19 वर्षीय जबलपुर छात्र अथर्व चतुर्वेदी ने बिना वकील शीर्ष अदालत में खुद दलील रखकर राहत पाई।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत असाधारण शक्ति का उपयोग कर EWS अभ्यर्थियों के “प्रोविजनल” MBBS प्रवेश का निर्देश दिया।
आदेश के मुताबिक 2025-26 सत्र के लिए प्रवेश/आवंटन और फीस-भुगतान जैसी शर्तें लागू रह सकती हैं; राज्य को समय-सीमा में कॉलेज आवंटन करने को कहा गया।
मामला EWS आरक्षण के नीतिगत/प्रक्रियागत “गैप” से जुड़ा है—जहां योग्य NEET उम्मीदवार प्रवेश से वंचित रह गया।
न उम्र बड़ी, न वकालत की डिग्री… फिर भी 19 साल के अथर्व ने शीर्ष अदालत में खुद रखा पक्ष, मिला MBBS एडमिशन का रास्ता
एक फरवरी की दोपहर, जब अदालत की कार्यवाही लगभग समाप्त हो रही थी, तभी दर्शक दीर्घा/पक्षकारों की ओर से एक युवा आवाज़ उठी—“बस 10 मिनट।” यह आवाज़ किसी वरिष्ठ वकील की नहीं थी। यह 19 वर्षीय अथर्व चतुर्वेदी की थी—एक NEET-योग्य छात्र, जो डॉक्टर बनना चाहता था और अपनी बात खुद रखना चाहता था। कुछ ही देर बाद, अदालत ने उसके मामले में असाधारण अधिकार का इस्तेमाल करते हुए ऐसा निर्देश दिया, जिसने न केवल उसके लिए, बल्कि EWS श्रेणी के कई अभ्यर्थियों के लिए उम्मीद की नई खिड़की खोल दी।
फैसले का “क्विक स्नैपशॉट” (Featured Snippet-Friendly)
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने वाली शक्ति का प्रयोग किया।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया गया कि NEET-योग्य EWS उम्मीदवारों को MBBS में प्रोविजनल प्रवेश देने की प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए।
रिपोर्टों के मुताबिक, निर्देश 2025-26 सत्र के संदर्भ में और फीस/प्रवेश-शर्तों के अधीन बताया गया है; साथ ही समय-सीमा में कॉलेज आवंटन पर भी जोर है।
मामला क्या था—NEET पास, फिर भी सीट नहीं
अथर्व चतुर्वेदी जबलपुर के रहने वाले बताए गए हैं। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने NEET दो बार क्वालिफाई किया और करीब 530 अंक हासिल किए। इसके बावजूद, उन्हें निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS कोटे के तहत सीट नहीं मिल पाई, क्योंकि राज्य-स्तर पर आरक्षण/सीट-आवंटन नीति और उसके क्रियान्वयन को लेकर कथित असंगति/देरी सामने आई।
यहां विवाद का केंद्र यही था कि योग्यता होने के बावजूद नीतिगत/प्रक्रियागत कमी की वजह से एक छात्र का मेडिकल करियर अटक गया। अदालत के समक्ष मूल सवाल यह बना कि क्या प्रशासनिक चूक/नीति-शून्य के कारण किसी योग्य उम्मीदवार को अवसर से वंचित रहने दिया जा सकता है।
“वकील नहीं कर सकता था”—तो याचिका भी खुद, बहस भी खुद
अथर्व के परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर जो विवरण सामने आए, उनके मुताबिक वे शीर्ष अदालत में नियमित प्रैक्टिस करने वाले वकीलों को नियुक्त करने की स्थिति में नहीं थे। ऐसे में अथर्व ने खुद ही याचिका का मसौदा तैयार किया, दस्तावेज़ जुटाए, और प्रक्रिया समझकर मामला आगे बढ़ाया।
रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट से Special Leave Petition (SLP) का फॉर्मेट देखा, पुराने फैसलों/कानूनी प्रावधानों का अध्ययन किया, रजिस्ट्री की आपत्तियां दूर कीं और 6 जनवरी 2026 को ऑनलाइन फाइलिंग की।
उनके पिता वकील बताए गए हैं, लेकिन रिपोर्टों के अनुसार शीर्ष अदालत में नियमित प्रैक्टिस नहीं थी। कोविड काल में वर्चुअल कोर्ट की कार्यवाही ने उन्हें प्रक्रिया “देखकर सीखने” का मौका दिया—स्कैनिंग, अपलोडिंग, ड्राफ्टिंग और सीमित संसाधनों में केस-मैनेजमेंट जैसे काम उन्होंने अपने स्तर पर संभाले।
