहां केवल “नकली” बनाम “असली” पनीर की बहस नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, यह उत्पाद “analogue paneer” या पनीर जैसे विकल्प के रूप में तैयार किया जा रहा था, जिसमें प्राकृतिक दूध वसा की जगह वनस्पति तेल और अन्य घटकों का इस्तेमाल किया गया। समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब ऐसे उत्पाद को उपभोक्ताओं के सामने दूध से बने पनीर की तरह बेचा जाए या जब उसमें खाद्य-ग्रेड सामग्री की जगह संदिग्ध रसायनों का उपयोग हो।
इस मामले में लैब रिपोर्ट के बाद कानूनी कार्रवाई इसलिए तेज हुई क्योंकि जब्त नमूने नियमानुसार गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे। रिपोर्टों के मुताबिक, आरोपी पिछले करीब दो वर्षों से यह यूनिट चला रहा था और कथित तौर पर रोजाना सैकड़ों किलो सामग्री तैयार की जाती थी। शुरुआती जांच में यह भी सामने आया कि उत्पाद को बाजार में कम कीमत पर छोटे डेयरी ऑपरेटरों, सस्ते भोजनालयों और स्थानीय सप्लाई चैनलों तक पहुंचाया जाता था।
इस प्रकरण का असर अब राज्य-स्तरीय नीति पर भी दिख रहा है। गुजरात में खाद्य कारोबारियों और रेस्तरां को यह स्पष्ट बताने के निर्देश सख्त किए जा रहे हैं कि वे दूध से बना पनीर इस्तेमाल कर रहे हैं या “analogue” विकल्प। राष्ट्रीय स्तर पर भी नियामक पहले से डेयरी एनालॉग उत्पादों की लेबलिंग और निगरानी पर जोर देते रहे हैं, और हाल में राज्यों को पनीर व डेयरी एनालॉग की जांच तेज करने को कहा गया है।
इस मामले से दो बातें साफ होती हैं। पहली, हर सस्ता पनीर जरूरी नहीं कि दूध से बना हो। दूसरी, “analogue” और “adulterated” एक ही चीज नहीं हैं: सही लेबलिंग वाला एनालॉग उत्पाद एक अलग श्रेणी है, लेकिन घटिया, भ्रामक या मानक-विरुद्ध उत्पाद सीधे खाद्य सुरक्षा का मामला बन जाता है। सूरत की कार्रवाई इसी दूसरी श्रेणी की गंभीरता को दिखाती है।
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