नई दिल्ली: एक रिपोर्ट के अनुसार 2019 के लोकसभा चुनाव में इस्तेमाल 37% VVPAT मशीनें खराब पाई गई हैं| “साल 2019 के लोकसभा चुनाव से लेकर आगे के तमाम चुनावों में इन्हीं का इस्तेमाल किया गया है| भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने 6.5 लाख से अधिक VVPAT मशीनों को 'खराब' के रूप में चिह्नित किया है। चुनाव आयोग (ECI) ने अब 6.5 लाख से अधिक खराब VVPAT मशीनों को ठीक करने के लिए भेजा है।।” विशेष रूप से, “ये नवीनतम (नई) मशीनें हैं, नवीनतम एम3 जनरेशन मशीनें 2018 में पहली बार पेश (इस्तेमाल) की गईं थी। इसे परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए, 2019 के लोकसभा चुनावों में, कुल 17.4 लाख वीवीपैट को लोकसभा चुनावों के लिए उपयोग के लिए अधिसूचित किया गया था और विधानसभा चुनाव भी साथ-साथ हो रहे हैं। इसका मतलब यह है कि इन मशीनों में से एक तिहाई (37%) अब चुनाव आयोग द्वारा खराब पाई गई हैं।”
“इससे भी ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि वीवीपैट की पूरी श्रृंखला को बदला जा रहा है। उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद को भेजी जाने वाली मशीनों में EVTEA 0001 से लेकर EVTEA 99999 तक की श्रृंखला को 'दोषपूर्ण' के रूप में चिह्नित किया गया है। इसी तरह बाकी श्रृंखलाएं भी हैं, अर्थात्, ईवीटीईबी, ईवीटीईसी, ईवीटीईडी प्रत्येक में 99999 मशीनों का एक बैच शामिल है।”
“मशीनों के लिए भी यही कहानी है जिन्हें भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल), बैंगलोर वापस भेजा जा रहा है। BVTAK 00001 से BVTAK 30000, BVTEA 00001 से BVTEA 30000 और BVTEC 05001 से BVTEC 75000 जैसी श्रृंखलाएं, सभी बैच हैं जिन्हें 'दोषपूर्ण' के रूप में चिह्नित किया गया है। कुल मिलाकर, बीईएल की 25,3500 मशीनें खराब पाई गई हैं, जिनमें से बीवीटीईएच 00001 से बीवीटीईएच 68500 तक की मशीनें बीईएल, पंचकूला को भेजी जानी हैं।”
“इन श्रृंखलाओं को पहली बार 2018 में पेश किया गया था और तब से बाद के चुनावों में इसका उपयोग किया गया है। देश भर से मशीनें मंगवाई गईं और बदली गई नई मशीनें अब लगभग सभी जिलों में पहुंच गई हैं।”
“चुनाव में इस्तेमाल 37% VVPAT मखराब पाई जाने की रिपोर्ट को कांग्रेस ने बेहद गंभीर मसला बताते हुए शुक्रवार (21 अप्रैल) को कहा कि,“इ अगर चुनावी प्रक्रिया पर किसी एक मतदाता को भी संशय है तो यह हम सभी का कर्तव्य है कि संशय दूर किया जाए। चुनाव कोई भी जीते, लेकिन लोगों का विश्वास चुनाव प्रक्रिया से डगमगाना नहीं चाहिए। यह हम सभी का सामूहिक दायित्व है।”
भारत को 'मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी' बनाने के लिए दी गई है अनगिनत कुर्बानियां : INC
कांग्रेस (INC) प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि,“ महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ. भीमराव अंबेडकर बाबासाहेब... इन सबकी मेहनत और लाखों कुर्बानियों की बुनियाद पर खड़ा हमारा ये लोकतंत्र आजादी के बाद साल दर साल हर सरकार ने उसको मज़बूती देने का पूरा प्रयास किया और वो मज़बूत होता गया। आज इस स्थिति में हमारा लोकतंत्र आया इन सबकी कुर्बानियों और मेहनत की वजह से कि प्रधानमंत्री सर ऊंचा करके कह सकते हैं 'मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी'... लोकतंत्र की मां भारत वो बताते हैं। तो ऐसे ही नहीं बनी मां, उसके लिए सबकी कुर्बानियां रही (भारत को लोकतंत्र की जननी बनाने के लिए अनगिनत कुर्बानियां दी गई हैं...... ) लेकिन कोई भी पुत्र अपनी मां को कमजोर करने के लिए कुछ काम ऐसा नहीं करेगा, जिससे वो मां कमजोर हो जाए, उल्टा उसको ताकत देगा, मज़बूती देगा, उसके स्वास्थ्य की रक्षा करेगा, उसके स्वास्थ्य की चिंता करेगा।”
