नई दिल्ली: भारत निर्वाचन आयोग ने मीडिया से संबंधित अपनी स्थिति पर हाल के बयानों का संज्ञान लिया है। आयोग ने इस संबंध में कुछ निश्चित प्रेस रिपोंर्टों का भी संज्ञान लिया है। आयोग ने हमेशा कोई निर्णय लेने से पहले उचित विचार-विमर्श किया है।
भारत निर्वाचन आयोग ने कहा कि,'चुनाव आयोग और उसके प्रत्येक सदस्य अतीत और वर्तमान में देश में चुनावी लोकतंत्र को मजबूत करने में और सभी चुनावों के संचालन में मीडिया द्वारा निभाई गई सकारात्मक भूमिका को स्वीकार करते हैं। आयोग एकमत है कि मीडिया रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध नहीं होना चाहिए|
EC ने कहा कि,''मीडिया के संबंध में आयोग यह मत स्पष्ट करना चाहता है कि वह स्वतंत्र मीडिया में गंभीर रूप से आस्था रखने के लिए संकल्पबद्ध है। संपूर्ण आयोग और इसके सदस्य अतीत और वर्तमान में संपन्न सभी चुनावों तथा देश में चुनावी लोकतंत्र को मजबूत बनाने में मीडिया द्वारा निभाई गई सकारात्मक भूमिका को मानते हैं। निर्वाचन आयोग की यह सर्वसम्मत राय है कि मीडिया रिपोर्टिंग के संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय के समक्ष किसी तरह की याचिका प्रस्तुत नहीं की जानी चाहिए।
आयोग निर्वाचन प्रक्रिया प्रारंभ होने से लेकर समाप्त होने तक चुनाव प्रबंधन को प्रभावी बनाने तथा पारदर्शिता लागू करने में मीडिया की भूमिका को विशेष रूप से मानता है। मीडिया के साथ सहयोग के बारे में भारत निर्वाचन आयोग का दृष्टिकोण स्वाभाविक सहयोगी का रहा है और इसमें परिवर्तन नहीं हुआ है।
दरअसल,'' सोमवार 26 अप्रैल को मद्रास हाईकोर्ट ने कहा था कि,'' कोरोना वायरस की दूसरी लहर के लिए भारत निर्वाचन आयोग जिम्मेदार हैं| 'कोरोना की दूसरी लहर के मौतों के लिए चुनाव आयोग पर शायद हत्या का मामला चलाना चाहिए| चुनाव आयोग "COVID दूसरी लहर के लिए अकेले जिम्मेदार था " और उसके अधिकारियों को "शायद हत्या" के लिए बुक किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस संजीब बनर्जी नाराज हो गए। उन्होंने चुनाव आयोग से पूछा, ‘‘जब चुनावी रैलियां हो रही थीं, तब आप दूसरे ग्रह पर थे क्या? रैलियों के दौरान टूट रहे कोविड प्रोटोकॉल को आपने नहीं रोका। बिना सोशल डिस्टेंसिंग के चुनावी रैलियां होती रहीं। कोरोना वायरस की दूसरी लहर के लिए आपकी संस्था ही जिम्मेदार है। चुनाव आयोग के अफसरों पर तो संभवत: हत्या का मुकदमा चलना चाहिए।’’
जिसके बाद,''हाई कोर्ट की इस टिप्पणी के खिलाफ चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था| सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि हाई कोर्ट की टिप्पणी को आयोग को इस तरह से लेना चाहिए जैसे मरीज डॉक्टर की कड़वी दवाई को लेता है|
सोमवार 3 मई को चुनाव आयोग की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि,हमारी अदालतों में बहस की एक भारतीय व्यवस्था है। यह एकपक्षीय नहीं है, जहां पहले एक व्यक्ति बोलता है, फिर जज बोलते हैं। यहां चर्चा होती है। मीडिया अदालतों की प्रक्रिया को बाहर लाने वाली मजबूत व्यवस्था है। हम इसकी रिपोर्टिंग पर आपत्ति नहीं जता सकते।
दरअसल,''आयोग ने मद्रास हाई कोर्ट की उस टिप्पणी के खिलाफ याचिका दी, जिसमें कहा गया था कि कोरोना मामले में आयोग के सदस्यों पर हत्या का मुकदमा चलना चाहिए। आयोग ने इस संबंध में मीडिया की रिपोर्टिंग पर सवाल उठाते हुए इस पर भी रोक की मांग की थी।
