ईरानी क्लस्टर मिसाइलों का इजरायल पर प्रहार: क्या है सच्चाई, और रूस-चीन पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
मध्य पूर्व के युद्ध में एक ऐसा शब्द फिर से केंद्र में आ गया है, जिसका नाम भर नागरिक इलाकों के लिए डर पैदा करता है—क्लस्टर म्यूनिशन। इजरायल पर जून 2025 में हुए ईरानी मिसाइल हमलों के बाद शुरू में यह दावा सैन्य और सरकारी बयानों तक सीमित था। लेकिन बाद में हथियार-विशेषज्ञों और मानवाधिकार जांचों ने सार्वजनिक तस्वीरों, वीडियो और अविस्फोटित अवशेषों के आधार पर इस निष्कर्ष को काफी मजबूती दी कि कम-से-कम कुछ हमलों में ऐसी वारहेड इस्तेमाल हुईं, जिनमें कई छोटे विस्फोटक सबम्यूनिशन फैले।
इस पूरे विवाद का दूसरा, और कहीं अधिक राजनीतिक, हिस्सा रूस और चीन का है। क्या ईरान की इस क्षमता के पीछे मॉस्को या बीजिंग की सीधी मदद थी? अभी तक सार्वजनिक डोमेन में ऐसा कोई निर्णायक प्रमाण सामने नहीं आया है जो यह साबित कर दे कि इजरायल पर दागी गई खास क्लस्टर-वारहेड मिसाइलें सीधे रूस या चीन ने उपलब्ध कराईं या डिजाइन कीं। लेकिन यह भी सच है कि उपलब्ध रिकॉर्ड, प्रतिबंध दस्तावेज और जांचें दिखाती हैं कि ईरान के मिसाइल और उन्नत हथियार कार्यक्रम के लिए चीनी आपूर्ति-श्रृंखलाओं से रसायन और मशीनरी पहुंचती रही, जबकि रूस के साथ उसका रक्षा सहयोग 2024–2025 में और गहरा हुआ। इसलिए सवाल गंभीर हैं, पर अंतिम निष्कर्ष अभी जल्दबाज़ी होगा।
सबसे पहले बुनियादी बात। “क्लस्टर बम मिसाइल” तकनीकी रूप से कोई आधिकारिक सैन्य श्रेणी नहीं है। सही वर्णन यह है कि एक बैलिस्टिक मिसाइल या रॉकेट की वारहेड हवा में खुलकर कई छोटे विस्फोटक सबम्यूनिशन बिखेरती है। यही सबम्यूनिशन बड़े क्षेत्र में गिरते हैं, कुछ तुरंत फटते हैं और कुछ नहीं फटते। यही कारण है कि ऐसे हथियार हमले के समय भी खतरनाक होते हैं और हमले के बाद भी। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून की बहस इसी दोहरे खतरे पर केंद्रित है।
सीधे जवाब: क्लस्टर बम क्या है?
क्लस्टर म्यूनिशन वह पारंपरिक हथियार है जो कई छोटे विस्फोटक सबम्यूनिशन छोड़ता है। ये सबम्यूनिशन आमतौर पर बिना सटीक मार्गदर्शन वाले छोटे “बॉम्बलेट” होते हैं, जो जमीन पर, उससे ठीक पहले या टकराने के बाद फटने के लिए बनाए जाते हैं। कन्वेंशन की परिभाषा के अनुसार, अगर हथियार कई विस्फोटक सबम्यूनिशन छोड़ता है, तो वह क्लस्टर म्यूनिशन की श्रेणी में आ सकता है।
सबम्यूनिशन इतने विवादित क्यों हैं?
क्योंकि ये बड़े इलाके में फैलते हैं और बड़ी संख्या में फेल भी हो सकते हैं। ICRC के अनुसार, हालिया संघर्षों में इनके फेल होने की विश्वसनीय दरें 10% से 40% तक दर्ज की गई हैं। यानी हमला खत्म होने के बाद भी जमीन पर पड़े अविस्फोटित टुकड़े बच्चों, राहगीरों, स्कूलों, खेतों, बचावकर्मियों और लौटते विस्थापितों के लिए घातक बने रह सकते हैं। यही “वाइड एरिया इफेक्ट” और “डड रेट” इन्हें मानवीय दृष्टि से बेहद विवादास्पद बनाते हैं।
क्या ईरान ने इजरायल पर क्लस्टर-वारहेड इस्तेमाल किया?
