लखनऊ: पारुल सुनिल त्रिपाठी (लेखिका - लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्रा है, विभिन्न सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दों पर कविता एवं कहानियों के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद करती रहती है)
लेखिका पारुल सुनिल त्रिपाठी की नई कविता:पढ़ें---------
यहां भीड़ बहुत शानदार है,
बहरे ,गूंगो और अंधो का ये बाजार है,
गर तुम संभल सकना तो आना यहां,
हिफाज़तो की रियायतें बदल सकना तो आना यहां,
गर नाउम्मीद होकर टिकने की ताक़त लिए ,
ठहर सकना तो तुम आना यहां,
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हजार मंजिले , हज़ार रास्ते भी है,
मगर सफ़र के मुताबिक़ रास्ते बदल सकना तो तुम आना यहां,
छाव की तलाश न करना तुम,
बिन सूरज के भी दहकती धूप में टिक सकना तो तुम आना यहां,
शोर बहुत है यहां,
मगर बेखबर हो सबसे मन, की सुन पाना तो आना यहां,
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ये दौर नयाबों का है,
गर चाहत हो कामयाबी की तो आना यहां,
हं पांव में काटें चुभेंगे बहुत तुम्हारे,
होकर लहूलुहान भी अगर टिक सकना तो आना यहां,
हे इस जगत के होने वाले मुसाफ़िर,
सब सोच के आना यहां,
सब सोच के आना यहां।
पारुल सुनील त्रिपाठी (लखनऊ विश्वविद्यालय)