नई दिल्ली: पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने पर कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा,''जितिन प्रसाद जी, क्या आप उन लोगों के साथ खड़े रहकर अपने आपको सहज महसूस कर रहे हैं, जिन्होंने पिछले 7 साल में हर लोकतांत्रिक संस्था का दमन किया है| क्या आप उनके साथ खड़े रहने में फक्र महसूस कर रहे हैं, जो कि देशद्रोह का कानून लगाकर अभिव्यक्ति की आजादी को निरंतर दबाते जा रहे हैं?.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा,''यह लड़ाई सिर्फ सत्ता की लोलुपता की नहीं है, यह अगली बार MP बन जाने की या अकोमोडेट करने की या राज्यसभा में पहुंचने की लड़ाई नहीं है। ये लड़ाई एक विचारधारा, ये लड़ाई सिद्धांतों की है| जिस सरकार ने इस देश को इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है कि आज मध्यम वर्ग हो या गरीब, ग़ुरबत इस देश में बढ़ रही है, अर्थव्यवस्था ठप है, बेरोजगार बढ़ गए हैं, कुप्रबंधन कोरोना का हम सबने देखा है|
अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, लोकतांत्रिक संस्थाओं का दमन हो रहा है। आप कैसे अपने आपको सहज महसूस कर सकते हैं, इन सब लोगों के साथ खड़े रहने में? मैं ये सिर्फ जितिन जी के लिए नहीं बोल रही हूं और कांग्रेस में इनका दमदार रोल था मुझे लगता है कि यह सरकार के डर से ज्यादा सत्ता का सुख का भोग करना है और जितिन जी ने ऐसे वक्त पर जाना उचित समझा जबकि देश एक बहुत बुरे दौर से गुजर रहा है| उसके जो जिम्मेदार लोग हैं, जिनके कारण देश इस दौर से गुजर रहा है, उनके साथ खड़े रहना क्या सहज लगता है जितिन जी को? बस इसी पर मेरा सवाल है, मुझे थोड़ा दुख होता है कि सत्ता की लोलुपता क्या सैद्धांतिक या विचारों की लड़ाई से ज्यादा बड़ी है?...मुझे लगता है कि यह सरकार के डर से ज्यादा सत्ता का सुख का भोग करना है और जितिन जी ने ऐसे वक्त पर जाना उचित समझा जबकि देश एक बहुत बुरे दौर से गुजर रहा है|
दरअसल,''जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने के संदर्भ में पूछे एक प्रश्न पर श्रीमती सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि मैं सबसे पहले क्लेरिफाई कर दूं कि नेता ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य या कोई और जाति का नहीं| होता, नेता – नेता होता है, जो सार्वजनिक जीवन में है, वो सबका रिप्रेजेंटेटिव होता है। तो मैं जातिगत बातों से बचती हूं, क्योंकि मेरा इसमें कोई यकीन नहीं है। खैर, मैं थोड़ा सा इतिहास के बारे में इसलिए बात करना चाहती हूं क्योंकि इतिहास बताना जरुरी होता है।
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा,'''आपको विदित होगा कि जब सोनिया गांधी जी ने कांग्रेस की कमान संभाली थी, तो स्वर्गीय श्री जितेन्द्र प्रसाद ने उनका विरोध किया था और उनके खिलाफ उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव भी लड़ा था, जिसको वो हार गए थे और उसके बावजूद भी सोनिया गांधी जी ने उन्हें उपाध्यक्ष बना दिया था और उसके बाद जितेन्द्र प्रसाद जी के जीते जी ना उनकी कभी उपेक्षा की थी, इंफैक्ट उनको अपने नज़दीकी सलाहकारों में से एक मानती थी।
