नई दिल्ली: पूर्व सांसद अतीक अहमद और पूर्व MLA अशरफ अहमद की पुलिस हिरासत में हत्या का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। अतीक और अशरफ की पुलिस कस्टडी में हत्या की जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की निगरानी में जांच की मांग की गई है। साथ ही 2017 से उत्तर प्रदेश में अब तक हुए 183 एनकाउंटर की जांच सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की निगरानी में एक्सपर्ट कमेटी से कराने की मांग की गई है, जैसा कि यूपी में एनकाउंटर को लेकर, उत्तर प्रदेश के विशेष पुलिस महानिदेशक (लॉ एंड ऑर्डर) ने बताया था, यूपी में 2017 से 183 एनकाउंटर हुए है|
ये याचिका एडवोकेट विशाल तिवारी ने दायर की है। याचिका में अतीक और उसके भाई की हत्या की जांच के लिए एक समिति का गठन करने की मांग की गई है। साथ ही याचिका में 2020 विकास दूबे एनकाउंटर केस की सीबीआई से जांच की मांग की गई है।
बताते चलें,'' 15 अप्रैल की रात को पुलिस हिरासत के दौरान अतीक और उसके भाई अशरफ की हत्या कर दी गई थी। इस हत्या को तब अंजाम दिया जब मीडिया अतीक और अशरफ से सवाल कर रही थी। मौके पर तीनों आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए। पुलिस तीनों से पूछताछ कर रही है। यूपी के प्रयागराज जिले की एक अदालत ने रविवार 16 अप्रैल, 2023 को तीनों आरोपियों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। आरोपियों की पहचान लवलेश तिवारी, सनी सिंह और अरुण मौर्य के रूप में की गई है।
पिछले महीने अतीक अहमद ने याचिका दायर कर अपनी जान को खतरा बताया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षा की मांग वाली याचिका को सुनने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। फिर भी वो चाहें तो हाईकोर्ट जा सकता है।
एडवोकेट विशाल तिवारी ने अतीक और उसके भाई की हत्या की जांच और 2017 के बाद से हुई 183 मुठभेड़ों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति का गठन करने की मांग की है| याचिका में कहा गया है, "उत्तर प्रदेश पुलिस ने डेयरडेविल्स बनने की कोशिश की है।" याचिकाकर्ता ने कहा कि "उनकी जनहित याचिका कानून के शासन के उल्लंघन और दमनकारी उत्तर प्रदेश पुलिस बर्बरता के खिलाफ है।"
याचिका में ये भी कहा गया है कि अतीक और अशरफ की हत्या के दो पहलू हो सकते हैं, या तो हत्याएं किसी दूसरे गैंगस्टर ने करवाई हैं या फिर सिस्टम से जुडी साजिश के तहत किया गया है। आगे कहा गया कि लोकतंत्र में राज्य को एक कल्याणकारी राज्य होना चाहिए न कि एक पुलिस राज्य। पुलिस का काम अपराध का पता लगाना और उसकी जांच करना है। सजा देना कोर्ट का काम है।“
याचिकाकर्ता ने कहा कि इस तरह की घटनाएं '''लोकतंत्र और रूल ऑफ लॉ'' के लिए गंभीर खतरा हैं और इस तरह की हरकतें अराजकता को जन्म देती है और यह प्रथम दृष्टया में, '''पुलिस स्टेट'' का डेवलपमेंट हैं।
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उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कानून के तहत न्यायेतर हत्याओं या फर्जी पुलिस मुठभेड़ों की बहुत बुरी तरह से निंदा की गई है और ऐसी चीजें एक लोकतांत्रिक समाज में मौजूद नहीं हो सकती हैं। पुलिस को अंतिम न्याय देने या दंड देने वाली संस्था बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
याचिकाकर्ता विशाल तिवारी ने कहा,“दंड की शक्ति केवल न्यायपालिका में निहित है। पुलिस जब डेयर डेविल्स बन जाती है तो कानून का पूरा शासन ध्वस्त हो जाता है और पुलिस के खिलाफ लोगों के मन में भय उत्पन्न होता है जो लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक है और इसका परिणाम आगे अपराध भी होता है|”
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एडवोकेट विशाल तिवारी ने कहा, 15 अप्रैल को अतीक अहमद और उनके भाई अशरफ को जब उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया, तो वे यूपी पुलिस की हिरासत में थे और आरोपियों को उच्चतम सुरक्षा प्रदान करना उनका कर्तव्य था| एडवोकेट ने यह भी कहा कि अतीक अहमद और उनके भाई की हत्याएं इस घटना की पारदर्शिता पर सवाल उठाती हैं.
अधिवक्ता विशाल तिवारी ने अपनी याचिका में कहा,“यह 'भारतीय लोकतंत्र और रूल ऑफ लॉ' पर सीधा हमला है। बाद में हमलावरों को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन अपराध करने के दौरान, पुलिस द्वारा कोई सुरक्षा या प्रतिशोध नहीं था। इस तरह से पारदर्शिता पर सवाल खड़ा होता है और यह साबित होता है कि यह मामला एक पूर्व नियोजित हमला है, जिसमें आरोपियों का कोई निवारण नहीं है| ”