नई दिल्ली: शिवसेना ने सोमवार को केंद्र सरकार द्वारा 2021-22 के लिए पेश किए गए केंद्रीय बजट (Budget 2021) पर मोदी सरकार पर निशाना साधा है और इसे सपनों की सैर वाला बजट बताते हुए कहा,''केंद्र सरकार ने एक और ‘स्वप्निल’ बजट सोमवार को संसद में प्रस्तुत किया|इसे ‘स्वप्निल’ नहीं तो और क्या कहें...? 2014 में, जब से ये सरकार सत्ता में आई है तब से देश की अर्थव्यवस्था लगातार गड़बड़ाती जा रही है।
शिव सेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' में लिखा है, केंद्र सरकार ने एक और ‘स्वप्निल’ बजट सोमवार को संसद में प्रस्तुत किया। सरकार की तिजोरी खाली है, आर्थिक क्षेत्र और विकास दर ऊपर बढ़ने की बजाय शून्य की ओर और शून्य से ‘माइनस’ की ओर जा रही है। आर्थिक मोर्चे पर इस तरह की तस्वीर के बीच वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने लोकसभा में अपने भाषण में लाखों-करोड़ों के आंकड़ों को प्रस्तुत किया। इसे ‘स्वप्निल’ नहीं तो और क्या कहें? 2014 में, जब से ये सरकार सत्ता में आई है तब से देश की अर्थव्यवस्था लगातार गड़बड़ाती जा रही है। अब तो सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने ही आर्थिक सर्वेक्षण में कहा है कि देश की जीडीपी -7.7 तक चली गई है।
शिवसेना ने 'सामना' में लिखा है, ''पिछले किसी भी शासन में जीडीपी इस रसातल तक नहीं पहुंची थी। यह मामला इस प्रकार का है कि कुएं में एक भी बूंद पानी नहीं है और फिर भी हम प्रजा को भरपूर पानी देंगे तथा विकास की गंगा देश के कोने-कोने तक पहुंचाएंगे। कुएं में जब पानी ही नहीं है तो रहट में वैसे पहुंचाएंगे...? इस सवाल का जवाब बजट में कहीं नहीं मिलता। आत्मनिर्भर भारत, स्टार्टअप जैसे पुराने शब्दों के बुलबुले और मूलभूत सुविधा, कृषि विकास आदि शब्दों के नए बजाए गए तुनतुने के अलावा सामान्य जनता को दिलासा मिलेगी, ऐसा कुछ भी इस बजट में नहीं है।
आगे लिखा है,'कोरोना काल में देश के हजारों उद्योग-धंधे डूब गए, लाखों लोगों की नौकरियां चली गई बेरोजगारी बढ़ गई, इस पर वित्त मंत्री ने बजट के दौरान कुछ भी नहीं बोला। जिनकी नौकरियां गई, उन्हें वे वैसे पुन: प्राप्त होंगी, बंद पड़े उद्योग वैसे शुरू होंगे, इस पर कुछ भी नहीं बोला गया। देश की पूरी अर्थव्यवस्था पर कोरोना का साया है इसलिए स्वास्थ्य क्षेत्र में किए गए प्रावधान या कोरोना टीकाकरण के लिए ३५ हजार करोड़ का प्रावधान स्वागत योग्य है। हालांकि जनता के स्वास्थ्य और उनके प्राणों की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य ही है। इन सबसे भी आगे जाकर जनता यह सोचती है कि हमें क्या मिला? भारी-भरकम वित्तीय शब्दों से जनता को कोई लेना-देना नहीं है।
शिवसेना ने कहा,'' आम आदमी को इसी से सरोकार है कि उसकी जेब में क्या आया और इस बजट से जनता की जेब में कुछ नहीं आया, यह हकीकत है। दुर्भाग्य की बात यह है कि बजट से वोटों की गलिच्छ राजनीति करने का नया पैंतरा सरकार ने शुरू किया है। प. बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल में अब विधानसभा के चुनाव हैं इसलिए इन राज्यों के लिए बड़े-बड़े पैकेज और परियोजनाओं की सौगात वित्त मंत्री ने बांटी है। हजारों करोड़ की सड़कें और रेलमार्ग वहां दिए गए हैं।
शिवसेना ने कहा,''नई योजनाएं, नई परियोजनाएं और सड़कें बननी ही चाहिए। विकास के लिए यह आवश्यक है। हालांकि चुनाव को देखते हुए केवल जहां चुनाव हैं, उन राज्यों को ज्यादा निधि देना एक प्रकार का छलावा है। जनता को लालच दिखाकर चुनाव जीतने के लिए ‘बजट’ का हथियार के रूप में प्रयोग करना कितना उपयुक्त है? इन राज्यों को खूब सारा बांटनेवाली केंद्र सरकार देश की तिजोरी में सर्वाधिक योगदान देनेवाले महाराष्ट्र को नजरअंदाज करती है।
शिवसेना ने कहा,''नागपुर और नासिक मेट्रो परियोजना के लिए किए गए प्रावधान को छोड़ दिया जाए तो मुंबई तथा महाराष्ट्र के हिस्से में बजट में से कुछ नहीं मिला। यह भेदभाव क्यों? देश के वित्त विभाग को पूरे देश का विचार करना चाहिए। सीतारामन कुछ राज्यों की ही नहीं बल्कि पूरे देश की वित्त मंत्री हैं इसलिए देश का बजट घोषित करते समय चुनाव को आंखों के सामने रखा जा रहा होगा या किसी राज्य में किसी की सत्ता है, इसका विचार करके देश का बजट तैयार होने लगेगा तो वैसे चलेगा? स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए इतने करोड़, ऊर्जा क्षेत्र के लिए उतने करोड़ आदि बड़े-बड़े आंकड़े हर बजट में प्रस्तुत किए जाते हैं। उसी प्रकार के आंकड़े इस बजट में भी पिछले पन्नों से आगे आ गए हैं।
शिवसेना ने कहा,'''सपने दिखाने और सपने बेचने के मामले में सरकार माहिर है। सपनों की दुनिया रचना और सोशल मीडिया पर टोलियों के माध्यम से उन सपनों की हवाई मार्वेâटिंग करना, उनका काम है। सत्ताधीशों की इस हवाई गोलीबारी से जनता त्रस्त हो गई है। यह बजट वित्तीय संकट को दूर करने के लिए उपायों की चर्चा न करते हुए राजनीति के साथ ही अर्थनीति का ‘स्वप्न रंजन’ करनेवाला और अर्थनीति में भी राजनीति लाने वाला है। यह बजट उन राज्यों पर अन्याय करनेवाला है जहां चुनाव नहीं हैं। सड़कें, रेलवे, विमान, पेट्रोलियम कंपनियां और बहुत कुछ बिक चुका। ये बेचो, वो बेचो करने वाली सरकार अब बीमा क्षेत्र भी बेचने चली है। बजट में इसकी घोषणा होते ही सेंसेक्स में जोरदार उछाल आया। लेकिन सपनों के दिखावे से आम जनता की जेब में पैसे आएंगे क्या? यह असली सवाल है। वह नहीं आनेवाले होंगे तो बजट के ‘कागजी घोड़े’ केवल ‘डिजिटल घोड़े’ बन जाएंगे, बस यही फर्क होगा। केंद्रीय वित्त मंत्री ने इस डिजिटल घोड़े से जनता को सपनों की फिर एक बार ‘सैर’ कराई है, ऐसा ही कहना पड़ेगा।