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उत्तराखंड हाईकोर्ट का ‘मोहम्मद दीपक’ पर सख्त रुख: FIR रद्द नहीं, सोशल मीडिया पर बोलने से रोका

By tvlnews March 20, 2026
उत्तराखंड हाईकोर्ट का ‘मोहम्मद दीपक’ पर सख्त रुख: FIR रद्द नहीं, सोशल मीडिया पर बोलने से रोका

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 20 मार्च 2026 को कोटद्वार के जिम ओनर ‘मोहम्मद दीपक’ के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से इनकार कर दिया और उन्हें मामले पर सोशल मीडिया पर संदेश, वीडियो या सार्वजनिक बयान देने से रोका। अदालत ने कहा कि ऐसी बयानबाजी जांच को प्रभावित कर सकती है; इसलिए “गैग ऑर्डर” का इस मामले में अर्थ एक सीमित, अदालत-निर्देशित सार्वजनिक restraint है, न कि हर विषय पर पूर्ण बोलने की मनाही।

कोटद्वार से जुड़े चर्चित मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने शुक्रवार, 20 मार्च 2026, जिम संचालक दीपक कुमार उर्फ “मोहम्मद दीपक” को राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द नहीं किया और पुलिस जांच जारी रखने की अनुमति दी। यह मामला 26 जनवरी की उस घटना से जुड़ा है जिसमें दीपक एक मुस्लिम दुकानदार के समर्थन में सामने आए थे, जब कुछ दक्षिणपंथी कार्यकर्ता उसकी दुकान के नाम में “बाबा” शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जता रहे थे। बाद में इस टकराव के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए और पूरे मामले ने राज्य से बाहर भी राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी।

अदालत की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी “गैग ऑर्डर” को लेकर रही। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने साफ कहा कि याचिकाकर्ता सोशल मीडिया पर इस मामले से जुड़ा कोई बयान, संदेश या वीडियो प्रसारित न करें। अदालत का तर्क था कि जब जांच चल रही हो, तब इस तरह की सार्वजनिक बयानबाजी जांच को प्रभावित कर सकती है और मामले को “sensationalise” कर सकती है। इसलिए इस केस में “गैग ऑर्डर” का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति जीवन के हर मुद्दे पर बोल ही नहीं सकता; बल्कि इसका व्यावहारिक मतलब यह है कि लंबित जांच वाले इसी मामले पर सार्वजनिक टिप्पणी या सोशल मीडिया सक्रियता सीमित कर दी गई है

यही कानूनी बारीकी इस खबर को अहम बनाती है। भारतीय न्यायिक व्यवस्था में ऐसे restraints आम तौर पर फेयर इन्वेस्टिगेशन और फेयर ट्रायल के तर्क पर टिके होते हैं। हाल के एक सुप्रीम कोर्ट सारांश में भी यह रेखांकित किया गया कि अदालतें मीडिया या सार्वजनिक सामग्री पर रोक तभी उचित ठहरा सकती हैं, जब उससे कार्यवाही की निष्पक्षता पर “real and substantial risk” पैदा होता हो। इसी व्यापक सिद्धांत के भीतर हाईकोर्ट ने यहां सोशल मीडिया restraint को जांच की शुचिता से जोड़ा।

दीपक ने अदालत से न सिर्फ एफआईआर रद्द करने की मांग की थी, बल्कि पुलिस सुरक्षा, कथित पक्षपाती पुलिस कार्रवाई की जांच और दूसरी ओर के लोगों के खिलाफ कार्रवाई जैसी राहतें भी चाही थीं। कोर्ट ने इन अतिरिक्त मांगों पर सख्त रुख अपनाया और कहा कि एक आरोपी के तौर पर वह जांच के दौरान ऐसी प्रार्थनाएं कर रहे हैं जो जांच पर दबाव बनाने जैसी लगती हैं। रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को जांच में सहयोग करना चाहिए और पुलिस प्रक्रिया पर सार्वजनिक अविश्वास पैदा नहीं करना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि भी संवेदनशील है। इस प्रकरण में कुल तीन एफआईआर दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी, जिनमें एक शिकायत दीपक के खिलाफ और अन्य शिकायतें दूसरी ओर के लोगों तथा बाद की घटनाओं से जुड़ी थीं। इसी बीच राहुल गांधी ने भी दीपक से मुलाकात की थी, जिससे मामला और ज्यादा सुर्खियों में आया। अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद कानूनी लड़ाई का फोकस मीडिया बयानबाजी से हटकर सीधे जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर आ जाएगा। फिलहाल सबसे बड़ा संदेश यही है कि अदालत ने एफआईआर को इस चरण पर छूने से इनकार किया है और कहा है कि जांच अपनी प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ेगी।




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