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सबसे पुष्ट मामला 19 जून 2025 का है। उस दिन इजरायली सेना और उसके वॉशिंगटन स्थित दूतावास ने कहा कि ईरान ने एक ऐसी मिसाइल दागी, जिसमें क्लस्टर सबम्यूनिशन थे और जो घनी आबादी वाले इलाके में गिरी। बाद में स्वतंत्र विश्लेषण में सार्वजनिक फोटो-वीडियो के आधार पर ऐसे अविस्फोटित सबम्यूनिशन की पहचान की गई, जो इस दावे को मजबूत करते हैं।
जांच में यह भी कहा गया कि लगभग 20 सबम्यूनिशन करीब 8 किलोमीटर के दायरे में गिरे। एक अविस्फोटित सबम्यूनिशन की पहचान तेल अवीव महानगरीय क्षेत्र के गुष दान इलाके से जुड़ी तस्वीरों में की गई। एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया कि एक सबम्यूनिशन अज़ोर में एक घर की ऊपरी मंजिल पर गिरा, जहां पिता और बेटा चेतावनी सायरन के बाद नीचे सुरक्षित कमरे में पहुंच चुके थे। इससे समझ आता है कि ऐसे हथियार का असर केवल “एक धमाके” तक सीमित नहीं रहता; यह बिखराव के कारण कई बिंदुओं पर खतरा पैदा करता है।
अगले दिन, 20 जून को, बीरशेबा में भी ऐसे प्रभाव दर्ज हुए जो सबम्यूनिशन वाले हमले से मेल खाते थे। एक स्कूल और बास्केटबॉल कोर्ट तक प्रभावित हुए, हालांकि उस घटना में मौत या गंभीर चोट की पुष्टि नहीं हुई। 22 जून को रिशोन लेज़ियोन में भी ऐसे गड्ढों और प्रभावों की तस्वीरें सामने आईं जो उसी तरह के सबम्यूनिशन हमले से मेल खाती थीं। इसका मतलब यह है कि मामला केवल एक दिन या एक शहर तक सीमित नहीं दिखा।
यहां एक अहम सावधानी जरूरी है। “तबाही” शब्द सुर्खियों में जोरदार लगता है, लेकिन तथ्यात्मक रिपोर्टिंग में यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्लस्टर-वारहेड के इन विशिष्ट हमलों में बड़ी संख्या में तत्काल मौतों की पुष्टि नहीं हुई। व्यापक ईरानी मिसाइल हमलों में इजरायल में लोगों की मौत हुई, लेकिन 19–22 जून के क्लस्टर-संबंधित घटनाक्रम का सबसे बड़ा सत्यापित खतरा नागरिक इलाकों में बिखरे सबम्यूनिशन और भविष्य की संभावित क्षति था। यही बात इस हथियार को और खतरनाक बनाती है।
किस मिसाइल से यह वारहेड दागी गई होगी?
यही वह जगह है जहां दावे और जांच अलग-अलग स्तर पर खड़े हैं। 2025 के ग्लोबल मॉनिटर ने कहा कि 19 जून 2025 के हमले में इस्तेमाल क्लस्टर म्यूनिशन संभवतः कियाम सीरीज़ मिसाइल या बड़े खोर्रमशहर मिसाइल से आई हो सकती है, हालांकि यह आकलन एक विशेषज्ञ-आधारित संभावना के रूप में रखा गया, अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं। यानी सार्वजनिक सबूत यह तो दिखाते हैं कि सबम्यूनिशन गिरे, लेकिन किस प्लेटफॉर्म से गिरे, इस पर अभी पूर्ण पारदर्शिता नहीं है।
ईरान की मिसाइल क्षमता पर नज़र डालें तो उसके पास मध्यम और लंबी दूरी की कई बैलिस्टिक मिसाइलें हैं जो इजरायल तक पहुंच सकती हैं। हाल की प्रोफाइलिंग में सीजिल, एमाद, ग़द्र, शाहाब-3 और खोर्रमशहर जैसी प्रणालियों का उल्लेख हुआ है। ईरान के मिसाइल ढांचे और भूमिगत “मिसाइल सिटीज़” पर भी लगातार ध्यान गया है। इस कारण यह धारणा मजबूत होती है कि ईरान के पास ऐसा प्लेटफॉर्म विकसित या अनुकूलित करने की तकनीकी क्षमता थी जो क्लस्टर-सबम्यूनिशन वारहेड ले जा सके।
इसके अलावा 2025 के मॉनिटर ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य “मजबूती से संकेत” देते हैं कि ईरान अपनी मिसाइलों और रॉकेटों के लिए क्लस्टर म्यूनिशन का निर्माण कर रहा है। उसी रिपोर्ट ने 2023 में गोरगान के पास एक नाकाम मिसाइल परीक्षण के बाद गिरे अवशेषों और 2025 में इजरायल पर हमले के बीच बाहरी समानताओं का उल्लेख भी किया। दूसरे शब्दों में, यह क्षमता अचानक प्रकट हुई चीज़ नहीं दिखती; इसके पीछे पहले से तकनीकी विकास के संकेत मौजूद थे।
अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?
