नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके में रेलवे की जमीन से अतिक्रमण हटाने के हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के लिए 7 फरवरी की तारीख तय की है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को रेलवे भूमि मामले के संबंध में याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई की, जिसके लिए पिछले कुछ दिनों से विरोध प्रदर्शन चल रहा था और नियोजित अतिक्रमण पर रोक लगा दी, जो 10 जनवरी के आसपास शुरू होने वाली थी| हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके में घरों, स्कूलों, मंदिरों, बैंकों, मस्जिदों आदि को तोड़ना हैं, जिसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
आरोप है कि हल्द्वानी में करीब 4400 हजार परिवार रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण करके रहते हैं| हाईकोर्ट के आदेश पर हल्द्वानी अधिकारियों ने 4000 से अधिक परिवारों को बेदखली नोटिस जारी किया था। वहां रह रहे लोगों का दावा है कि वे वर्षों से इस क्षेत्र में रह रहे हैं। उनके पास सरकारी अधिकारियों द्वारा मान्यता प्राप्त वैध दस्तावेजों भी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने हल्द्वानी अतिक्रमण पर रोक लगाते हुए नोटिस जारी कर रेलवे और उत्तराखंड सरकार से जवाब मांगा है| सुप्रीम कोर्ट ने सात दिन में लोगों को हटाने के हाईकोर्ट के निर्देश पर आपत्ति जताते हुए कहा,"7 दिनों में 50,000 लोगों को नहीं हटाया जा सकता है।" कोर्ट ने कहा कि आप सिर्फ 7 दिनों में खाली करने के लिए कैसे कह सकते हैं? हमें कोई प्रैक्टिकल समाधान ढूंढना होगा|
जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अभय एस ओका की पीठ ने 20 दिसंबर, 2022 को उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा पारित फैसले के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिकाओं के एक बैच में उत्तराखंड राज्य और रेलवे को नोटिस जारी करते हुए यह आदेश पारित किया|अदालत ने मामले को 7 फरवरी, 2023 तक के लिए स्थगित कर दिया, जिसमें राज्य और रेलवे को "व्यावहारिक समाधान" खोजने के लिए कहा।
याचिकाकर्ताओं की ओर से कॉलिन गोंजाल्विस ने सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के आदेश के बारे में बताया और कहा कि ये भी साफ नहीं है कि ये जमीन रेलवे की है| हाईकोर्ट के आदेश में भी कहा गया है कि ये राज्य सरकार की जमीन है| इस फैसले से हजारों लोग प्रभावित होंगे|
सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की ओर से पेश ASG से पूछा कि, मुद्दे के दो पहलू हैं। एक, वे पट्टों का दावा करते हैं। दूसरा, वे कहते हैं कि लोग 1947 के बाद चले गए और जमीनों की नीलामी की गई। लोग इतने सालों तक वहां रहे। उन्हें पुनर्वास दिया जाना चाहिए। साल दिन में इतने लोगों को कैसे हटाया जा सकता हैं?”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, " आप उन लोगों के परिदृश्य से कैसे निपटेंगे जिन्होंने नीलामी में जमीन खरीदी है। आप जमीन का अधिग्रहण कर सकते हैं और उसका उपयोग कर सकते हैं। लोग वहां 50-60 वर्षों से रह रहे हैं, कुछ पुनर्वास योजना होनी चाहिए, भले ही यह रेलवे की जमीन हो। इसमें एक मानवीय पहलू है।"
कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय ने प्रभावित पक्षों को सुने बिना आदेश पारित किया है। उन्होंने कहा, "कोई समाधान निकालें। यह एक मानवीय मुद्दा है।" पीठ ने कहा, "मानवीय मुद्दा कब्जे की लंबी अवधि से उत्पन्न होता है। हो सकता है कि उन सभी को एक ही ब्रश से चित्रित नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि विभिन्न श्रेणियां हों। लेकिन व्यक्तिगत मामलों की जांच करनी होगी। किसी को दस्तावेजों को सत्यापित करना होगा।“
जो भी न्यायालय का आदेश होगा, उसके अनुरूप आगे कार्रवाई करेंगे: धामी
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि,''वो रेलवे की भूमि है और रेल विभाग का हाई कोर्ट और उच्च न्यायालय में मुकदमा चल रहा था। हमने पहले ही कहा है कि जो भी न्यायालय का आदेश होगा हम उसके अनुरूप आगे कार्रवाई करेंगे|
बता दें, अधिकारियों ने रेलवे की जमीन का निरीक्षण किया, जबकि हटाए जा रहे निवासियों ने बेदखली रोकने के लिए कैंडल मार्च निकाला और धरना दिया| नैनीताल के DM धीरज सिंह गर्ब्याल ने कहा था कि,''यहां पर जितने भी लोग हैं वे रेलवे की भूमि पर हैं। इनको हटाया जाना है, इसके लिए हमारी तैयारी पूरी चल रही है। हमने फोर्स की मांग की है। आने वाले कुछ समय में हम उन्हें हटाएंगे। ये उच्च न्यायालय का आदेश है उसका पालन करना होगा|
हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे भूमि के अतिक्रमण पर कुमाऊं रेंज के DIG नीलेश आनंद भरणे ने कहा था कि,''उच्च न्यायालय का आदेश पर तमाम संगठन और लोगों से वार्ता की गई। हमने पूरे एरिया को जोन, सुपर जोन और सेक्टर में बांट दिया है। हम सभी जोन का गंभीरता से आकलन कर रहे हैं| कितने घर किस सेक्टर जोन में आ रहे हैं और किस तरह से उनको हटाया जाएगा इसका भी आकलन किया जा रहा है। पुलिस मुख्यालय से फोर्स की डिमांड भी की गई है|