नई दिल्ली: ओबीसी संशोधन बिल को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंजूरी दे दी है। इसे हाल ही में संसद के दोनों सदनों से पास कराया गया था। दोनों सदनों ने सत्तापक्ष के अलावा विपक्षी दलों ने भी बिल का समर्थन किया था। राष्ट्रपति ने OBC संशोधन बिल को दे दी हरी झंडी। इसके बाद अब राज्यों को अपनी ओबीसी सूची बनाने का अधिकार मिल गया है।
लोकसभा में यह बिल को 10 अगस्त को पारित हुआ था। विधेयक को लोकसभा में उपस्थित सदस्यों का दो तिहाई बहुमत मिला। इसके पक्ष में कुल 385 सदस्यों ने वोट दिया। बिल के खिलाफ एक भी वोट नहीं पड़ा, क्योंकि विपक्ष ने भी एक मत होकर इस विधेयक का समर्थन किया। इसके बाद बिल को राज्यसभा में पेश किया गया, जहां इसके पक्ष में 187 वोट पड़े। इस तरह से यह बिल दोनों सदनों से पास हो गया।
दरअसल,सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद यह बिल संसद में पेश किया गया था। मई में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि केवल केंद्र को ये अधिकार है कि वह ओबीसी समुदाय से जुड़ी लिस्ट तैयार कर सके। हालांकि, केंद्र और राज्य सरकार द्वारा इसपर आपत्ति जाहिर की गई थी, इसी के बाद अब केंद्र सरकार संविधान संशोधन बिल लाकर इसे कानूनी रूप दिया था।
आरक्षण पर पुर्नविचार से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई करने की मांग खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 102वें संविधान संशोधन के बाद ओबीसी की सूची बनाने का अधिकार राज्यों के पास नहीं, बल्कि केंद्र के पास है। इसके बाद केंद्र सरकार ने ओबीसी सूची तय करने का अधिकार राज्यों को देने के लिए 127वां संविधान संशोधन विधेयक लाने की पहल की|
ओबीसी आरक्षण बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद बने इस कानून में अब राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को अन्य पिछड़ा वर्ग की लिस्ट तैयार करने का अधिकार मिला है। यानी हर राज्य अब पिछड़े वर्गों की सूची बना सकता है और उसे बनाए रख सकता है। पहले यह अधिकार राज्यों के पास नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के पास था।
संसद में संविधान के अनुच्छेद 342-ए और 366(26) सी के संशोधन और राष्ट्रपति की मुहर के बाद राज्यों के पास ओबीसी वर्ग में अपनी जरूरतों के मुताबिक, जातियों को अधिसूचित करने की शक्ति मिलेगी। इससे महाराष्ट्र में मराठा समुदाय, गुजरात में पटेल समुदाय हरियाणा में जाट समुदाय और कर्नाटक में लिंगायत समुदाय को ओबीसी वर्ग में शामिल करने का मौका मिल सकता है। ये तमाम जातियां लंबे समय से आरक्षण की मांग कर रही हैं, हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इन मांगों पर रोक लगाता रहा है।