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26 अगस्त 2026

मोदी सरकार ने कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई में गंभीर गलतियां और भारी कुप्रबंधन किया: CWC

नई दिल्ली: कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोरोना महामारी की मौजूदा स्थिति को लेकर आज केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधा है| साथ ही टीकाकरण के लिए आयु सीमा को घटाकर 25 साल किए जाने की मांग की है| उ…

मोदी सरकार ने कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई में गंभीर गलतियां और भारी कुप्रबंधन किया: CWC
मोदी सरकार ने कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई में गंभीर गलतियां और भारी कुप्रबंधन किया: CWC | फ़ोटो: TVL News

नई दिल्ली: कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोरोना महामारी की मौजूदा स्थिति को लेकर आज केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधा है| साथ ही टीकाकरण के लिए आयु सीमा को घटाकर 25 साल किए जाने की मांग की है| उन्होंने अस्थमा, मधुमेह और कुछ अन्य बीमारियों से पीड़ित युवाओं को प्राथमिकता के आधार पर टीका लगाए जाने का अनुरोध किया है|



कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में यह भी कहा कि सरकार को कोरोना से निपटने के लिए जरूरी चिकित्सा उपकरणों और दवाओं को जीएसटी से मुक्त करना चाहिए| कोरोना वायरस संक्रमण के प्रसार पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कदम उठाने पर गरीबों को प्रति माह छह हजार रुपये की मदद देनी चाहिए|




कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक में कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि सरकार के पास तैयारी करने के लिए एक साल का वक्त था लेकिन ये दुखद है कि देश आज फिर उसी हालत में है| सोनिया गांधी ने कहा कि,''एक वर्ष की तैयारी के बाद भी हम सुरक्षा करने में नाकाम रहे। परिवार टूट गए,आजीविका तबाह हो गई और जीवनभर की बचत भी स्वास्थ्य सेवा पर कम पड़ गयी|



कांग्रेस कार्य समिति का बयान: भारत में कोविड-19 का पहला मामला 30-01-2020 को सामने आया था। भारत में कोविड का पहला टीका 16-01-2021 को लगाया गया था। इन दो तारीखों के बीच और उसके पश्चात, त्रासदी, अक्षमता और भारी कुप्रबंधन की एक विस्तृत गाथा है। आज जब हम मिल रहे हैं, तो देश में कुल संक्रमितों की संख्या 1,45,26,609 है और कुल मृतकों की संख्या 1,75,673 है। अगर हम मान भी लें कि भारत एक विशाल जनसंख्या वाला देश हैं तो भी आज हम दुनिया के संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित देशों में से एक हैं। 




पहले दिन से ही केंद्र सरकार ने महामारी के नियत्रंण से संबंधित सभी शक्तियां और अधिकार अपने हाथों में ले लिया।  महामारी अधिनियम और आपदा प्रबंधन अधिनियम के अंतर्गत केंद्र सरकार का हर आदेश तथा निर्देश कानून बन गया और राज्य सरकारों के पास राज्य-विशिष्ठ रणनीतियों और प्रशासनिक उपायों को अपनाने तथा लागू करने का कोई अधिकार या स्वतंत्रता नहीं रही। 




विचारहीनता और योजना शून्यता:

संक्षेप में कहा जाए तो संक्रमण से निपटने के लिए केंद्र सरकार द्वारा किए गए प्रारंभिक उपाय सतही थे। प्रधानमंत्री राष्ट्रीय टेलीविजन पर आए और लोगों से थालियां बजाने की अपील की और उसके दो सप्ताह पश्चात वह पुनः टेलीविजन पर आए और लोगों से दीप प्रज्वलित करने को कहा। चिकित्सा विशेषज्ञ इन वाकयों की आलोचना करने से बचते नजर आए, वहीं जानकार लोगों ने सरकार को आगाह किया कि उसे महामारी का सामना करने के लिए वैज्ञानिक उपाय करने चाहिए। क्योंकि उस समय कोई टीका या उपचार उपलब्ध नहीं था, ऐसी परिस्थितियों में रोकथाम ही मात्र विकल्प था। उसके लिए टेस्टिंग, ट्रैकिंग, ट्रेसिंग और ट्रीटमेंट की आवश्यकता थी। लेकिन इस दिशा में भी केंद्र सरकार का प्रयास अपर्याप्त रहा। हताश होकर सरकार को लॉकडाउन के लिए तैयार होना पड़ा, जिसे विश्व के कुछ अन्य देशों में मिश्रित परिणाम के साथ अपनाया गया था। 