अदालत ने कौन-सी बेंच में सुना, और क्यों यह “असाधारण” माना गया
मामले की सुनवाई जिन न्यायाधीशों की पीठ में हुई, उसमें शीर्ष न्यायाधीश और दो अन्य न्यायाधीश शामिल बताए गए हैं।
शीर्ष अदालत की आधिकारिक वेबसाइट पर भी वर्तमान शीर्ष न्यायाधीश के रूप में वही नाम दर्ज है।
फैसले की “असाधारणता” का कारण सिर्फ यह नहीं था कि एक छात्र ने खुद दलील रखी, बल्कि यह भी कि अदालत ने अनुच्छेद 142 के तहत हस्तक्षेप करके यह संकेत दिया कि नीतिगत देरी/गैप किसी योग्य उम्मीदवार के अधिकारों को कुचलने का आधार नहीं बन सकता।
अनुच्छेद 142 क्या है—और अदालत इसे कब इस्तेमाल करती है
अनुच्छेद 142 संविधान में शीर्ष अदालत को यह अधिकार देता है कि वह किसी मामले में “पूर्ण न्याय” करने के लिए आवश्यक आदेश पारित कर सके। यही वजह है कि इसे अक्सर “एक्स्ट्राऑर्डिनरी पावर” कहा जाता है—यानी सामान्य नियमों के बीच भी, न्याय के हित में सीमित/विशेष हस्तक्षेप।
इस प्रकरण में अदालत ने इसी शक्ति का सहारा लेकर प्रोविजनल एडमिशन का रास्ता खोला—ताकि एक छात्र का भविष्य नीतिगत अनिश्चितता में “लटका” न रहे।
EWS आरक्षण का संवैधानिक आधार—और मेडिकल एडमिशन का नियामक फ्रेम
EWS आरक्षण का संवैधानिक आधार 103वें संविधान संशोधन के बाद मजबूत हुआ और इसकी वैधता पर शीर्ष अदालत के निर्णय भी उपलब्ध हैं।
वहीं मेडिकल एडमिशन व्यवस्था में NEET और उसके वैधानिक ढांचे का उल्लेख राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 में मिलता है, जिसमें देशभर में UG मेडिकल प्रवेश के लिए एक समान परीक्षा/पद्धति की बात कही गई है।
यहीं से यह बहस भी निकलती है कि जब परीक्षा-योग्यता एक समान है, तो आरक्षण/नीति-क्रियान्वयन में अंतर के कारण किसी योग्य उम्मीदवार को मौके से बाहर रखना कितना न्यायसंगत है। (यह निष्कर्ष नहीं, बल्कि उसी बहस का संदर्भ है जो इस मामले के केंद्र में दिखाई देता है।)
आदेश का असर—सिर्फ “एक सीट” नहीं, एक सिस्टम-प्रेशर
अथर्व को राहत मिलना एक व्यक्तिगत जीत है, लेकिन इसका असर इससे बड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक निर्देश केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं दिखता—बल्कि NEET-योग्य EWS उम्मीदवारों के लिए “प्रोविजनल” व्यवस्था की बात कही गई है।
हालांकि “प्रोविजनल” शब्द अपने साथ शर्तें भी लाता है—जैसे फीस भुगतान, काउंसलिंग/सीट-मैट्रिक्स और राज्य-नीति का औपचारिक रूप से लागू होना। यानी रास्ता खुला है, पर अगले कदमों में प्रशासनिक स्पष्टता सबसे अहम रहेगी।
अब आगे क्या—किन तीन चीज़ों पर सबकी नजर
राज्य-स्तर पर नीति/नोटिफिकेशन: निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण/फीस-ढांचे की स्पष्टता।
काउंसलिंग और सीट-अलॉटमेंट: समय-सीमा में कॉलेज आवंटन और सीट उपलब्धता की व्यवहारिकता।
नियामक अनुपालन: NMC/संबंधित प्राधिकरण यह सुनिश्चित करें कि आदेश का अनुपालन कागज़ पर नहीं, जमीन पर हो।
“सीख” क्या है—और क्या नहीं
यह कहानी प्रेरक जरूर है, लेकिन इसे “हर किसी के लिए बिना वकील” वाला फॉर्मूला समझना जोखिम भरा होगा। अदालतों की प्रक्रिया जटिल होती है, और हर मामला तथ्य/कानून के अलग संयोजन पर टिकता है। फिर भी, यह घटना एक बात साफ करती है—जब कोई छात्र तथ्यों, नियमों और अधिकारों को समझकर अपनी बात रखता है, तो सिस्टम के भीतर भी सुनवाई संभव है।
जबलपुर के 19 वर्षीय NEET-योग्य छात्र अथर्व चतुर्वेदी ने बिना वकील सुप्रीम कोर्ट में खुद दलील रखी। अदालत ने अनुच्छेद 142 के तहत EWS उम्मीदवारों के लिए 2025-26 सत्र में MBBS प्रोविजनल एडमिशन का निर्देश दिया।
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