क्लस्टर म्यूनिशन पर अंतरराष्ट्रीय संधि 1 अगस्त 2010 से लागू है और यह इनके उपयोग, उत्पादन, भंडारण और हस्तांतरण पर रोक लगाती है। मार्च 2026 तक इस कन्वेंशन के 112 स्टेट पार्टी हो चुके हैं। लेकिन ईरान और इजरायल दोनों इसमें शामिल नहीं हैं। फिर भी, मानवीय कानून के सामान्य सिद्धांत—विशेषकर अंधाधुंध हमलों के निषेध—उन पर लागू होते हैं।
इसी वजह से स्वतंत्र जांचकर्ताओं ने ईरानी हमलों को “स्वभावतः अंधाधुंध” हथियार के इस्तेमाल की श्रेणी में देखा। तर्क यह है कि जब एक हथियार कई किलोमीटर के दायरे में सबम्यूनिशन गिराता हो, वह घनी आबादी वाले इलाके में सैन्य लक्ष्य और नागरिक लक्ष्य के बीच विश्वसनीय भेद नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति में हमला केवल सैन्य कार्रवाई नहीं रह जाता; वह संभावित रूप से गैर-कानूनी अंधाधुंध हमला बन सकता है।
रूस-चीन की भूमिका पर सवाल आखिर क्यों उठ रहे हैं?
पहला कारण है ईरान का व्यापक रक्षा-सहयोग नेटवर्क। दूसरी वजह है आपूर्ति श्रृंखला। तीसरा कारण है युद्ध के समय दिखाई पड़ने वाले सामरिक संकेत। लेकिन इन तीनों को मिलाकर भी अभी यह नहीं कहा जा सकता कि इजरायल पर इस्तेमाल विशिष्ट क्लस्टर-वारहेड पर रूस या चीन की “सीधी” मुहर सिद्ध हो गई है। यही इस कहानी का सबसे संवेदनशील और सबसे ज्यादा गलत तरीके से पेश किया जाने वाला हिस्सा है।
चीन के संदर्भ में सबसे ठोस सार्वजनिक सामग्री अमेरिकी प्रतिबंध दस्तावेजों में दिखती है। अप्रैल 2025 में अमेरिकी ट्रेज़री ने कहा कि ईरान और चीन-आधारित संस्थाएं और व्यक्ति IRGC की ओर से बैलिस्टिक मिसाइल प्रोपेलेंट सामग्री की खरीद में शामिल थे। इसमें सोडियम परक्लोरेट और डाइऑक्टिल सेबासेट जैसी सामग्री का उल्लेख था, जो ठोस ईंधन रॉकेट मोटरों में इस्तेमाल हो सकती हैं। जून 2025 में ट्रेज़री ने फिर कहा कि चीन और हांगकांग आधारित कंपनियां ईरान के रक्षा उद्योग के लिए संवेदनशील मशीनरी भेज रही थीं। यह सब ईरान के मिसाइल इकोसिस्टम को सहारा देने वाली सप्लाई चेन की ओर इशारा करता है।
रूस के संदर्भ में तस्वीर अलग है, लेकिन उतनी ही गंभीर। मार्च 2025 की एक जांच में रॉयटर्स ने यात्रा रिकॉर्ड और रोजगार डेटा के आधार पर बताया कि कई वरिष्ठ रूसी मिसाइल विशेषज्ञ 2024 में ईरान गए थे। रॉयटर्स यह तय नहीं कर सका कि वे वहां क्या कर रहे थे, लेकिन एक वरिष्ठ ईरानी रक्षा अधिकारी ने कहा कि रूसी विशेषज्ञों ने ईरान के मिसाइल उत्पादन स्थलों का दौरा किया। यह प्रत्यक्ष तकनीकी-संबंध की संभावना दिखाता है, हालांकि वही रिपोर्ट यह भी साफ कहती है कि वह उनके दौरे के उद्देश्य को निर्णायक रूप से स्थापित नहीं कर सकी।
एक और उलटी दिशा का तथ्य भी महत्वपूर्ण है: फरवरी 2024 में रॉयटर्स ने स्रोतों के हवाले से रिपोर्ट किया कि ईरान ने रूस को सैकड़ों सतह से सतह पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें भेजीं। इसका मतलब यह है कि रूस-ईरान रक्षा संबंध केवल “रूस से ईरान” वाली एकतरफा रेखा नहीं है; यह दोतरफा और अवसरवादी साझेदारी है। इसलिए जब इजरायल पर क्लस्टर-सबम्यूनिशन वारहेड इस्तेमाल होने की बात सामने आई, तो मॉस्को की संभावित तकनीकी भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक था। पर सवाल उठना और सबूत मिल जाना—दोनों एक ही बात नहीं हैं।
मार्च 2026 की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया कि रूस और चीन ने वर्षों तक ईरान की सैन्य क्षमता को मिसाइल, एयर-डिफेंस सिस्टम और तकनीक के जरिए मजबूत किया, लेकिन अब वे प्रत्यक्ष युद्ध में शामिल होने से बच रहे हैं और खुद को मध्यस्थ की तरह पेश कर रहे हैं। यह बिंदु अहम है, क्योंकि इससे यह समझ आता है कि दोनों देश ईरान से रणनीतिक लाभ तो लेते हैं, पर उसके लिए सीधे लड़ने को तैयार नहीं दिखते। इसीलिए आज की स्थिति में सबसे संतुलित निष्कर्ष यह है: अप्रत्यक्ष क्षमता-निर्माण के संकेत मौजूद हैं, प्रत्यक्ष क्लस्टर-वारहेड भूमिका का सार्वजनिक निर्णायक प्रमाण नहीं।
इजरायल और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए इसका मतलब क्या है?