पवन खेड़ा ने कहा कि,“जो आज हिंदुस्तान में हो रहा है... पूरे प्रयास हो रहे हैं कि लोकतंत्र पर किस तरह से आघात हो, किस तरह से हमले हों, फिर भी अगर लोकतंत्र जीवित है तो एक आस्था की वजह से जीवित है, जो हर व्यक्ति को अपने वोट पर होती है। जब वोट की उस ताकत या उस अधिकार को संदेह के घेरे में डाल दिया जाए, उसके ऊपर शक के बादल मंडराने लगें, तो फिर लोकतंत्र के लिए ख़तरे की बहुत बड़ी, बहुत ऊंची आवाज़ में सुनाई देने वाली घंटी है।”
17.5 लाख वीवीपैट में से 6.5 लाख वीवीपैट डिफेक्टिव पाई गई
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि,“ 37 प्रतिशत वीवीपैट (VVPAT) जो ईवीएम के साथ यंत्र लगा होता है, जिसमें पर्ची निकल कर दिखती है। कि आपने किसको वोट दिया... 37 प्रतिशत वीवीपैट डिफेक्टिव पाई गई। 2018 में ख़रीदी गई ये वीवीपैट अलग-अलग सोर्सेस से ख़रीदी गई थी, ईसीआईएल (ECIL)- हैदराबाद, बीईएल (BEL) - बैंगलोर और बीईएल (BEL) - पंचकूला। 2018 में ख़रीदी गई इन वीवीपैट का उपयोग ना केवल 2019 के लोकसभा के चुनाव में हुआ लेकिन उसके बाद के इन्हीं वीवीपैट का उपयोग हुआ।
खेड़ा ने कहा कि,“ ये वीवीपैट जब आई थीं, मुझे याद है और हर राज्य ने अपनी तरफ़ से कुछ प्रतिनिधि भेजे थे, जब उनका तमाम चुनावों में भी यूपीए का शासन था डिस्प्ले हुआ था, टेस्ट वीवीपैट के लाने के हुआ था। दिल्ली की तरफ़ से मैं गया था कुछ और साथियों के साथ पीछे मकसद ये था कि लोगों का ईवीएम पर और चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा और मज़बूत बने । उनको कोई संशय नहीं रह जाए कि अगर मैंने हाथ पर बटन दबाया हैं... वो वोट हाथ पर ही गया है या नहीं... या किसी और पार्टी पर बटन दबाया है...उसी को जा रहा है या नहीं. | ये भरोसा मज़बूती से मिले वोटर को, इसलिए वीवीपैट लाई गई।
उन्होंने कहा, ‘‘अब जो ये 37 प्रतिशत वीवीपैट हैं... 17 लाख 50 हजार वीवीपैट में से साढ़े 6 लाख, एक तिहाई से ज्यादा वीवीपैट ख़राब पाई गईं। सोचिए, कितना गंभीर ये मसला है। ये चुनाव आयोग की चिट्ठी है... जनवरी, 2022 की... जो चुनाव आयोग ने इन तीनों कंपनियों... जिनका मैंने नाम लिया, उनको लिखी है कि ये वीवीपैट डिफेक्टिव हैं। 4 लाख वीवीपैट हैदराबाद ईसीआईएल की खराब निकली। 1 लाख 85 हजार बीईएल, बैंगलोर की ख़राब निकली और 68 हजार 500 बीईएल, पंचकूला की वीवीपैट ख़राब निकली। तो ये जो शंका की जो आग है ना, ये चिंगारी ऐसे ही नहीं शुरू हुई। जो लोगों के मन में ये संशय आया, ये कोई मीडिया ने संशय पैदा किया हो या किसी विपक्षी दल ने पैदा किया हो, ऐसा नहीं होता ।''
VVPAT मशीनों की मरम्मती में SOP का पालन नहीं
एक ही सीरीज़ के सीरियल नंबर वाली हजारों मशीनों का ख़राब पाया जाना तकनीकी ख़राबी बताते हुए... तो निर्धारित एसओपी होता है, स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) होता है। क्या है वो एसओपी कि आप तमाम राजनीतिक दलों को बुलाएंगे, उन्हें आप विश्वास में लेंगे, उनसे आप क्या तकनीकी डिफेक्ट है, वो साझा करेंगे और आप क्या कदम उठा रहे हैं, वो साझा करेंगे। ये सब नहीं फॉलो किया गया, इसका अनुसरण नहीं किया गया और जो फ़र्स्ट लेवल चेक होता है, एफ़एलसी जिसको कहलाते हैं... जो डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर, 7 दिन के भीतर - भीतर अगर मशीन ख़राब पाई जाए तो 7 दिन के भीतर वो मशीनों को वापस भेजता है और मैन्युफैक्चरर को बोलता है कि साहब उसको ठीक करके, इसको दुरुस्त करके भेजिए । भी एक एसओपी है, इसका भी अनुसरण नहीं किया गया।
