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24 अगस्त 2026

आजादी का अमृत महोत्सव उत्सव कम दिखावा ज्यादा लगता है

इस वर्ष भारत 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आजादी का अमृत महोत्सव बनाने जा रहा है, जिसमें विभिन्न स्वतंत्रता सेनानियों, स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा भारत छोड़ो आंदोलन के स…

आजादी का अमृत महोत्सव उत्सव कम दिखावा ज्यादा लगता है
आजादी का अमृत महोत्सव उत्सव कम दिखावा ज्यादा लगता है | फ़ोटो: TVL News

इस वर्ष भारत 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आजादी का अमृत महोत्सव बनाने जा रहा है, जिसमें विभिन्न स्वतंत्रता सेनानियों, स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा भारत छोड़ो आंदोलन के साथ साथ दांडी मार्च यात्रा की प्रदर्शनी तथा प्रस्तुतीकरण दिखाया जाएगा। किंतु सवाल यह उठता है कि हमने कहां तक इन आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओ के आदर्शों, मूल्यों,विचारों तथा कार्यप्रणालियों को अपनी व्यवस्था में समुचित व व्यवहारिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया?...

उदाहरणतः गांधी जी द्वारा प्रस्तावित सत्य,अहिंसा, सर्वोदय, सर्वधर्म समभाव, सहिष्णुता,मानवता तथा अंबेडकर जी द्वारा प्रस्तावित सामाजिक न्याय, वितरणात्मक न्याय तथा समावेशन एवं नेहरूजी व सुभाषचंद्र बोस जी द्वारा स्थापित समाजवाद तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के मूल्य.....


यदि हम अपनी व्यवस्था का स्थूल तथा सूक्ष्म स्तर पर विश्लेषण करें, तो हमें सम्भवतः इन मूल्यों के प्रति उदासीन तथा नकारात्मक दृष्टिकोण मिलता है। जैसे:ASHER रिपोर्ट में(बच्चों का संसाधनो व स्कूल से अलगाव), भ्रष्टाचार बोध सूचकांक, वैश्विक भुखमरी सूचकांक(भारत की दयनीय स्थिति),मानव विकास सूचकांक जैसे मानक व प्रतिमान इस बात  की पुष्टि तथा इसकी प्रमाणिकता को विश्वसनीय स्तर पर सिद्ध करते हैं।


भारत में वर्तमान में जारी मोब लिंचिंग, विभिन्न समुदायों, जातियों व धर्मों के बीच द्वेष, वैमनस्य तथा अलगाव की भावना न केवल गांधीजी द्वारा प्रस्तावित अहिंसा व सद्भाव के सिद्धांत का उल्लंघन करता है, भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखित "हम भारत के लोग"(We the people of india) तथा बंधुत्व के आदर्श को खण्डित करती है।

इसके अतिरिक्त वर्तमान में संसदीय विपथ गमन की स्थिति, सिद्धांतविहीन राजनीति, घोषणा पत्र के प्रति प्रतिबद्धता तथा सत्यनिष्ठता का अभाव, दलबदल की बढ़ती प्रवृत्ति तथा लोक प्रतिनिधित्व की घटती रचनात्मक भागीदारी के साथ-साथ इनमें निहित दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण यह  अमृत महोत्सव को नीरस में परिवर्तित होता हुआ नज़र आता हैं....


वर्तमान में मिले आर्थिक आंकड़े दर्शाते हैं कि धन का सकेंद्रण केवल कुछ लोगों तक ही सीमित है, जो ना केवल वितरणात्मक न्याय (distributry justice) सिद्धांत के विरुद्ध है बल्कि यह लोगों की क्रय शक्ति क्षमता को सीमित करने के साथ-साथ उत्पादन इकाइयों तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने हेतु हतोत्साहित करता है, जिसके परिणामस्वरूप रोजगारविहीन संवृद्धि, आर्थिक विकास का अभाव के साथ साथ विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत होता है...


यदि सही अर्थों में आजादी का अमृत महोत्सव बनाने है, तो हमें संकीर्ण मानसिकता व राजनीतिक हितों को त्यागकर मानव विकास, मानव कल्याण तथा मानवीय गरिमा पर आधारित नवीन दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, साथ ही हमें सकारात्मक राजनीतिक, समाजिक तथा आर्थिक अभिवृति को विकसित करते हुए लोगों के मध्य सहयोग, समन्वय, एकता के साथ साथ वी फिलिंग(we feeling) का भाव निर्मित करना होगा।.... इस आधार पर कहा जा सकता है कि  आजादी का अमृत महोत्सव उत्सव कम दिखावा ज्यादा प्रतीत होता है।



मौ.आतिफ

(हिंदी विभाग)

दिल्ली विश्वविद्यालय

tvlnews

TVL News (TheViralLines) के संवाददाता। यह रिपोर्ट स्थानीय स्रोतों और उपलब्ध आधिकारिक जानकारी की पुष्टि के बाद प्रकाशित की गई है। किसी तथ्य में सुधार के लिए संपर्क करें या +91 99996 56869 पर WhatsApp करें।

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यह रिपोर्ट 7 अगस्त 2022 को TVL News पर प्रकाशित हुई और 9 मई 2025 को अपडेट की गई। नई जानकारी मिलने पर खबर को अपडेट किया जाता है।

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