अगर एक बैलिस्टिक मिसाइल वारहेड हवा में खुलकर सबम्यूनिशन गिराती है, तो पारंपरिक मिसाइल रक्षा की चुनौती बदल जाती है। इंटरसेप्शन केवल “मिसाइल मार गिराने” का मामला नहीं रह जाता; सवाल यह भी बन जाता है कि वारहेड किस ऊंचाई पर खुली, कितनी वस्तुएं फैलीं और उनमें से कितनी अविस्फोटित रहीं। ऐसे हमलों में नागरिक सुरक्षा, विस्फोटक अवशेषों की पहचान, स्कूलों और रिहायशी इलाकों की कॉर्डनिंग, और पोस्ट-स्ट्राइक क्लियरेंस सब साथ-साथ महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
इजरायल के लिए यह केवल एक और मिसाइल खतरा नहीं, बल्कि “क्षेत्रीय संतृप्ति” का खतरा है—यानी एक ऐसा हमला जो कम समय में बड़े इलाके में कई छोटे विस्फोटक खतरे फैला दे। ईरान के लिए ऐसी वारहेड मनोवैज्ञानिक, सामरिक और राजनीतिक तीनों स्तरों पर उपयोगी हो सकती है: कम सटीकता वाले प्लेटफॉर्म के बावजूद व्यापक भय, लंबी सफाई और मीडिया प्रभाव। यही कारण है कि क्लस्टर म्यूनिशन को केवल सैन्य तकनीक नहीं, बल्कि नागरिक-सुरक्षा संकट के रूप में देखा जाता है।
सबसे बड़ा निष्कर्ष
इस कहानी का सत्यापित हिस्सा यह है कि जून 2025 में इजरायल पर ईरानी हमलों में क्लस्टर-सबम्यूनिशन वाले वारहेड इस्तेमाल होने के मजबूत सार्वजनिक संकेत मिले, और बाद की स्वतंत्र जांचों ने उन दावों को काफी बल दिया। दूसरा सत्यापित हिस्सा यह है कि ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को सहारा देने वाली चीनी-आधारित खरीद नेटवर्क और रूस-ईरान रक्षा सहयोग के अनेक संकेत सार्वजनिक रिकॉर्ड में मौजूद हैं। लेकिन तीसरा हिस्सा—यानी इजरायल पर इस्तेमाल विशिष्ट क्लस्टर वारहेड के पीछे रूस या चीन की प्रत्यक्ष भूमिका—अब भी सिद्ध नहीं है।
इसलिए जिम्मेदार पत्रकारिता का निष्कर्ष सनसनी नहीं, बल्कि सटीकता है। हां, ईरानी क्लस्टर-वारहेड हमले की कहानी गंभीर है। हां, इससे इजरायल में नागरिक क्षेत्रों पर खतरा बढ़ा। हां, रूस और चीन से जुड़े नेटवर्क, तकनीकी रिश्ते और आपूर्ति श्रृंखलाएं सवालों के घेरे में हैं। लेकिन अभी सार्वजनिक साक्ष्य हमें यही कहने की अनुमति देते हैं कि मामला “मजबूत संदेह और आंशिक प्रमाण” के स्तर पर है, “अंतिम साबित तथ्य” के स्तर पर नहीं। और शायद युद्धकालीन दावों के दौर में यही सबसे महत्वपूर्ण बात है।
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