2021 में आपको मालूम पड़ा कि ये ख़राब है। 2022, जनवरी में आपने चिट्ठी लिखी... ये इतने सम??? का अंतराल बीत जाना, इस दौरान इतने चुनाव हो जाना, उन चुनावों में इन्हीं मशीनों का प्रयोग करना और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर का अनुसरण नहीं करना, आखिर आप क्या छुपा रहे हैं, आखिर आप क्यों छुपा रहे हैं? क्या ये तकनीकी ख़राबी है, क्या ये मानव रचित ख़राबी है? जो भी है, बताइए..... सबको विश्वास में लीजिए, तमाम राजनीतिक दलों को आप बुलाइए।
लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया 'चुनाव'....
उन्होंने आगे कहा, “ये जो आईटी सेल के मालिक और उनके दो रुपए वाले ट्रोल हैं, मैं बताता हूं आपको वो क्या कहेंगे इस प्रेस वार्ता के बाद कि साहब कांग्रेस पार्टी राज्यों में जब चुनाव जीत जाती है तो ईवीएम सही हो जाती है और हार जाती है तो कहते हैं साहब, ईवीएम ख़राब है। देखिए, एक भी वोटर को संशय है चुनावी प्रक्रिया पर तो हम सबका कर्तव्य है... विशेष तौर पर मीडिया का, विशेष तौर पर चुनाव आयोग का और विशेष तौर पर सरकार का कि वो संशय दूर किया जाए। मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी हैं आप। मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी में लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया जिसको चुनाव कहते हैं, अगर उसमें किसी को संशय हो जाए तो मदर तो रूठ ही जाएंगी, नाराज़ ही हो जाएंगी, मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी का स्वास्थ्य भी ख़राब हो जाएगा। तो मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी सिर्फ कहने में अच्छा लगता है, उसके लिए कुछ करना भी पड़ता है।
चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बहुत महत्वपूर्ण होती है
अंग्रेजी में कहते हैं ---''Sunlight is the best disinfectant'' जो सूरज की रोशनी होती है, जो धूप होती है, वो कीटाणुओं का नाश करती है... तो ऐसा जब संशय लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर आ जाए तो ऐसे में सरकार को, चुनाव आयोग को खिड़कियां, दरवाजे खोलने चाहिए ताकि धूप आए, संशय के कीटाणु दूर हों और चुनावी प्रक्रिया पर, लोकतंत्र पर लोगों का विश्वास टूटे नहीं, बना रहे। पारदर्शिता बहुत महत्वपूर्ण होती है चुनाव में, चुनावी प्रक्रिया में... लोगों के मन में अगर ये शक़ भी है कि कुछ छुपाया जा रहा है, वो शक़ आगे चलकर नासूर बन जाता है।
उन्होंने कहा, ‘‘हम इसलिए बार-बार चुनाव आयोग से प्रधानमंत्री से और सरकार से आह्वान करते हैं, आग्रह करते हैं कि शक को नासूर ना बनने दिया जाए। हमारा ही मुंह बंद करने के लिए बार-बार कोशिश की जाती है और एक गाना था सावन जो आग लगाए, तो उसे कौन बुझाए । यहाँ सरकार जो रक्षक है लोकतंत्र की, वही अगर बीच में आ रही है पारदर्शिता के, वही अगर ऐसे तमाम सवालों पर पूर्ण विराम लगाने की कोशिश करती है बिना उत्तर दिए तो फिर आप लोग बताइए कि लोकतंत्र की मां की रक्षा करने, लोकतंत्र की देवी की रक्षा करने की गुहार हम कहाँ लगाएं?