चुनाव आयोग ने अपनी याचिका में कहा है कि मद्रास हाई कोर्ट की टिप्पणी बेहद तल्ख है| कोर्ट ने आयोग को अपनी बात रखने का मौका भी नहीं दिया और न ही आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत जिम्मेदार अधिकारियों से कोई जवाब मांगा गया| इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘अक्सर कुछ बातें पिछले अनुभव और लगातार आदेशों के उल्लंघन को ध्यान में रखते हुए कही जाती हैं| सब कुछ ऑर्डर में नहीं हो सकता’|
चुनाव आयोग की दलील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मीडिया को किसी मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों द्वारा की गई मौखिक टिप्पणियों को रिपोर्ट करने से नहीं रोका जा सकता है।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, "जब रैलियां हो रही थीं, तो स्थिति इतनी खराब नहीं थी। हमें टिप्पणियों पर गंभीर आपत्ति है। उच्च न्यायालय के अवलोकन से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर निरंतर चर्चा हुई कि हम हत्यारे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि,'' जब सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों द्वारा कुछ देखा जाता है, तो यह बड़े जनहित में है। "वे भी मनुष्य हैं और वे भी तनावग्रस्त हैं। इसे सही भावना में लें। हम अपने उच्च न्यायालयों का मनोबल नहीं गिराना चाहते, वे हमारे लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कभी-कभी हम कठोर होते हैं, जनहित में बड़े कदम उठाए जाने की अपेक्षा रखते हैं| संभव है कि कई आदेशों पर अमल न होने पर हाई कोर्ट को दुख हुआ हो| आप गुजरात की घटना को देखिये जहां एक अस्पताल में आग लगने से 18 लोगों की मौत हो गई| जबकि कोर्ट फायर ऑडिट को लेकर कई बार आदेश देता रहता है’| इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों द्वारा की गई मौखिक टिप्पणियों की रिपोर्टिंग से मीडिया को रोका नहीं जा सकता है।
जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की एक बेंच मद्रास हाई कोर्ट द्वारा की गई मौखिक टिप्पणी के खिलाफ भारत के चुनाव आयोग द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी कि चुनाव आयोग "COVID दूसरी लहर के लिए अकेले जिम्मेदार था " और उसके अधिकारियों को "शायद हत्या" के लिए बुक किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा, "हम यह नहीं कह सकते हैं कि मीडिया कानून की अदालत में चर्चा की सामग्री को रिपोर्ट नहीं कर सकता है। कानून की अदालत में चर्चा समान सार्वजनिक हित की है, और मैं इसे अंतिम आदेश के रूप में उसी पायदान पर डालूंगा। अदालत में चर्चा बार और बेंच के बीच एक संवाद है। कानून की अदालत में बहस का खुलासा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है और मीडिया का इसे रिपोर्ट करने का कर्तव्य है। यह केवल हमारे निर्णय नहीं हैं जो हमारे नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण हैं।"
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, "हम चाहते हैं कि मीडिया पूरी तरह से रिपोर्ट करे कि कोर्ट में क्या हो रहा है। यह जवाबदेही की भावना लाता है। मीडिया रिपोर्टिंग यह भी बताएगी कि हम अपने कर्तव्यों का पूरी तरह से निर्वहन कर रहे है।" न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि मीडिया को मौखिक टिप्पणियों की रिपोर्टिंग से रोकने के लिए ईसीआई द्वारा की गई प्रार्थना "दूर की कौड़ी" है। न्यायमूर्ति एमआर शाह ने यह कहते हुए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की टिप्पणियों का समर्थन किया कि सार्वजनिक हित में मौखिक टिप्पणियां भी की जाती हैं। न्यायमूर्ति शाह ने कहा कि मजबूत टिप्पणियों को अक्सर गुस्से या हताशा के चलते किया जाता है, और कभी-कभी "कड़वी गोली" के रूप में काम कर सक???ी है।