नई दिल्ली: पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता अश्वनी कुमार ने कहा कि,'' शुक्रवार को इलेक्शन कमीशन ने अपने फैसले में, जो फैसला इंडियन नेशनल कांग्रेस और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट की कंप्लेंट पर लिया गया था, उसमें इलेक्शन कमीशन ने ये फैसला सुनाया था कि क्योंकि जो कंप्लेट हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ की गई थी| कांग्रेस और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने, उसमें तथ्य पाए गए, उसमें सब्सटांस पाए गए। इसलिए वो मंत्री के खिलाफ 48 घंटे का बैन लगाते हैं चुनाव प्रचार पर। आज यकायक हमें ये मालूम हुआ कि इलेक्शन कमीशन ने स्वयं से, बिना कोई कांग्रेस को नोटिस दिए बगैर, अपना फैसला बदल कर जो 48 घंटे का बैन था, मंत्री जी पर, उसको 24 घंटे पर तब्दील कर दिया।
क्या इसलिए तब्दीली हुई क्योंकि कल होम मिनिस्टर साहब के साथ हिमंत बिस्वा सरमा की पब्लिक रैली है या फिर हिमंत बिस्वा सरमा को पहले ही पता लग गया था कि ये बैन का समय कम हो जाएगा, इसलिए आज ट्विटर पर उन्होंने रोड़ शो का इनविटेशन दिया है कि जिस रोड़ शो में वो खुद शामिल होंगे। कहने का मतलब ये है कि देश की जनता आज ये जानना चाहती है कि जिस देश की मूल कद्र प्रजातंत्र और लोकतंत्र के साथ जुडी है. उस प्रजातंत्र और लोकतंत्र को स्वस्थ रखने की जिम्मेदारी जिस इलेक्शन कमीशन पर है, क्या ये संवैधानिक संस्था अपना रोल पूरी तरह से अदा कर रही है कि नहीं?
आज सवाल बुनियादी है कि ये केवल एक मंत्री या एक इलेक्शन रैली या एक असेंबली कांस्टीट्यूंसी का नहीं है, सवाल सैद्धांतिक है। क्या ये सिद्धांत को हम मानकर चल रहे हैं कि प्योरिटी ऑफ इलेक्टोरल प्रोसेस हमारे लोकतंत्र के लिए एक अनिवार्य कंडिशन है और अगर ये बात सही है तो क्या इलेक्शन कमीशन का ये जो ऑर्डर है, जिसका मैंने जिक्र किया, वो इलेक्शन कमीशन की मर्यादा को कायम रखता है या नहीं?
और अगर इलेक्शन कमीशन चूक कर रही है, तो क्यों चूक कर रही है? क्या सरकार के दबाव के तहत चूक कर रही है? क्या कारण है? देश की जनता को ये बात जानने का अधिकार है और कांग्रेस पार्टी, जिसने सदा देश की डेमोक्रेटिक प्रोसेस को बहाल रखने के लिए, मजबूत रखने के लिए, सुदृढ़ रखने के लिए काम किया है|
कांग्रेस पार्टी आज आपके माध्यम से ये सवाल इलेक्शन कमीशन से कर रही है। इसका जवाब उनको देना होगा, नहीं तो आने वाली जो जनरेशन है, जो पीढियां हैं, कहीं उनका लोकतंत्र से और लोकतंत्र की व्यवस्था से विश्वास ना उठ जाए। ये बड़ी चुनौती है। तो आज मुख्य तौर पर हमें ये बात आपसे करनी है और बराए मेहरबानी हमारी ये अपील है कि इस सैद्धातिक बात को एक सैद्धांतिक मुद्दे के तौर पर देश के सामने हम रखना चाहते हैं और इसी रुप में ये सामने आए तो मैं समझता हूं कि देश में लोकतंत्र और प्रजातंत्र की जो बुनियाद है, वो मजबूत होगी।
और आप जानते हैं कि कुछ दिन पहले पंजाब में श्री राहुल गांधी ने ये कहा था कि हम फ्री और फेयर इलेक्शन में बीजेपी को हरा सकते हैं, पर जब मीडिया और संस्थाएं अपना काम पूरी तरह से ना कर रही हों, तो हम अपनी बात लोगों तक कैसे पहुंचाएं। तो जो-जो बात उन्होंने उस वक्त कही थी, मैं भी ये मानता हूं और कांग्रेस पार्टी ये मानती है कि असली बात आज देश में लोकतंत्र, Freedom of media, freedom of the people, freedom of institutions, ये एक हकीकत है कि नहीं?