एक प्रश्न पर कि जो ये आंकड़ा है साढ़े छः लाख वीवीपैट मशीनें खराब हैं, एक ही सीरीज़ की ख़राब हैं तो इनसे कहां-कहां चुनाव हुए हैं और ये आंकड़ा क्या चुनाव आयोग से मिला है..... आपको? श्री पवन खेड़ा ने कहा कि ये जो पत्र अभी आपके मोबाइल पर आया होगा, इस पत्र में जो सीरियल नंबर्स हैं मशीनों के... वो आप जब गिनेंगे तो आपको समझ में आ जाएगा कि ये आंकड़ा कहां से आया। साढ़े छः लाख का जो ये आंकड़ा है, इसी पत्र से आया। सत्रह लाख, चालीस हजार वीवीपैट्स लगती हैं... ये M- 3 टाइप की जो वीवीपैट्स हैं, ये वो हैं । जो लोकसभा 2019 और उसके पश्चात जितने चुनाव हैं, उनमें उपयोग में लाई गईं हैं।
एक अन्य प्रश्न पर कि 2019 में इस्तेमाल किए गए वीवीपैट में से 37% के ख़राब होने पर आप क्या चुनाव आयोग से क्लैरिफिकेशन मागेंगे? श्री खेड़ा ने कहा कि 2018 में ये मशीनें ख़रीदी गईं, महत्वपूर्ण बिन्दु ये है। 2019 में और उसके बाद के तमाम चुनावों में... अब तक जो चुनाव हुए हैं राज्यों में... विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव और जितने भी उपचुनाव हुए हैं, उन सब में इन मशीनों का इस्तेमाल किया गया। 2021 में चुनाव आयोग ने स्वयं निर्णय लिया कि इन मशीनों को रिपेयर की आवश्यकता है, इनमें खामियां हैं, ये डिफेक्टेड हैं।
आज हम 2023 के अप्रैल में हैं, इस दौरान जितने चुनाव हुए हैं, उन सब चुनावों में ये मशीनें इस्तेमाल हुई हैं तो हमारे जो सवाल हैं, हमने वो सवाल आपको प्रेस रिलीज़ में भी डाले हैं जो हम सबसे पूछ रहे हैं, सरकार से भी पूछ रहे हैं, चुनाव आयोग से भी पूछ रहे हैं, हम सबसे यह सवाल पूछ रहे हैं कि साहब, बताइए कि ये क्या खामियां थीं? ये कौन सी मशीनें थीं? ये कहां-कहां इस्तेमाल हुईं? आपने क्यों नहीं एसओपी फॉलो किए? क्यों नहीं जो 7 दिन की मियाद होती है (ख़राब मशीनों को वापस भेजने की), उसका अनुसरण किया गया? ये तमाम सवाल हम पूछना चाहते हैं।
एक अन्य प्रश्न पर कि आज प्रधानमंत्री मोदी ने कर्नाटक बीजेपी लीडर ईश्वरप्पा जी से बात की है, कांग्रेस ने ट्वीट भी किया है। जिस तरीके के गंभीर आरोप लगे थे ईश्वरप्पा पर 40 परसेंट कमीशन लेने के और उनको टिकट भी नहीं दिया गया, कैसे आप देखते हैं कि प्रधानमंत्री इस तरीके के जो भ्रष्टाचार के मामलों में लिप्त लोग हैं, उनसे बात करते हैं और उन्हें कॉन्ग्रेचुलेट करते हैं, उनसे जायजा भी लेते हैं कि किस तरीके के चुनाव के हालात हैं? श्री खेड़ा ने कहा कि भाजपा के ही एक अन्य वरिष्ठ नेता, 4 राज्यों के राज्यपाल रहे हुए सत्यपाल मलिक जी ने क्या कहा था? आज से एक हफ्ते पहले कुछ कहा था, बड़े स्वर्णिम वाक्य हैं कि प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचार से कोई नफ़रत नहीं है। वो सभ्य आदमी हैं, सभ्य भाषा में उन्होंने बोला ... हम भी सभ्य हैं, लेकिन एक कदम आगे बढ़ाएं।
उन्होंने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचार से मोहब्बत है, ये मोहब्बत ईश्वरप्पा जी को फोन करने में सुनाई देती है। जिस व्यक्ति को 40 परसेंट कमीशन लेने के जुर्म में दबाव के चलते हटाया जाए, उसके आगे आप जी हुजूरी कर रहे हैं, उनको गुहार लगा रहे हैं कि साहब मदद कर देना, जितवा देना... देश का प्रधानमंत्री !