जितेन्द्र प्रसाद जी की आकस्मिक मौत के बाद उनके बेटे जितिन प्रसाद जी और मैं ये जो भी कह रही हूं, ये इसलिए कह रही हूं कि जितिन प्रसाद जी मेरे अच्छे मित्रों में से एक हैं, उत्तर प्रदेश से हम दोनों आते हैं, तो मुझे आज दुख है जो उन्होंने किया है। और दुख काफी कारणों से है, तो मैं उसके कारण भी बताऊंगी।
तो उनके बेटे जितिन प्रसाद जी राजनीति में आए और वो 30 साल की कम उम्र में शायद शाहजहांपुर से कांग्रेस का टिकट मिला, वो सांसद बन गए। उससे पहले वो यूथ कांग्रेस में जनरल सेक्रेटरी थे, एक बड़ा पद होता है वो और कांग्रेस सरकार के 10 साल के कार्यकाल में उन्होंने तमाम महकमों में मंत्री पद पर रहते हुए काम किया।
सुप्रिया श्रीनेत ने कहा,''कांग्रेस पार्टी ने उनको सम्मान दिया, तरजीह दी, ये 10 सालों के बाद की बात है। तो जब जितिन जी कुछ बातें कहते हैं कि मैं पिछले 10 साल से सोच रहा था, तो आप 10 साल से कब सोच रहे थे? जब आप सरकार में मंत्री थे, जब आपको कांग्रेस की सरकार में विभिन्न पदों पर, चाहे वो इस्पात मंत्रालय हो, चाहे वो पेट्रोलियम हो, चाहे वो एजकेशन हो, आप तमाम महकमों में मंत्री रहे?
सुप्रिया ने कहा,''मैं पूरे सम्मान के साथ जितिन प्रसाद जी से ये जरुर कहूंगी कि आपने जो किया है, वो बहुत दुखी करता है और दुखी इसलिए करता है कि दुर्भाग्य है कि जब देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है, जब देश इस भीषण महामारी से जूझ रहा है और मैं व्यक्तिगत रुप से इससे निराश हूं, क्योंकि इस महामारी के कुप्रबंधन के चलते लोगों की मौतें हुई हैं, जिन जिंदगियों को बचाया जा सकता था और कुप्रबंधन किससे हुआ है, उत्तर प्रदेश की सरकार से हुआ है, योगी सरकार से हुआ है।
कुप्रबंधन नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में या नेतृत्व विहीनता में हुआ है, तो क्या जितिन प्रसाद जी ऐसे लोगों के साथ खड़े रहने को इतने आतुर, इतने तैयार थे? क्या आपने उनका हाथ पकड़ कर, उनका हाथ थाम कर भूल नहीं की जितिन प्रसाद जी? क्या आपको उन लोगों के साथ खड़े रहना आज मंजूर है, जिनके चलते आज लाखों लोगों की जान गई, जिनको बचाया जा सकता था? क्या आप उन लोगों के साथ खड़े रहकर अपने आपको सहज महसूस कर रहे हैं, जिन्होंने पिछले 7 साल में हर लोकतांत्रिक संस्था का दमन किया है? क्या आप उनके साथ खड़े रहने में फन महसूस कर रहे हैं, जो कि देशद्रोह का कानून लगाकर अभिव्यक्ति की आजादी को निरंतर दबाते जा रहे हैं? ये दुर्भाग्य है और ये मैं पूरे सम्मान से और पूरी विनम्रता से कहती हूं कि ये दुर्भाग्य है कि इस लड़ाई को समझने में दिक्कत हो रही है।
