नई दिल्ली: कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर हमला बोला है| कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि लोकतांत्रिक भारत की आवाज़ दबाना जारी है, सरकार का घमंड पूरे देश के लिए आर्थिक संकट लाया है दरअसल,'' किसान बिल को लेकर राज्यसभा में रविवार को हुए हंगामे के चलते तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ'ब्रायन आम आदमी पार्टी के संजय सिंह सहित आठ विपक्षी सांसदों को सोमवार को निलंबित कर दिया गया है |
राज्यसभा में हुए हंगामे के बाद आठ विपक्षी सांसदों को निलंबित किए जाने पर सरकार को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है, और विभिन्न विपक्षी नेताओं ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को निरंकुश बताते हुए आरोप लगाया है कि वह विपक्ष की आवाज़ को अलोकतांत्रिक तरीके से दबा रही है|
इसके बाद मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा,'भारत की आवाज़ दबाना जारी है| इस 'सर्वज्ञ' सरकार के कभी खत्म नहीं होने वाले घमंड की वजह से पूरे देश के लिए आर्थिक संकट आ गया है|
राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा,, "लोकतांत्रिक भारत की आवाज़ दबाना जारी: शुरुआत में उन्हें चुप किया गया, और बाद में काले कृषि कानूनों को लेकर किसानों की चिंताओं की तरफ से मुंह फेरकर संसद में सांसदों को निलंबित किया गया... इस 'सर्वज्ञ' सरकार के अंतहीन (कभी खत्म नहीं होने वाले घमंड) अहंकार ने पूरे देश के लिए आर्थिक आपदा ला दी है|
कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने कहा,''जिस प्रकार से आज सुबह कांग्रेस समेत दूसरी पार्टियों के 8-8 सदस्यों को राज्यसभा में एकतरफा तरीके से सस्पेंड किया गया। जिस प्रकार से किसान के काले कानूनों का विरोध कर रहे हमारे सब साथियों की आवाज दबा दी गई...मोदी जी ये देश आपको कभी माफ नहीं करेगा|
इससे पहले, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सांसदों के निलंबन को लेकर मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की थी| ममता बनर्जी ने अपने ट्वीट में लिखा, "किसानों के हितों की रक्षा के लिए लड़ने वाले आठ सांसदों का निलंबन दुर्भाग्यपूर्ण है, और इस निरंकुश सरकार की सोच का परिचायक है कि वह लोकतांत्रिक नियमों और सिद्धांतों का सम्मान नहीं करती... हम नहीं झुकेंगे और इस फासीवादी सरकार से संसद में और सड़कों पर लड़ेंगे|
टीएमसी सांसद सुखेंदु शेखर रे सांसदों के निलंबन पर कहा, कई सदस्यों द्वारा कृषि विधेयक में संशोधन पर विचार नहीं किया गया और तथाकथित ध्वनि मत के जरिए इसे पास कर दिया गया। इस मामले में अध्यक्ष की भूमिका पूर्ववर्ती 'पक्षपातपूर्ण', अभूतपूर्व और गैरकानूनी थी। यदि संवैधानिक प्राधिकारी राज्यसभा अध्यक्ष नियमों के अऩुसार कार्य नहीं करेंगे तो देश फासीवाद की तरफ भले ही न बढ़े, लेकिन इसका बहुसंख्यकवाद का शिकार होना तय है।