कुछ महीनों पहले... संदर्भ चुनाव का ही है, राज्य हिमाचल प्रदेश था... वहां भ्रष्टाचार का तो मामला नहीं था, लेकिन ऐसे ही एक व्यक्ति को उन्होंने कॉल किया... वो उनको टिकट नहीं मिली थी तो वो निष्पक्ष, इंडिपेंडेंट खड़े हो गए थे, उन्होंने प्रधानमंत्री की बात को माना भी नहीं। बड़ा अटपटा सा लग रहा था कि देश का प्रधानमंत्री, दूसरे टर्म का प्रधानमंत्री इस तरह से कह रहा हो... अपनी ही पार्टी के एक वर्कर के सामने और वो नहीं माना। देखिए साहब, इक़बाल तो इक़बाल होता है... वो नहीं टूटना चाहिए। पद प्रधानमंत्री का और वो भी भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री का... इस पद का इक़बाल होना चाहिए, उस इक़बाल को स्वयं प्रधानमंत्री जी ख़त्म कर रहे हैं, ये आज दूसरी बार देखने को मिल रहा है। और भी कई उदाहरण हैं लेकिन चुनाव के संदर्भ में अगर हम बात करें - एक भ्रष्ट व्याक्ति के आगे आप गिड़गिड़ा रहे हो कि भाई, जितवा दीजिए !
‘40 परसेंट सरकार' ऐसे ही थोड़े ही स्लोगन बना है, इन्हीं लोगों की वजह से बना है ये नारा, 40 प्रतिशत सरकार का जो तमगा मिला था भारतीय जनता पार्टी की सरकार को कर्नाटक में... वो इसी तरह के लोगों की वजह से नहीं, इन्हीं की वजह से मिला था और आज प्रधानमंत्री उन्हीं के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं। सोचिए, क्या स्थिति है और सोचिए, भ्रष्टाचार से कितनी मोहब्बत है साहब ।
एक अन्य प्रश्न पर कि गैर-बीजेपी शासित राज्यों के जो राज्यपाल हैं, उनका रवैया जो रहता है सरकारों के प्रति, उसको लेकर कांग्रेस पार्टी की क्या राय है? श्री पवन खेड़ा ने कहा कि राज्यपाल का जो दर्जा इस सरकार ने कर दिया है, भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने... वो महाराष्ट्र के उदाहरण आपने कई बार देखे, अब तो वहाँ से हटा दिए गए वो और भी कई उदाहरण आपको मिलेंगे। लगातार हर हफ्ते कुछ ना कुछ उदाहरण मिलते हैं जहाँ राज्यपाल एक तरह से भारतीय जनता पार्टी के एजेंट बनकर काम कर रहे हैं। ये बहुत ही पीड़ादायक बात है, बोलने में भी बुरा लगता है लेकिन ये किया जा रहा है और आप सोचिए कि जम्मू-कश्मीर के आखिरी राज्यपाल सत्यपाल मलिक जी को किस तरह से प्रधानमंत्री जी ने कहा ‘तुम चुप रहो, इस पर बोलो नहीं'... पुलवामा पर जब उन्होंने बोला कि साहब ये अपनी ही लापरवाही से हुआ है तो कहा कि तुम चुप रहो। जब वो गोवा के राज्यपाल बनते हैं और भ्रष्टाचार के विषय में कुछ जानकारी प्रधानमंत्री को देते हैं तो सत्यपाल मलिक जी को हटा दिया जाता है। आनन-फानन में हटा दिया जाता है। विशेष विमान से उनको गोवा से हटवा दिया जाता है, उनकी सुरक्षा छीन ली जाती है। तो कठपुतली बनकर रहोगे, ऐश करोगे... अपना दिमाग लगाओगे तो यहाँ आप दिल्ली के एक किराए के मकान में एक पीएसओ लेकर बैठ जाओगे, जैसा कि सत्यपाल मलिक जी के साथ हो रहा है।
