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24 अगस्त 2026

जीविका अधिकार है, उपकार नहीं': किसानों के लिए MSP की मांग करते हुए राहुल गांधी का मोदी सरकार पर वार

नई दिल्ली: दिल्ली की सीमाओं पर कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का धरना प्रदर्शन जारी है| दिल्ली के बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन के शुक्रवार को 100 दिन पूरे हो गए हैं| केंद्र सरकार की ओर से लाए गए तीनो…

जीविका अधिकार है, उपकार नहीं': किसानों के लिए MSP की मांग करते हुए राहुल गांधी का मोदी सरकार पर वार
जीविका अधिकार है, उपकार नहीं': किसानों के लिए MSP की मांग करते हुए राहुल गांधी का मोदी सरकार पर वार | फ़ोटो: TVL News

नई दिल्ली: दिल्ली की सीमाओं पर कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का धरना प्रदर्शन जारी है|  दिल्ली के बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन के शुक्रवार को 100 दिन पूरे हो गए हैं|  केंद्र सरकार की ओर से लाए गए तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की कई सीमाओं पर बैठे किसानों का आंदोलन आज 102वां दिन है|



इस बीच कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक बार सरकार पर हमला बोला| राहुल गांधी ने किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग करते हुए सरकार पर तंज कसा| राहुल गांधी ने ट्वीट कर लिखा,'' जीविका अधिकार है, उपकार नहीं! ....#मोदी_MSP_दो




वहीँ भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा,''13 मार्च को पश्चिम बंगाल जाऊंगा, वहां बड़ी पंचायत है। वहां के किसानों से मिलेंगे और किसान आंदोलन और एमएसपी के बारे में बात करेंगे। कल महिला दिवस मनाएंगे, बॉर्डर पर कल पूरा संचालन महिलाएं करेंगी|



इससे पहले,''केन्द्र के नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन के 100 दिन पूरे होने पर शनिवार को कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि,' मोदी सरकार भी कपटी बगुले की तरह है जिसका तन उजला और मन मैला है। पौराणिक कथाओं में ही सुना था कि असुरों और दैत्यों की सत्ता ने देवताओं को सताया, मगर आज स्वयं धरती का भगवान अन्नदाता किसान बीते 100 दिनों से अहंकारी सत्ता द्वारा सताया जा रहा है। 



कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि,'''भाजपाई सत्ता ने इन बीते सौ दिनों में किसानों के साथ क्रूरता, निर्दयता और बर्बरता की सारी हदें लाँघ दी हैं। किसानों पर कड़कड़ाती ठंड में पानी की बौछारों से प्रहार किया गया, रास्ते खोदे गए, लाठी भौजी गईं, आँसू गैस के गोले दागे गए। इतना ही नहीं, आतंकवाद के कानूनों के तहत फंसाने की कोशिशें तक की गई तथा उनकी राहों में कील और काँटे तक बिछाए गए।




आइये जानते हैं इन सौ दिनों में धरती के भगवान - किसान मजदूर ने क्या क्या सहा है: 

1) काली कोठरी वालों के काले कानून:

सबसे पहले पूँजीपतियों की पल्वित, पुष्पित, पोषित, पाली पोसी भाजपाई सत्ता ने महामारी की विभीषिका की काली अंधियारी रात में अन्नदाता किसानों के खिलाफ़ जून 2020 में तीन काले क्रूर कानूनों के अध्यादेश पूँजीपतियों के हित साधने के लिए पास किए। किसानों और प्रतिपक्ष के लाख विरोध के बावजूद इन अध्यादेशों को सदन में कानूनी मर्यादाओं को ताक में रखकर पास किया गया। इतना ही नहीं, सरकार द्वारा सर्वाच्च अदालत में झूठा शपथपत्र भी दिया गया कि प्रभावित पक्षों से चर्चा कर के ये कानून लाया गया है। जबकि सूचना के अधिकार के तहत सरकार ने यह स्वीकारा कि वर्तमान में इन क्रूर काले कानूनों को बनाने से पहले किसानों से बात नहीं की गई।





2) अहंकारी सत्ता - आंदोलित किसान 

किसानों ने हरसंभव कोशिश की कि वे आंदोलन की राह की अपेक्षा वार्ता से मोदी जी की मनमानी का समाधान निकालें इसलिए दिल्ली कूच करने से पहले 13 नवंबर, 2020 को किसानों ने देश के कृषि मंत्री से 7 घंटे चर्चा की, मगर 'हम दो हमारे दो' की नीति पर चलने वाली सरकार किसानों की कहाँ सुनने वाली थी।



अंततः किसान 26 नवंबर, 2020 को दिल्ली कूच करने को मजबूर हुए। वे गाँधीवादी तरीके से अपनी बात रखना चाहते थे मगर निर्दयी मोदी सरकार ने किसानों के जत्थों को घेर कर सोनीपत के बॉर्डर पर, सिंधु और टीकरी बॉर्डर पर, सिरसा, जींद, फतेहाबाद, दिल्ली की लगभग सभी सीमाओं पर कड़कड़ाती ठंड में पानी की बौछारों से आँसू गैस के गोलों से प्रहार प्रारंभ किए, बर्बरता से लाठियों डंडों से मारा गया। यहाँ तक कि नेशनल हाइवे खोदे गए। मगर किसानों के फौलादी इरादों के आगे सत्ता की प्रताड़ना परास्त हुई और किसानों ने दिल्ली के दरवाजे पर धरना प्रारंभ किया।




