जोड़ने का जश्न है भारत जोड़ो यात्रा
भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक कन्याकुमारी। जहाँ माता सती के रीढ़ की हड्डी गिरी। वो स्थान जिसे त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है। जहाँ कुमारी मंदिर है और शंकराचार्य मंदिर भी। जहाँ माँ पार्वती के कन्या रूप की पूजा होती है। वहीं से स्वामी विवेकानंद का आशीर्वाद लेकर जम्मू कश्मीर तक कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' 12 राज्यों सहित 2 केंद्र शासित प्रदेशों से गुजरेगी। हर रोज़ तकरीबन 25 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली ये पदयात्रा लगभग 150 दिनों की कठिन 'तपस्या' से 3570 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। तपस्या से मेरा संदर्भ है, भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करते हुए एकजुट करने के महायज्ञ से। जिसका जिक्र राहुल गांधी ने अपने वक्तव्य में भी किया था।
भारत में पदयात्राओं का लंबा इतिहास रहा है, इन पदयात्राओं को पूरा करने वाले लोगों ने अपने दौर और इतिहास में 'महामानव' के तौर पर ख्याति प्राप्त की है। गौतम बुद्ध, शंकराचार्य, गुरु नानक से लेकर महात्मा गांधी, विनोबा भावे और आज़ादी के बाद चंद्रशेखर की 'भारत यात्रा'। इन यात्राओं ने भारत के संस्कृति, अध्यात्म, दर्शन, कला, राजनीति और समाज पर अमिट छाप छोड़ा है। जब हम ऐतिहासिक पदयात्राओं की तुलना 21 वीं सदी के 'नायक' की 'भारत जोड़ो यात्रा' से करते हैं तो दोनों के उद्देश्य में बहुत सारी समानताएं दिखती हैं।
जैसे आदि शंकराचार्य की 'दिग्विजय यात्रा' का उद्देश्य सनातन धर्म की स्थापना करना था। सनातन धर्म से विखंडित हुए पंथ, सनातन धर्म को ही चुनौती देने लगे थे।
उन्होंने न केवल दूसरे पंथों के विद्वानों को अपना शिष्य बनाया अपितु सनातन धर्म में ही जो विभिन्न परंपराओं के नाम पर बँटे हुए थे उन्हें भी संगठित किया। भारत की चार दिशाओं में चार मठों की स्थापना से उनका आशय ही था, 'भारतवर्ष का एकीकरण।' लेकिन मुख्य सवाल ये है, जिसको बहुत से बुद्धिजीवियों ने भी पूछा कि कांग्रेस पार्टी को भारत जोड़ो यात्रा की जरूरत क्यों पड़ी? क्या कांग्रेस पार्टी जनाधार वापसी के लिए यात्रा कर रही है? या फिर इस यात्रा के माध्यम से 2024 को साध रही है?
आख़िरकार इस तेज दौड़ती दुनिया में राहुल गांधी को 3500 किलोमीटर की लंबी भारत यात्रा को अपने पग से नापने की जरूरत क्यों पड़ी?
ऐसे ही सवालों से 'भारत यात्रा' पर निकले चंद्रशेखर जी को भी दो चार होना पड़ा था, लेकिन उन्होंने जो ज़वाब दिया वह आज भी प्रासंगिक है।
चंद्रशेखर ने कहा 'मैं ना तो शंकराचार्य बनने चला हूं और ना ही विनोबा भावे। मैं निश्चित तौर पर राजनीतिक हूँ तो इस यात्रा को गैर राजनीतिक नहीं कह सकता। लेकिन मैं इसे पारंपरिक राजनीति से भिन्न रखता हूँ। मैं चाहता हूं कि उन लोगों के लिए एक जगह होनी चाहिए, जो आम जनता के पक्ष में सामाजिक परिवर्तन चाहते हैं।'
आज के वक्त में जो ये सवाल पूछ रहे हैं, इन सारे सवालों के जवाब उनके पास ही हैं लेकिन बस, वो देना नहीं चाहते। इसके भी विभिन्न कारण हैं। वो सच बोलने से डरते हैं या फिर उनमें आत्मचिंतन और दूरदृष्टि की कमी है या देश के हालात को लेकर आत्मावलोकन का अभाव है। इस यात्रा का पहला मकसद उसी डर को खत्म करना है और भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करना है।
मैं भी इस यात्रा को पूरी तरीके से गैर राजनीतिक नहीं कहूँगा, जैसा राहुल जी ने भी कहा कि अगर मैं 5 लोगों के साथ बाहर आइसक्रीम भी खा लूं तो कुछ लोगों को लगता है कि मैं राजनीति कर रहा हूँ।
लेकिन इस पदयात्रा की पवित्रता इससे कहीं ज्यादा है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एक ऐसे समय में भारत यात्रा पर हैं जब देश और जिन प्रदेशों से होकर यह यात्रा गुज़र रही है वहाँ कोई चुनाव नहीं है। इस यात्रा में राहुल ने किसी भी विपक्ष के नेता पर ज़ुबानी हमला या कटाक्ष नहीं किया है। वह तो बस इस यात्रा के माध्यम से आपको झकझोरना चाहते हैं, नींद से जगाना चाहते हैं।
भारत के 'विविधता में एकता' के मूल मंत्र को मजबूत करना चाहते हैं और देशवासियों से वोट नहीं, प्यार-आपसी भाईचारा व बंधुत्व की मांग कर रहे हैं। क्या देश ने पिछले दो-तीन दशक में ऐसा 'जननेता' देखा है? जो बिना चुनाव,बिना अपने हित व बिना पार्टी के लाभ के लिए जनता के बीच मे गया हो। वो भी इसलिए कि जनता की बीच व्याप्त भय, बेरोजगारी, कट्टरता, नफ़रत को खत्म कर राजनीतिक, आर्थिक विकेंद्रीकरण किया जा सके। इसलिए मैं इस पदयात्रा के पवित्रता की बात कर रहा हूँ।
राहुल 300 यात्रियों के साथ 'भारत जोड़ो यात्रा' पर निकले हैं। जिसमे 100 से अधिक नागरिक संगठन व विभिन्न वैचारिक संगठनों के लोग हैं, जो कांग्रेस पार्टी के विचार को आत्मसात नहीं करते फिर भी कांग्रेस ने उनको इस यात्रा में आमंत्रण दिया है। ठीक वैसे ही जैसे, पंडित नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल में दिया था। ये भी अपने आप में अनोखा व प्रशंसनीय है। इस यात्रा की जो फ़ोटोज़-वीडियोज़ सामने आ रही हैं... उसमें एक तरफ पाँव में छाले, पसीने से तरबतर यात्री , आम लोग विशेषकर युवा व महिलाओं में राहुल के प्रति जबरदस्त प्रेम व दीवानगी देखने को मिल रही हैं। तो दूसरी तरफ स्थानीय भारतीयों में गजब का उत्साह व जनसैलाब देखने को मिल रहा है। जो यह दर्शाता है कि आम भारतीय भी संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित बंधुत्व एवं राष्ट्रीय एकता अखंडता के लिए राहुल गांधी के साथ 'भारत जोड़ो यात्रा' का प्रतिनिधित्व करना चाहता है। और अपने एक-एक कदम से भारत जोड़ने के अभियान तथा राष्ट्रीय एकता के भाव को बल देना चाहता है।
दयानन्द मिश्र 'शुभम'
छात्र जनसंचार एवं पत्रकारिता