सबके सामने है, कुछ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म की आवश्यकता नहीं है... जो दिख रहा है, वही हम बोल रहे हैं। आप भी देख रहे हैं, हम भी देख रहे हैं, पूरा विश्व भी देख रहा है, पूरा देश भी देख रहा है। लेकिन फिर भी बेशर्मी की इंतहा देखिए इस सरकार की ... फिर भी बिल्कुल कोई डर नहीं, कोई भय नहीं, किसी से कोई परेशानी नहीं, वो करेंगे जो इनको करना है। राज्यपालों को कठपुतली बनाकर ही काम उनसे लेंगे। अब आप लोगों के हाथ में है कि किस स्तर पर ये सरकार गिरी है, इसको आप बार-बार सबके सामने लाइए ताकि लोकतंत्र की रक्षा हम लोग कर सकें।
गठबंधन को लेकर पूछे एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्री पवन खेड़ा ने कहा कि गठबंधन कोई स्विच नहीं होता कि ऑन हो जाए या ऑफ़ हो जाए, ये एक प्रक्रिया होती है। प्रक्रिया की कोई मियाद नहीं होती कि साहब, 5 दिन में ख़त्म कर दीजिए। ये होते होते होता है। इसमें कई लोगों के मन में जो सवाल होते हैं, विचार होते हैं... उन सबका स्थान होता है। चर्चा होती है उन सवालों पर उन विचारों पर... उसके बाद अंग्रेजी में जिसको कहते हैं एक कॉमन ग्राउंड... उस पर आया जाता है।
इस देश ने अच्छी सरकारें देखी हैं, गठबंधन की सरकारों ने बहुत अच्छा काम करके इस देश में दिखाया है। 10 साल यूपीए के आपने देखे हैं, उस वक्त की जीडीपी आपने देखी, उस वक्त के एम्प्लॉयमेंट फ़िगर्स आपने देखे हैं, ग्रामीण रोज़गार देने वाला एमजीनरेगा देखा है... आपने उस वक्त का जो काम होते हुए देखा, वो आज भी आपको याद होगा ।
विश्व बैंक की रिपोर्ट कि 27 करोड़ लोगों को ग़रीबी रेखा से ऊपर उठा लिया था... वो गठबंधन की सरकार थी और ये पूर्ण बहुमत की सरकार ने ना केवल उन 27 करोड़ लोगों को वापस ग़रीबी रेखा के नीचे डाला, बल्कि 19 करोड़ और ग़रीबी रेखा के नीचे चले गए ! आज 80 प्रतिशत हमारी देश की आबादी मुफ्त राशन पर निर्भर हो गई है, ये पूर्ण बहुमत की सरकार है। तो मैं आपको सिर्फ एक तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए भी आग्रह कर रहा हूं। तो गठबंधन बनने के लिए जितनी मेहनत करनी पड़ती है, it is worth it... वो आवश्यक है मेहनत ताकि जब सरकार बने तो आपका ध्यान इस देश के हर वर्ग पर हो।
आपका ध्यान अच्छा शासन देने की तरफ़ हो, जैसा कि 10 साल यूपीए ने दिया था 2004 से 2014 के बीच में तो प्रक्रिया में टर्न लेफ्ट लिया, राइट ले लिया, येलो लाइट आ गई, रेड लाइट आ गई, ग्रीन लाइट आ गई... ये सब निरंतर, सतत प्रक्रिया है। रेड लाइट परमानेंट नहीं होती है, वो ग्रीन भी होती है, बीच में येलो भी आती है... तो हर बार आप परेशान मत होइए, अरे साहब उन्होंने ये कह दिया, उन्होंने ये सवाल खड़ा कर दिया। ये सवाल आवश्यक हैं, इन सवालों का जवाब इस देश के लोकतंत्र को मज़बूत करेगा।
