बस्ती। सरकार ने परिषदीय विद्यालयों में निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था तो कर दी, लेकिन निजी विद्यालयों की मनमानी पर लगाम लगाने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है। जनपद में शिक्षा का बाजारीकरण अपने चरम पर पहुंच चुका है, जहां निजी स्कूलों की प्राइमरी स्तर की फीस 300 रुपये से लेकर 5000 रुपये प्रति माह तक पहुंच गई है।
इसके अलावा, जूता, मोजा, किताब-कॉपी, ड्रेस सहित अन्य मदों में भी जबरन वसूली की जा रही है, जिससे अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। शिक्षा के नाम पर इस खुली लूट के बावजूद शासन-प्रशासन आंख मूंदे बैठा है। अभिभावक मजबूरी में निजी स्कूलों की शर्तें मानने को विवश हैं, लेकिन उनकी सुनवाई करने वाला कोई नहीं है।
शिक्षा के नाम पर खुली लूटनिजी विद्यालयों द्वारा की जा रही मनमानी प्रशासन की जानकारी में होते हुए भी इसे रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। शिक्षा के नाम पर इस तरह की मनमानी भविष्य के भारत की नींव को कमजोर करने का काम कर रही है। यदि शिक्षा को व्यापार बना दिया गया, तो आम लोगों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करना कठिन हो जाएगा।
प्रशासन की निष्क्रियता बनी बड़ी समस्याहैरानी की बात यह है कि प्रशासनिक अधिकारी इस ओर कोई ध्यान देने को तैयार नहीं हैं। जिम्मेदार अधिकारी इस विषय पर चर्चा करना तक उचित नहीं समझते, जिससे निजी विद्यालयों की मनमानी और अधिक बढ़ती जा रही है।
अभिभावकों का कहना है कि यदि यह लूट ऐसे ही जारी रही, तो शिक्षा केवल अमीरों तक सीमित होकर रह जाएगी और सामान्य वर्ग के बच्चों के लिए एक अच्छी शिक्षा प्राप्त करना सपना बनकर रह जाएगा। ऐसे में सरकार को अविलंब इस विषय पर ठोस कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि शिक्षा का मूल उद्देश्य कायम रह सके और आमजन को राहत मिले।