27 फरवरी 1952 को बिहार के चंपारण ज़िले के एक ज़मींदार परिवार में जन्मे प्रकाश झा ने भारतीय सिनेमा में एक अलग पहचान बनाई। परिवार की इच्छा थी कि वे आईएएस या आईपीएस अफ़सर बनें, लेकिन उनका झुकाव कला की ओर था। वे पेंटर बनना चाहते थे, मगर किस्मत ने उन्हें फ़िल्मों की दुनिया में ला खड़ा किया।
उनकी फ़िल्म मृत्युदंड (1997) इस बात की मिसाल है कि वे सिनेमा को सिर्फ़ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का ज़रिया मानते थे। इस फ़िल्म के ज़रिए उन्होंने महिलाओं पर होने वाले अत्याचार, पितृसत्ता और सामाजिक अन्याय के गंभीर मुद्दों को उठाया। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि किस तरह समाज में महिलाओं को अब भी प्रॉपर्टी की तरह ट्रीट किया जाता है, उनके अधिकारों को छीना जाता है, और वे मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना सहने के बावजूद चुप रहती हैं। उनकी फ़िल्में महिलाओं को न केवल अपनी आवाज़ उठाने की प्रेरणा देती हैं, बल्कि उन पुरुषों को भी झकझोरती हैं जो समाज में बदलाव लाने की हिम्मत रखते हैं।
प्रकाश झा की फ़िल्में केवल महिलाओं के मुद्दों तक सीमित नहीं रहीं। गंगाजल, अपहरण, राजनीति, सत्याग्रह जैसी फ़िल्मों के ज़रिए उन्होंने भ्रष्टाचार, राजनीति और सामाजिक अन्याय जैसे विषयों पर भी तीखी टिप्पणी की। उनके सिनेमा ने हमेशा समाज को आईना दिखाने का काम किया है।