भारत में यह लॉकढाउन बिना कोई पूर्व सूचना के लागू कर दिया गया, राज्यों के साथ भी यही हुआ, केन्द्र सरकार ने बिना तैयारी के लॉकडाउन लागू कर दिया। इसका परिणाम हुआ व्यापक अफरातफरी और सभी आर्थिक गतिविधियों की बंदी। मजबूल लाखों लोग अपने राज्यों को वापस जाने के लिए पैदल निकल पड़े - कुछ आकलन ऐसे कामगारों की संख्या 3 करोड़ तक बताते हैं, जो बिना पैसे, बिना भोजन, बिना दवाइयों और बिना किसी मदद के सैकड़ों किलोमीटर तक पैदल चले। एक अनुमान के अनुसार इनमें से 198 लोगों ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। 





वर्ष 2020 को परिभाषित करने वाली छवि ऐसे प्रवासी श्रमिकों की है, जिन्हें सरकार ने अपने हाल पर छोड़ दिया था, जो राजमार्गों और रेलवे लाइनों के साथ पैदल चलते हुए भूखे-प्यासे अपने घर लौट रहे थे। यह देश के लिए शर्मनाक था। इस बीच तीसरी तालाबंदी की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को आदेश और निर्देश जारी करने की अपनी शक्ति बरकरार रखते हुए कोरोना से निपटने का सारा उत्तरदायित्व राज्य सरकारों पर ही डाल दिया।




इससे भी बदतर बात ये हुई कि केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को देश के सबसे गंभीर चिकित्सा आपातकाल से लड़ने के लिए पर्याप्त राशि मुहैया नहीं करवाई। ऐसी परिस्थितियों में धन की कमी की समस्या से जूझ रही राज्य सरकारों ने महामारी से लड़ने के लिए डॉक्टरों, नसों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, परीक्षण किट, अस्पताल के बिस्तर, बेंटिलेटर, ऑक्सीजन सिलेंडर आदिको जुटाने का यथासंभव प्रयास किया। राज्य सरकारों द्वारा किए गए इन्हीं प्रयासों के लिए उन्हें साधुवाद, जिसमें केंद्र सरकार का कोई योगदान नहीं - महामारी का प्रकोप धीरे-धीरे कम हो गया तथा लोगों ने राहत की सांस ली। 




फिर भी विशेषज्ञों ने देश को चेतावनी दी कि इस संक्रमण की दूसरी लहर संभावित है और और शायद आसन है। उन्होंने अनेक यूरोपीय और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का उदाहरण भी दिया। सौभाग्यवश, भारत में दो टीके विकसित कर लिए गए थे और कुछ विश्व के अन्य देशों में भी उपलब्ध थे। यहीं पर केंद्र सरकार बुरी तरह विफल रही और महामारी की दूसरी लहर के कारण होने वाले सर्वनाश का मार्ग प्रशस्त हो गया। 




निम्नलिखित कारणों से हम केन्द्र सरकार पर महामारी के खिलाफ लड़ाई में विशाल कुप्रबंधन का आरोप लगाते हैं: 

केन्द्र सरकार इस संबंध में पर्याप्त जन जागरुकता पैदा करने में असफल रही कि महामारी का घटता हुआ प्रकोप महामारी की दूसरी लहर का सूचक हो सकता है, जो कि पहली लहर की तुलना में अधिक विनाशकारी हो सकता है। 

पर्याप्त धन और अन्य रियायतें प्रदान करके भारत में दो स्वीकृत टीकों के उत्पादन और आपूर्ति में तेजी से वृद्धि करने में विफलता। 

● भारत में अन्य फार्मा विनिर्माण सुविधाओं में दो स्वीकृत टीकों के अनिवार्य लाइसेंसिंग और उत्पादन का विकल्प अपनाने में विफलता। 

● पहले चरण में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और फ्रंट लाइन श्रमिकों के टीकाकरण के बाद सार्वभौमिक टीकाकरण लागू करने में विफलता।

टीकाकरण कार्यक्रम पर पूर्व पंजीकरण और नौकरशाही नियंत्रण से छुटकारा दिलाने में विफलता। 

टीकाकरण का क्रियान्वयन राज्य सरकारों और सरकारी तथा निजी अस्पतालों को सौंपने में विफलता। 




