मुंंबई: शिवसेना ने कहा कि,''प. बंगाल में असल में क्या चल रहा है? और जो चल रहा है, उसके पीछे अदृश्य हाथ किसका है, इसका खुलासा होना जरूरी है। प. बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की हार होने के बाद से हिंसा की खबरें प्रसारित हो रही हैं। इस हिंसाचार में तृणमूल कांग्रेस के लोगों द्वारा भाजपा कार्यकर्ताओं को जगह-जगह पीटे जाने की बात कही जा रही है। वो दुष्प्रचार है। बंगाल के हिंसाचार में अभी तक 17 लोगों की मौत हुई है, उसमें 9 लोग भाजपा से जुड़े हैं। शेष तृणमूल के कार्यकर्ता हैं। मतलब हमला दोनों तरफ से शुरू है, लेकिन भाजपा का प्रचारतंत्र जोरों पर है इतना ही। कई लोगों के सिर फूटे, घर-बार जला दिए गए, ऐसा भाजपा की ओर से प्रचार किया जा रहा है।
शिवसेना ने अपने मुखपत्र ‘सामना' में कहा,''बंगाल के हिंसाचार से चिंताग्रस्त हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहां राज्यपाल जगदीश धनगड को फोन कर जानकारी ली। भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारी सीधे हाईकोर्ट पहुंचे और बंगाल के हिंसाचार के लिए ममता बनर्जी जिम्मेदार हैं इसलिए वहां राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की। इस प्रकार बेईमानी का खेल बंगाल में शुरू हो गया है।
तृणमूल कांग्रेस के हिंसाचार के विरोध में भाजपा ने मंगलवार को देशभर में धरना-आंदोलन किया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. नड्डा हड़बड़ी में कोलकाता पहुंचे और उन्होंने हिंसाचार का ठीकरा ममता पर फोड़ दिया। डॉ. नड्डा संयमी नेता हैं। उनका स्वभाव उपद्रवी नहीं, लेकिन बंगाल की हार हजम नहीं हो रही। इसका दर्द उनके मन में होगा तो यह मानवीय स्वभाव है।
डॉ. नड्डा को बंगाल के हिंसाचार पर मानवाधिकार की याद आ गई। वे कहते हैं कि बंगाल में राज्य द्वारा प्रायोजित हिंसाचार जारी रहने के बीच कई राजनीतिक पार्टियां शांत बैठी हैं। साथ ही देश के मानवाधिकार के ‘चैंपियंस’ इस हिंसाचार के खिलाफ बोलने को तैयार नहीं हैं। डॉ. नड्डा ने मानवाधिकार की बात करके चुनाव प्रचार के गड़े मुर्दे उखाड़कर अच्छा किया। आज जो हिंसाचार को लेकर छाती पीटकर कहा जा रहा है, उसका मूल भाजपा नेताओं के चुनाव में दिए गए भड़काऊ बयान में है। बंगाल में भाजपा नेताओं ने प्रचार के दौरान मर्यादा लांघ दी थी। हिंसा का खुला समर्थन ये लोग कर रहे थे। हिंसा करो, खून-खराबा करो लेकिन चुनाव जीतो, ऐसा उनके पार्टी कार्यकताओं को मानों आदेश ही था।
भाजपा बंगाल के प्रांत अध्यक्ष दिलीप घोष ने प्रचार सभा से सार्वजनिक रूप से क्या कहा था? उन्होंने कहा था, ‘हम ही जीतेंगे, हम जीतने पर तृणमूल कार्यकर्ताओं को सड़कों पर कुत्तों की तरह गोली मारेंगे!’ संसद के सदस्य व भाजपा के राज्य का नेतृत्व करनेवाले दिलीप घोष का यह भड़काऊ बयान। यही दिलीप घोष एक जगह सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि ‘डायरी में लिख कर रखो, तृणमूल कार्यकर्ताओं को हम छोड़ेंगे नहीं।’
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भगवा वस्त्र धारण करते हैं। वे एक तपस्वी या संन्यासी जो भी हैं, इसे बगल में रखें, लेकिन वे एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं। ये मुख्यमंत्री दूसरे राज्य में जाकर धमकी देते हैं। बंगाल में जाकर योगी महाराज धमकाते हैं, ‘२ मई के बाद तृणमूल के कार्यकर्ता हमारे पास जान की भीख मांगेंगे।’ इस धमकी का अर्थ क्या समझें? मतलब भाजपा की जीत हुई होती तो तृणमूल कार्यकर्ताओं के खून बहाए होते और जान की भीख मांगनेवाले तृणमूल कार्यकर्ताओं को देखकर इन नेताओं को दानवी सुख मिला होता। राजनीति का ये रक्तरंजित रूप है। यह लोकतंत्र वगैरह नहीं ठोकतंत्र है।
प. बंगाल के हिंसाचार का समर्थन कोई भी नहीं करेगा। चुनाव समाप्त होने पर बैर समाप्त हो जाना चाहिए, लेकिन ममता बनर्जी ने बुधवार की दोपहर को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस क्षण तक राज्य में चुनाव आयोग मतलब केंद्र का ही राज था और न्याय-व्यवस्था केंद्रीय सुरक्षा बल के हाथों में थी। ममता बनर्जी कोई भी हरकत न कर पाएं इसलिए राज्य के महासंचालक से लेकर कई अधिकारियों को चुनाव आयोग ने हटा दिया था। फिर राज्य के हिंसाचार की जिम्मेदारी सही में किसकी? तृणमूल कांग्रेस की भूमिका अलग है।
भाजपावाले रंग रहे हैं, उतना हिंसाचार का दृश्य भयानक नहीं है। जहां भाजपा के लोग जीत कर आए हैं, उन्हीं इलाकों में हिंसा की घटनाएं घट रही हैं, ऐसा तृणमूल का कहना है। यह सच है तो ममता बनर्जी को अपशगुन करने के लिए ही बंगाल में हिंसा कराई जा रही है क्या? २०19 में बंगाल में भाजपा के 18 सांसद जीतकर आए हैं। उसके बाद जो उन्मादी राजनीति शुरू हुई, उससे कई जगह तृणमूल के कार्यकर्ताओं पर हमले किए गए।
प. बंगाल की यह परंपरा है, ऐसा कहें तो फिर रविंद्र संगीत, रविंद्रनाथ टैगोर, बंगाल का साहित्य-संस्कृति, सामाजिक सुधार का प्रवाह, स्वतंत्रता की लड़ाई की क्रांति की मशाल क्या ये सब व्यर्थ हो गए? प. बंगाल का असली संस्कार यही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा हारने पर वहां दंगे हुए। अब प. बंगाल में भी वही हुआ। देश में कोरोना के चलते पहले से ही शवों का अंबार लगा हुआ है। दंगे की राजनीति करके देश को बदनाम क्यों करते हो? प. बंगाल में शांति, न्याय-व्यवस्था बनाए रखना यह ममता बनर्जी के जितना ही केंद्र के सत्ताधारियों का भी कर्तव्य है, इसकी याद किसी को है क्या?