कर्नाटक के चुनाव के संदर्भ में पूछे एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्री पवन खेड़ा ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी जहां चुनाव निष्पक्ष होते हैं, वहाँ डरी हुई आपको मिलती है। जहाँ उन्हें समझ में आ जाता है, आईना दिखने लग जाता है... हिमाचल में देखा था, गिड़गिड़ाते हुए सुना था हमने प्रधानमंत्री को, आज फिर सुना। आप कुछ करेंगे नहीं जब आप सरकार में होगे और आपको लगेगा कि जोड़-तोड़ की राजनीति से लोगों का ध्यान भटका कर जो राजनीति करते हैं, उससे आप चुनाव जीत जाएंगे और अगर हार भी जाएंगे तो ख़रीद-फ़रोख्त कर लेंगे... ये हर बार नहीं चलता, काठ की हांडी है... एक बार चढ़ गई, दो बार चढ़ गई, तीसरी बार नहीं चढ़ेगी। तो जाहिर सी बात है भारतीय जनता पार्टी को डरा हुआ होना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी डरी हुई या नहीं, वो आप ज्यादा जानते हैं। कर्नाटक के लोग ज्यादा डरे हुए हैं कि कहीं ये वापस ना आ जाएं, इसलिए लोगों ने इस बार अपनी छुट्टी कैंसिल कर दी। लोग ट्रैवल प्लान बदल रहे हैं कि साहब, वोट देने के बाद ट्रैवल करेंगे या वोट देने से पहले ट्रैवल करेंगे। वोट के दिन कर्नाटक में ही रहना है ताकि वोट दे सकें।
एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्री खेड़ा ने कहा कि जो कल हृदय विदारक घटना ... हमारे 5 जवानों की शहादत इस घटना में हुई आतंकी घटना में हुई, हमले में हुई... हम बार-बार सरकार का ध्यान सवाल उठाकर बार-बार हम उनका ध्यान खींचने की कोशिश करते हैं, आकर्षित करने की कोशिश करते हैं कि आपने जितने वादे किए थे पिछले 9 साल में, अलग- अलग... जब सरकार गिराई तब जो वादे किए थे, जब राष्ट्रपति शासन लगाया तब जो वादे किए थे, जब नोटबंदी लाए तब जो वादे किए थे, जब 370 हटाया तब जो वादे किए, जब आपने राज्यों को घटाकर, यूनियन टेरिटरी बनाते हुए जो वादे किए... वो तमाम वादे आपके खोखले साबित हो रहे हैं। स्थिति सामान्य नहीं, सामान्य से बहुत दूर है। जिस तरह से कश्मीरी पंडितों पर, माइग्रेंट लेबर पर, वहां के रहने वाले नागरिकों पर जो हमले हो रहे हैं, लगातार हो रहे हैं, हमलों में बढ़ोतरी हो रही है... आप वहां चुनाव तक नहीं करवा पा रहे तो स्थिति सामान्य तो बिल्कुल नहीं है। जो असामान्य है, वो है आपकी चुप्पी... वो है आपका एक हठीला रवैया कि आपको जवाब देना ही नहीं है, कोई भी सवाल हो जाए।
उन्होंने कहा, ‘‘आपने देखा किस तरह से कश्मीरी पंडितों ने प्रधानमंत्री का ध्यान आकर्षित करने के लिए पत्र भी लिखे, आवाज़ भी उठाई, हमने भी उनकी आवाज़ उठाई, इसी प्लेटफॉर्म पर हमने उनके नुमाइंदे को भी बुलाया, आपके सामने उन्होंने भी अपनी बात रखी, लेकिन ये सरकार की एक हठधर्मिता है कि हमें जवाब नहीं देना, हमसे कुछ ग़लत भी हो रहा है तो हम चुप रहेंगे, हम जवाब नहीं देंगे, बोलने दीजिए। अब तो ये स्थिति आ गई कि उनके अपने नेता सत्यपाल मलिक जी ने ऐसी-ऐसी बातें उठाई हैं, उन पर भी ये चुप हैं, उन पर भी ये जवाब नहीं दे रहे हैं तो ये जो चुप्पी है, ये जो खामोशी है, ये कुछ बता रही है, ये क्या बता रही है - ये खामोशी बता रही है कि सरकार को काम करना नहीं आता, सरकार की नीयत ख़राब है, सरकार की कोई दिशा नहीं है कश्मीर के मामले में ।