● टीके की डोज की बर्बादी को रोकने या कम करने में विफलता, जो आज 23 लाख से भी अधिक डोज तक पहुंच चुकी
संक्रमित व्यक्तियों और मके संपकों के टैस्टिंग, ट्रैकिंग और ट्रेसिंग के परिमाण और गति को बनाए रखने में विफलता। 

● आत्मनिर्भरता की अव्यावहारिक जोश के कारण अन्य ऐसे टीकों के आपातकालीन उपयोग की मंजूरी देने में विफलता, जिन्हें यू.एस., यू.के.. यूरोपीय संघ और जापान में मंजूरी मिल गई थी।




टीकों की आपूर्ति बढ़ाने के लिए अन्य देशों में निर्मित अन्य सुमोदित टीकों के आयात की अनुमति देने में विफलता। 

विभिन्न राज्यों को वैक्सीन खुराक की आवश्कता अनुसार उचित और न्यायसंगत आवंटन दिलवाने में विफलता। आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा शासित कई राज्यों को उनकी आवश्यकता के बावजूद उनके उचित हिस्से से कम वैक्सीन की मात्रा मिली।




अन्य देशों को वैक्सीन की बड़ी मात्रा के निर्यात पर अंकुश लगाने में विफलता। जबकि छोटे और विकासशील देशों को ही कुछ मात्रा में टीके दिए जाने चाहिए थे, लेकिन अमीर देशों को निर्यात करने का उत्साह अनुचित था। 

अपारदशीं पीएम-केयर फंड में सैकड़ों करोड़ रुपये जमा होने के बावजूद राज्य सरकारों को पर्याप्त धन मुहैया कराने में असफलता, जो दो मोचों पर युद्ध लड़ रहे थे- एक महामारी के खिलाफ और दूसरा आर्थिक मंदी के खिलाफ। 

बयानबाजी से बचने में विफलता - (प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि महाभारत के युद्ध की तुलना में, जो 18 दिनों में जीता गया था, हम कोविंड के खिलाफ युद्ध 21 दिनों में जीतेंगे) और आत्मस्तुतिगान (मंत्रियों के द्वारा दावा किया गया कि सारा विश्व प्रधानमंत्री के महामारी से निपटने के तरीकों की प्रशंसा कर रहा है।) 



राष्ट्रीय अपमान बहुत दुःख के साथ कहना पड़ता है कि देश के समक्ष सबसे गंभीर आपदा से निपटने में एनडीए सरकार की विचारहीनता और बिना तैयारी की वजह से देश बहुत भारी कीमत चुका रहा है, जिसकी वजह से लाखों परिवार प्रभावित हुए हैं और 1,75,673 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। यह शर्म की बात है कि दुनिया के सबसे बड़े वैक्सीन निर्माण क्षमता वाले देश को ही आज विश्व में सबसे अधिक कोरोना प्रभावित देशों में से एक होने का अपमान झेलना पड़ रहा है। अंत में, लोगों को समझाना होगा कि जब तक तत्काल सुधारात्मक उपाय नहीं किए जायेंगे, राष्ट्र को एक अभूतपूर्व विनाश का सामना करते रहना पड़ेगा। आशा करते हैं कि सरकार विवेक और सद्बुद्धि से काम लेगी।





छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि,'' आज माननीय कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी जी की अध्यक्षता में आयोजित कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की बैठक में शामिल हुआ। इस दौरान कोरोना संकट पर व्यापक चर्चा हुई, साथ ही मैंने छत्तीसगढ़ की स्थितियों की जानकारी साझा की।




मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि,''इस महत्वपूर्ण बैठक में सोनिया गांधी जी ने कहा कि टीकाकरण के लिए आयु सीमा पर केंद्र सरकार पुनर्विचार करे। 25 वर्ष की आयु सीमा वालों का टीकाकरण किया जाए। अस्थमा, एनजाइना, मधुमेह, किडनी और यकृत जैसी बीमारी वालों का भी टीकाकरण हो।कोविड-19 की दवाईयों और उपकरण को जीएसटी से मुक्त किया जाना चाहिए।  अभी 12 प्रतिशत तक जीएसटी लिया जा रहा है, जो अमानवीय है। साथ ही उन्होंने दैनिक मजदूरों को केंद्र द्वारा 6 हजार मासिक सहायता दिये जाने की भी बात कही।






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यह रिपोर्ट 17 अप्रैल 2021 को TVL News पर प्रकाशित हुई और 25 अगस्त 2026 को अपडेट की गई। नई जानकारी मिलने पर खबर को अपडेट किया जाता है।

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