सुप्रिया ने कहा,''''ये लड़ाई सिर्फ सत्ता की लोलुपता की नहीं है, ये अगली बार एमपी बन जाने की या अकोमोडेट करने की या राज्यसभा में पहुंचने की लड़ाई नहीं है। ये लड़ाई एक विचारधारा की है। ये लड़ाई सिद्धांतों की है। ये आइडिया ऑफ इंडिया, हमारा आइडिया ऑफ इंडिया बनाम उनका आइडिया ऑफ इंडिया की लड़ाई है और जब आप 360 डिग्री का यू टर्न करके जब कहीं जाते हैं, तो शायद आपके आइडियोलॉजिकल कमिटमेंट में दिक्कत हमेशा से थी और मैं ये फिर से बोलूंगी, वो मेरे अच्छे मित्र हैं, मैं उनसे पूछंगी, कि आपका आइडियोलॉजिकल कमिटमेंट, आपका मो??ल कंपस कहाँ गया? जिस सरकार ने इस देश को इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है कि आज मिडिल क्लास हो, मध्यम वर्ग हो, गरीब हो, उनकी दर्गती इस देश में बढ़ रही है, अर्थव्यवस्था ठप्प है, बेरोजगार बढ़ गए हैं, कुप्रबंधन कोरोना का हम सबने देखा है।
अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, लोकतांत्रिक संस्थाओं का दमन हो रहा है। आप कैसे अपने आपको सहज महसूस कर सकते हैं, इन सब लोगों के साथ खड़े रहने में? और मैं फिर से बोलूंगी, मैं ये सिर्फ जितिन जी के लिए नहीं बोल रही हूं, और तमाम लोगों के लिए बोलती हं कि दुर्भाग्य है कि कांग्रेस ने काफी इन लोगों को और आपने सही कहा, ये चर्चित चेहरे थे, ये युवा चेहरे थे, ये आने वाली कांग्रेस का भविष्य थे और कांग्रेस में इनका दमदार रोल था। इन लोगों को बढ़ावा दिया कांग्रेस पार्टी ने, पद दिया जिसने भी छोड़ा। चाहे वो इनसे पहले कोई गया हो, जिनको मंत्री कांग्रेस सरकार ने बनाया। उनका हाथ थामा, व्यक्तिगत रुप से थामा पिता की मृत्यु के बाद या अब। जिसको कांग्रेस ने इतना कुछ दिया, तो क्या ये सहूलियत की राजनीति नहीं है?
मैं सवाल आप लोगों से पूछना चाहती हूं ये आइडियोलॉजिकल कमिटमेंट की बात है, ये सैद्धांतिक और विचारों की लड़ाई है या सहूलियत की राजनीति है? क्योंकि ये भी सच है कि पिछले 20-30 सालों में तमाम ऐसे राज्य हैं, जहाँ पर हमारी सरकारें नहीं हैं और आज भी वहाँ पर कांग्रेस के कार्यकर्ता, तमाम ऐसे कार्यकर्ता हैं, जो हमारा झंडा लेकर गांधी जी की विचारधारा को फैलाने के लिए, गांधी जी के इस देश की आत्मा को बचाने के लिए जूझ रहे हैं। वो सत्ता की लोलुपता में कहीं नहीं जा रहे हैं। तो ऐसा क्यों है, ये कन्वीनियंस की राजनीति की जा रही है? और कहीं पर मैं फिर से कहूंगी, कहीं पर ये सारी बात आकर टिक जाती है सिद्धांतों पर, विचारों पर और विचारों की भिन्नता पर। आप लाइक माइंडेड पार्टी में नहीं गए हैं, आप एक बिल्कुल अलग पार्टी में, जिसकी बिल्कुल एक अलग सोच है।
ऐसी पार्टी में जाकर आप अपने सिद्धांतों पर, अपनी विचारधारा पर जरुर सवाल उठाते हैं और मुझे दख है कि जिन 10 सालों में आप भारत सरकार के तमाम महकमों में मंत्री थे, आज आप पलट कर कहते हैं कि उन 10 सालों में या उसके कुछ कार्यकाल में मैं सोचता था कि ऐसा नेतृत्व हो। तो या तो आप तब ईमानदार नहीं थे या आप आज झूठ बोल रहे हैं। लेकिन दिक्कत की बात ये है कि सहुलियत की राजनीति की जो आप बात करते हैं, वो इसी को कहा जाता है। विचारहीन, सिद्धांतविहीन राजनीति यही होती है।