अगर हमारी, जिसे कहते हैं कि institutions of democracy, जो लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं, अगर वो खोखली हो गई, तो फिर हम इस देश में लोकतंत्र को नहीं बचा पाएंगे। ये बुनियादी बात आज आपके सामने हम रखना चाहते हैं।
एक प्रश्न पर कि इस फैसले को लेकर क्या आप कोई लीगल एक्शन लेंगे?.. अश्वनी कुमार ने कहा कि,'' लीगेलिटी तो हर चीज की बनती है, हर चीज को हम कानूनी ढंग से चुनौती दे सकते हैं, मगर सियासत को हम हर वक्त लीगल तरीके से ही उसको नहीं लड़ाई की जा सकती है। जो राजनीति हो रही है, अब देखिए दो दिन बाद वहाँ चुनाव हैं, इसमें हम दो दिन बाद क्या लीगल चुनौती दें, क्या बात करें।
सवाल तो था कि इलेक्टोरल प्रोसेस की प्योरिटी रखने के लिए जिस आदमी पर कार्यवाही इलेक्शन कमीशन ने की थी, क्या कोई ऐसी बात सामने आई है, जिससे केवल 48 घंटे के बैन को फिर कम कर दिया जाए।
इनफेक्ट हमने 5 प्रार्थनाएं की थी इलेक्शन कमीशन से। हमने इलेक्शन कमीशन से कहा था कि एक तो आप एफआईआर दर्ज करिए, कि जो-जो जैसी स्टेटमेंट दी गई है। एक हमने कहा था कि आप बीजेपी पर सेक्शन 16 (A) के तहत एक्शन लीजिए, डिबारिंग का।
एक हमने कहा था कि इनके चुनाव को कैंसिल करिए। एक हमने कहा था कि सारी रिमेनिंग पीरियड ऑफ कैंपेंनिग के लिए इन पर आप पाबंदी लगाइए। इनमें से कोई भी बात ना मानकर केवल 48 घंटे की पाबंदी लगाई। उस 48 घंटे को भी 24 घंटे में कनवर्ट कर दिया। यानि कौन सा ऐसा पहाड़ टूट जाता अगर 48 घंटे हिमंत बिस्वा सरमा जी कैंपेन ना करते। कम से कम लोगों की आस्था तो बनी रहती।
आज देश की संवैधानिक संस्थाओं में आस्था कायम रखने की लड़ाई चल रही है। जिसकी बात सोनिया गांधी जी, राहुल गांधी जी, कांग्रेस पार्टी बार-बार कर रहे हैं। बात लोकतंत्र की, प्रजातंत्र की, फ्रीडम की, इनक्लूजन की, इसकी बात है। ये लड़ाई केवल सत्ता की लड़ाई नहीं है। सत्ता, हर पॉलिटिकल पार्टी चुनाव लड़ती है, सत्ता में आने के लिए, ताकि सत्ता हासिल करके वो लोगों के प्रति जो उनका एजेंडा है, उसको आगे बढ़ाए। मगर आज देश में पॉलिटिकल लड़ाई बहुत बुनियादी बात की है,लोकतंत्र को कायम रखने की बात है। कांस्टीट्यूशनल इंस्टीट्यूशन, संवैधानिक संस्थाओं की इंटेग्रिटी..