Afghanistan Crisis: अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा हो चुका है।संकटग्रस्त अफगानिस्तान के राष्ट्रपति रविवार को देश छोड़कर भाग गए। राष्ट्रपति अशरफ गनी समेत कई शीर्ष नेता अफगानिस्तान छोड़कर चले गए हैं। वहीं राष्ट्रपति गनी के ताजिकिस्तान जाने की खबरें है, हालांकि, इसकी अभी अधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। सत्ता के हस्तांतरण के लिए समन्वय परिषद गठन किया गया है। उधर, अमेरिका ने हेलीकाप्टर के जरिए अपने राजनायिक को निकाला। लोगों का पलायन शुरू हो जुका है। इस देश में हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। एयरपोर्ट पर भीड़ जमा हो गई है। अमेरिका की तरफ से हवा में गोलियां दागी गई है।
अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद जहां अधिकतर देश काबुल में अपने दूतावासों को बंद करके अपने नागरिकों को निकालने में जुटे हैं, वहीं चीन ने विद्रोही संगठन से दोस्ती का ऐलान किया है। चीन ने सोमवार को कहा कि वह तालिबान के साथ दोस्ताना रिश्ता विकसित करना चाहता है। एक दिन पहले ही इस्लामिक कट्टरपंथी समूह ने काबुल को अपने नियंत्रण में लिया है।
सोमवार को चीन का कहना है कि वह अफगानिस्तान के तालिबान के साथ 'मैत्रीपूर्ण संबंध' विकसित करना चाहता है| एएफपी एजेंसी के मुताबिक,''चीन ने कहा,''हम अफगानिस्तान के तालिबान के साथ 'मैत्रीपूर्ण संबंध' विकसित करना चाहते है|
विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने मीडिया से कहा, 'चीन अफगानिस्तान के लोगों के स्वतंत्रतापूर्वक अपनी तकदीर चुनने के अधिकार का सम्मान करता है और अफगानिस्तान के साथ दोस्ताना और सहयोगपूर्ण रिश्ते विकसित करना जारी रखना चाहता है।' चीन के अलावा रूस ने भी तालिबान की सरकार को मान्यता देने के संकेत दिए हैं। मंगलवार को रूस के राजदूत तालिबान के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात करने वाले हैं और इसके बाद इस पर फैसला हो सकता है। इस बीच ब्रिटेन ने वैश्विक समुदाय से अपील की है कि तालिबान की सरकार को मान्यता न दी जाए।
चीन ने कहा कि अफगानिस्तान के साथ रिश्ता को मजबूती देने के मौके का इसने स्वागत किया है। चीनी प्रवक्ता ने कहा, ''तालिबान ने बार-बार चीन के साथ अच्छे रिश्ते की उम्मीद जाहिर की है और वे अफगानिस्तान के विकास और पुर्ननिर्माण में चीन की सहभागिता को लेकर आशान्वित हैं। हम इसका स्वागत करते हैं।'' हुआ ने यह भी कहा कि काबुल में चीन का दूतावास अभी भी काम कर रहा है।
अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी के दौरान बीजिंग ने तालिबान के साथ अनौपचारिक संबंध बनाए रखने की इच्छा जाहिर की थी। चीन की 76 किलोमीटर सीमा अफगानिस्तान से मिलती है। बीजिंग को लंबे समय से यह डर था कि अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे से शिजियांग प्रांत में अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के अलगाववाद को बढ़ावा मिल सकता है। लेकिन पिछले महीने तालिबान के एक प्रतिनिधिमंडल ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की थी और उनसे वादा किया था कि अफगानिस्तान को आतंकियों के बेस के रूप में इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा। बदले में चीन ने आर्थिक सहयोग और निवेश का भरोसा दिलाया।
रूस ने काबुल में अपने दूतावास को खाली करने की किसी योजना से इनकार करके यह साफ कर दिया है कि तालिबान सरकार को मान्यता दी जा सकती है। विदेश मंत्रालय के अधिकारी ज़मीर काबुलोव ने सोमवार को कहा कि उनके राजदूत तालिबान नेतृत्व के संपर्क में हैं। काबुलोव ने यह भी कहा कि यदि तालिबान का आचरण ठीक रहता है तो इसके शासन को मान्यता दी जा सकती है। अफगानिस्तान में रूस के राजदूत दिमित्री झिरनोव की दूतावास की सुरक्षा को लेकर तालिबान के प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर सकते हैं।