3) मीटिंगों का स्वाँग - नहीं मानी मांग:

मांग चंद पूँजीपतियों से किसानों की आजीविका का सौदा पहले ही कर चुकी अधर्मी मोदी सरकार ने किसानों की मांगों के समाधान का स्वाँग करना प्रारंभ किया। किसानों से पहली बैठक 14 अक्टूबर को आयोजित की गई मगर मगरूर सरकार का कोई मंत्री इस मीटिंग में नहीं आया, सिर्फ कृषि सचिव मौजूद थे। स्वाभाविक था किसानों ने चर्चा से साफ़ इंकार कर दिया। फिर 13 नवंबर से कृषि मंत्री से बैठकों का दौर चालू हुआ। पहले दिन से सरकार के मन में खोट था। सरकार समाधान नहीं चाहती थी। एक के बाद एक मीटिंगों पर मीटिंग बुलाई गई। 13, नवंबर, 1, 3, 5, 8, 30 दिसंबर, 8 जनवरी से लेकर 22 जनवरी तक कुल 12 बैठकों के दौरान सरकार ने किसानों को परास्त करने की 3 रणनीतियों पर काम किया।



(A) थका दो - भगा दो - सरकार चाहती थी कि इतने लंबे समय तक बैठकें की जाएँ कि किसानों के संसाधन ख़त्म हो जाएँ और किसान थक कर भाग जाएँ।




(B) प्रताड़ित करो - परास्त करो की नीति के अनुरूप इसी दौरान किसानों को अलग अलग तरह से प्रताड़ित किया गया। कभी इन्कम टैक्स के छापे, कभी छप्। के नोटिस दिये गए। उत्तर प्रदेश में 50 - 50 लाख के नोटिस दिए गए। मध्यप्रदेश में वन विभाग के छापे डलवाकर फ़र्जी मुक़दमे लगवाए गए। इतना ही नहीं, किसानों के आंदोलन पर पथराव तक किया गया। उनकी राहों में कील और कॉट बिछाए गए। 



(C) बदनाम करो - आँदोलन तोड़ो की नीतिः मोदी सरकार के प्रभावशाली नेताओं मंत्रियों ने किसानों को सार्वजनिक रूप से पाकिस्तानी, खालिस्तानी, माओवादी तक कहा। आँदोलन में विदेशी फंडिंग के आरोप लगाए गए। 26 जनवरी की ट्रेक्टर रैली में तो सरकार प्रायोजित कार्यक्रम के तहत नियोजित रूप से लाल किले की प्राचीर से भारत की अस्मिता को तार तार किया गया और उसका आरोप किसान भाइयों पर मढ़ने की कोशिश की गई ताकि किसानों के आंदोलन की छवि धूमिल की जा सके।



4) 'कवरेज एरिया' से बाहर किया, 'एक कॉल दूर' का झांसा दियाः

मोदी सरकार हमेशा अपने पूँजीपति मित्रों के 'कवरेज एरिया' में रहती है, किसानों को 'आउट ऑफ कवरेज' एरिया किए रहती है और किसानों को एक काल दूर' का झांसा देती है। मोदी जी भली भाँति जानते हैं कि इन काले कृषि विरोधी क्रूर कानूनों के क्या दुष्प्रभाव किसानों पर पड़ने वाले हैं। सरकारी मंडियाँ बंद हो जाएंगी, समर्थन मूल्य पर खरीदी बंद हो जाएगी, जमाखोर असीमित मात्रा में अनाज जमा करके बाज़ार में फसलों के दाम तोड़ देंगे, किसानों की ज़मीनें हड़पी जाएंगी, मगर वे तो चाहते ही ये हैं कि 14 करोड़ 65 लाख किसानों से उनकी आजीविका छीनकर 25 लाख करोड़ का खेती का ब्यापार अपने पूँजीपति मित्रों को दे दें। 



अंततः पाँचों राज्यों में भाजपा की हार से निकलेगा किसानों की जीत का रास्ताः मोदी सरकार अपने बहुमत के अहंकार में अंधी हो गई है। उसे सत्ता के स्वार्थ के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता है। प्रजातंत्र 'मनमाने' नहीं 'जनमाने' तरीके से चलाया जाता है। इन पाँचों राज्यों में मोदी सरकार की पराजय किसानों की निजी क्षेत्र में समर्थन मूल्य दिए जाने और किसान विरोधी काले काननों को वापस लिए जाने की जीत का रास्ता खोलेगी। आइये , भाजपा की हार' और 'देश की जीत' का मार्ग प्रशस्त करें।





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यह रिपोर्ट 7 मार्च 2021 को TVL News पर प्रकाशित हुई और 9 मई 2025 को अपडेट की गई। नई जानकारी मिलने पर खबर को अपडेट किया जाता है।

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