मुख्य हाइलाइट्स (Highlights):
तीन साल में एक भी छात्र ने हिंदी में परीक्षा नहीं दी।
किताबों पर 10 करोड़ रुपए खर्च, लेकिन छात्रों ने चुनी अंग्रेजी।
अमित शाह ने 2022 में की थी हिंदी MBBS कोर्स की शुरुआत।
छात्रों को हिंदी पढ़ाई में रुचि नहीं, भविष्य के लिए अंग्रेजी को मानते बेहतर।
भोपाल — मध्य प्रदेश में हिंदी में एमबीबीएस की पढ़ाई का सपना हकीकत में बदलने से पहले ही बिखर गया। राज्य सरकार ने जोर-शोर से वर्ष 2022 में इस परियोजना की शुरुआत की थी, जिसमें मेडिकल की पढ़ाई हिंदी माध्यम से करवाने का निर्णय लिया गया था। इसके तहत 10 करोड़ रुपये खर्च कर हिंदी में मेडिकल की किताबें प्रकाशित की गईं।
परंतु तीन साल बीतने के बावजूद एक भी छात्र ने परीक्षा हिंदी में नहीं दी। छात्रों का मानना है कि उनके करियर और भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए अंग्रेजी भाषा ही ज्यादा व्यावहारिक है।
पढ़ाई में बदलाव सिर्फ नाममात्र का:
सरकारी दावों के बावजूद, मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाने के तरीके में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया। टीचर्स कक्षा में कभी-कभार हिंदी में संवाद जरूर करते हैं, पर सभी स्लाइड्स और पढ़ाई सामग्री अंग्रेजी में ही रहती है। यही कारण है कि छात्र भी स्वयं को अंग्रेजी में ही ढालना बेहतर समझते हैं।
छात्रों की राय:
एक छात्र ने बताया,
"मैंने 12वीं और नीट की परीक्षा हिंदी में दी थी, लेकिन मेडिकल में आने के बाद समझ में आया कि हिंदी की किताबें भी बस अनुवाद मात्र हैं। अंग्रेजी के शब्दों को ही हिंदी लिपि में लिखा गया था। इससे पढ़ाई मुश्किल हो गई, इसलिए मैंने मूल अंग्रेजी किताबों को ही पढ़ना शुरू किया। परीक्षा भी अंग्रेजी में दी।"
सरकार का दावा फेल:
2022 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस योजना का शुभारंभ करते हुए कहा था कि यह कदम उन विद्यार्थियों को आगे लाएगा जो हिंदी माध्यम से पढ़े हैं और मेडिकल की दुनिया में दाखिल होना चाहते हैं। लेकिन अब तक के आंकड़े दिखाते हैं कि यह योजना विफल रही है।
इनाम और छूट के बाद भी नहीं मिला रिस्पॉन्स:
हिंदी में परीक्षा देने वाले छात्रों के लिए परीक्षा शुल्क में छूट और इनाम देने की घोषणा भी की गई थी। बावजूद इसके, एक भी छात्र ने परीक्षा में हिंदी भाषा में उत्तर नहीं लिखा। यह इस बात का संकेत है कि छात्रों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा को देखते हुए अंग्रेजी ही ज्यादा लाभकारी लगती है।
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