यूपी पंचायत चुनाव 2026: प्रशासक समिति के माध्यम से ग्राम पंचायत प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने की तैयारी
यूपी पंचायत चुनाव 2026 समय पर होने की संभावना कमजोर दिख रही है। ग्राम पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल 26 मई 2026 को पूरा हो रहा है, जबकि अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन अब 10 जून 2026 तक टल गया है। इसी बीच मौजूदा ग्राम प्रधानों को प्रशासक समिति के माध्यम से ग्राम पंचायत चलाने की जिम्मेदारी देने पर विचार किया जा रहा है।
यूपी पंचायत चुनाव 2026: ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने की तैयारी, प्रशासक समिति को मिल सकती है जिम्मेदारी
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव का इंतजार कर रहे लाखों ग्रामीण मतदाताओं और संभावित उम्मीदवारों के लिए बड़ी खबर सामने आई है। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव समय पर होने की संभावना अब कमजोर दिख रही है। इसकी मुख्य वजह मतदाता सूची के प्रकाशन में देरी, पिछड़ा वर्ग आरक्षण से जुड़ी प्रक्रिया और न्यायालय में लंबित मामला बताया जा रहा है। मौजूदा ग्राम पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है।
ताजा स्थिति के अनुसार, राज्य में अंतिम पंचायत मतदाता सूची का प्रकाशन अब 10 जून 2026 को प्रस्तावित है। पहले यह सूची 22 अप्रैल को जारी होनी थी, लेकिन प्रक्रिया पूरी न होने के कारण तारीख आगे बढ़ाई गई। रिपोर्टों के मुताबिक, मतदाता सूची से जुड़े दावे-आपत्तियों, कंप्यूटरीकरण, मतदान स्थलों की मैपिंग और वार्ड क्रमांकन जैसे काम अभी पूरे होने बाकी हैं।
इसी देरी के बीच ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने या उन्हें किसी वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था के तहत जिम्मेदारी देने पर चर्चा तेज हो गई है। पंचायती राज विभाग के नियमों में दो संभावित व्यवस्थाओं का जिक्र किया जा रहा है। पहली व्यवस्था में ग्राम पंचायत का कार्यकाल खत्म होने के बाद एडीओ पंचायत जैसे अधिकारी को प्रशासक बनाया जाता है। दूसरी व्यवस्था में प्रशासक समिति बनाई जा सकती है, जिसमें जनप्रतिनिधियों को भी शामिल किया जा सकता है।
अगर सरकार प्रशासक समिति का रास्ता चुनती है, तो मौजूदा ग्राम प्रधान को समिति का अध्यक्ष बनाया जा सकता है। ऐसे में चुनाव होने तक ग्राम प्रधानों को ही ग्राम पंचायत के कामकाज की जिम्मेदारी मिल सकती है। हालांकि, इस पर अंतिम फैसला सरकार और न्यायालय की स्थिति को देखते हुए ही लिया जाएगा। पंचायती राज विभाग की ओर से संकेत मिले हैं कि निर्णय पंचायती राज एक्ट और जनहित को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।
ग्राम प्रधान संगठनों ने भी सरकार से मांग की है कि चुनाव में देरी की स्थिति में प्रशासक बैठाने के बजाय मौजूदा प्रधानों को ही जिम्मेदारी दी जाए। उनका तर्क है कि प्रशासनिक प्रशासक बैठाने से गांवों के विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं। संगठनों ने मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों के उदाहरण देते हुए कहा है कि वहां सरपंचों को प्रशासक जैसी भूमिका दी गई थी।
इस पूरे मामले में न्यायालय की भूमिका भी अहम हो गई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पहले राज्य निर्वाचन आयोग से पूछा था कि क्या पंचायत चुनाव मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने से पहले कराए जा सकते हैं। मौजूदा कार्यकाल 27 मई 2021 से शुरू होकर 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है। ऐसे में चुनावी कार्यक्रम, मतदाता सूची और आरक्षण प्रक्रिया पर अदालत के निर्देश आगे की राह तय कर सकते हैं।
राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के मौके पर यह मुद्दा और महत्वपूर्ण हो जाता है। हर साल 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है। इसी दिन 73वें संविधान संशोधन के लागू होने को याद किया जाता है, जिसके तहत पंचायतों को संवैधानिक दर्जा और स्थानीय स्वशासन की मजबूती मिली। पंचायत चुनाव में देरी इसलिए भी संवेदनशील मुद्दा है क्योंकि ग्राम पंचायतें ग्रामीण विकास, स्थानीय योजनाओं और बुनियादी सेवाओं की सबसे निचली लोकतांत्रिक इकाई हैं।
फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। अंतिम मतदाता सूची 10 जून 2026 को प्रकाशित होने के बाद ही चुनावी कार्यक्रम को लेकर स्पष्टता आने की उम्मीद है। 26 मई से पहले सरकार को यह तय करना होगा कि ग्राम पंचायतों में प्रशासक नियुक्त किए जाएं या प्रशासक समिति के माध्यम से मौजूदा जनप्रतिनिधियों को अस्थायी जिम्मेदारी दी जाए।
आम मतदाताओं, संभावित उम्मीदवारों और मौजूदा ग्राम प्रधानों की नजर अब सरकार, राज्य निर्वाचन आयोग और हाई कोर्ट के अगले कदम पर टिकी है। आने वाले हफ्ते उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति और पंचायत प्रशासन के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।
Powered by Froala Editor