आपको बता दें कि अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में दाखिल होने और राष्ट्रपति भवन पर तालिबान के कब्जे के बाद रविवार को मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने संक्षिप्त वीडियो संदेश जारी किया है| उन्होंने कहा है कि शासन की असली परीक्षा शुरू होने वाली है| मुल्ला अब्दुल गनी बरादर तालिबान राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख और दोहा में कई दावेदारों के साथ राजनीतिक समझौता के लिए बातचीत करनेवाली टीम का हिस्सा हैं|
गौरतलब है कि तालिबान ने अफगानिस्तान के 34 प्रांतीय राजधानियों को दो हफ्ते से भी कम समय में अपने नियंत्रण में ले लिया है| अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी के पूर्व सलाहकार शफीक हमदम ने उनके मुल्क छोड़ने के फैसले की आलोचना की है| वाशिंगटन से अलजजीरा को उन्होंने बताया "ये शर्मनाक है.... ये अपमानजनक है| लोग ठगा हुआ और अकेला महसूस कर रहे हैं| हालांकि, गनी ने फेसबुक पर जारी बयान में अपने इस कदम को उचित ठहराते हुए कहा है कि उनका मकसद और खून खराब को रोकना था| उन्होंने लिखा, "तालिबान ने तलवार और बंदूक के बल फैसले से जीत हासिल की| इन सबके बीच सवाल पैदा हो रहा है कि आखिर तालिबान हैं कौन और उनकी मंशा क्या है?
इस बीच, तालिबान के प्रवक्ता शाहीन सुहैल ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया है कि अफगानिस्तान में अगली सरकार कैसी होगी। सुहैल ने उम्मीद जताई है कि भारत से भी भविष्य में रिश्ते बेहतर होंगे। उसने कहा कि हमें उम्मीद है कि भारत अपना रुख बदलेगा और तालिबान का समर्थन करेगा।
तालिबान के प्रवक्ता ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि वे (भारत) भी अपनी नीतियों में बदलाव करेंगे, क्योंकि पहले वे उस शासन का पक्ष ले रहे थे, जो थोपी गई थी। ये दोनों पक्षों, भारत और अफगानिस्तान के लोगों के लिए अच्छा होगा।
तालिबान ने पूरे काबुल में अपने पैर पसार लिए हैं और चरमपंथी संगठन के एक अधिकारी ने कहा कि वह काबुल में राष्ट्रपति भवन से जल्द ही इस्लामी अमीरात ऑफ अफगानिस्तान के गठन की घोषणा करेगा। शाहीन ने कहा कि यह तालिबान के शासन का ये एक नया संस्करण होने जा रहा है।
काबुल के मौजूदा हालात पर प्रवक्ता ने कहा कि हमारे सुरक्षा बलों ने सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए राजधानी में एंट्री किया है ताकि लोगों की संपत्ति को नुकसान न पहुंचे और उनकी जान बच जाए। इससे पहले हमारे नेतृत्व ने हमारी सेना को काबुल शहर के गेट पर रुकने का निर्देश दिया था। लेकिन जब हमें लूटपाट और संपत्ति की लूट और फायरिंग की कई खबरें मिलने लगीं तो हमारे नेतृत्व ने लड़ाकों को काबुल शहर में एंट्री करने और सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने का निर्देश दिया।
सुहैल ने आगे कहा कि दुनिया के सभी देशों के साथ सहयोग करना हमारी नीति है। अब एक नया अध्याय खुला है, वह है देश का निर्माण, लोगों का आर्थिक विकास, सभी देशों के बीच शांति का एक अध्याय, खासकर हमारे आस-पास के देशों में। हमें दूसरे देशों के सहयोग की जरूरत है। हमारा इरादा देश का पुनर्निर्माण करना है और ये अन्य देशों के सहयोग के बिना नहीं किया जा सकता है।
काबुल में तालिबान का कब्जा होने के बाद आम नागारिक और विदेशी नागरिक देश छोड़कर जाने की कोशिश कर रहे हैं। बीबीसी के मुताबिक, 60 से अधिक देशों ने एक साझा बयान जारी कर अफगानिस्तान में सुरक्षा और नागरिक व्यवस्था को तुरंत बहाल करने की अपील की है। साथ ही तालिबान से गुजारिश की है कि जो लोग वहां से बाहर जाना चाहते हैं उनका रास्ता न रोका जाए।